शहर की लाइफ लाइन: सिटी रिपोर्टिंग

लक्ष्मी प्रसाद पंत
(स्टेट एडिटर, दैनिक भास्कर, जयपुर)

हिंदी पत्रकारिता में सिटी रिपोर्टिंग का दायरा इतना व्यापक, विविधतापूर्ण और बहुआयामी हो गया है कि हमारे जीवन का कोई पहलु, कोई गतिविधि उसकी जद से बाहर नहीं बची है। शहर के गली-मोहल्ले की छोटी सी सूचना से लेकर देश-विदेश में घटी हर घटना के शहर पर प्रभाव तक की जानकारी सिटी रिपोर्टिंग का हिस्सा है। सिटी रिपोर्टिंग किसी भी शहर की लाइफ लाइन की तरह है, जिसके बिना वहां की पत्रकारिता असंभव है।

सिटी रिपोर्टिंग-नाम ही अपने आप में पूरी कहानी कहता है। आप कह सकते हैं कि सिटी रिपोर्टिंग का अर्थ किसी शहर से संबंधित घटनाओं की रिपोर्टिंग से है। और इस दृष्टि से सिटी रिपोर्टिंग का एरिया सीमित भी नजर आता है। लेकिन ऐसा नहीं है। सिटी रिपोर्टिंग अपने शाब्दिक अर्थ में भले ही स्थानीयता का आभास कराती हो पर अपने व्यापक स्वरूप में यह राष्ट्रीय ही नहीं वैश्विक हैसियत रखती है। आज जब अत्याधुनिक संचार माध्यमों ने पूरे विश्व को ग्लोबल विलेज में समेट दिया है तो ऐसे में कोई भी शहर अपनी सीमाओं के दायरे में सीमित कैसे रह सकता है। यह गूगल देवता (सर्च इंजन) का दौर है और समाज में आगे रहने की छटपटाहट ने जिस तेजी से खबरों के अंदाज को बदला है, उसने सिटी रिपोर्टिंग के नए मापदंड खड़े कर दिए हैं। जािहर है कि जैसे-जैसे जिज्ञासाएं बढेंगी, समाज के अंदर जानने-समझने की बैचेनी भी उसी तेजी से बढ़ेगी। आज सिर्फ खबर नहीं पाठक खबर के अंदर और बाहर और आगे का सच भी जानना चाहता है। उसकी जिज्ञासा सिर्फ सूचना तक सीमित नहीं है, वह खबर बनने की पूरी प्रक्रिया में जुडऩा चाहता है, क्योंकि वह जानता है कि खबर का असर और प्रभाव से वह कहीं न कहीं खुद प्रभावित होने वाला है।

सिटी रिपोर्टिंग का प्रभाव व दायरा बढ़ाने में सबसे अहम योगदान हिंदी पत्रकारिता का है। अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले हिंदी अखबारों में स्थानीयता को ज्यादा महत्व मिला है। इसका कारण यह रहा कि अंग्रेजी पत्रकारिता ने वैश्विक दृष्टि को तो लगातार बढ़ाया पर, स्थानीय विषयों (सिटी रिपोर्टिंग) पर उसकी दृष्टि सदा सतही ही बनी रही। देश-दुनियां की बड़ी घटनाओं और आर्थिक-राजनीतिक गतिविधियों, समीकरणों और विश्लेषणों से तो उनके पन्ने भरे रहे पर स्थानीय के नाम पर उसका कवरेज केवल शहर की बड़ी घटनाओं तक सीमित रहा। आम व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करने वाली उसके आस-पड़ौस की घटनाएं, उसकी रोजमर्रा की जिंदगी में काम आने वाली छोटी-छोटी चीजों को उसमें कभी कोई स्थान नहीं मिला। उसकी सिटी रिपोर्टिंग केवल शहर की कुछ बड़ी घटनाओं और आभिजात्य वर्ग की पसंद के कुछ स्तंभों या कॉलमों तक सीमित रही। यही कारण रहा कि अंग्रेजी पत्रकारिता महानगरों के अलावा बड़े शहरों तक में अपनी पैठ नहीं बना पाई। अधिकतर अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाएं भी अंग्रेजी जानने वाले परिवारों में उनकी टी-टेबल तक ही सीमित रही, उनकी जिंदगी का हिस्सा नहीं बन पाई।

हिंदी पत्रकारिता ने शुरुआती दौर से ही सिटी रिपोर्टिंग की इस जरूरत को समझा। पत्रकारिता के क्षेत्र में व्याप्त इस शून्य को पूरा करने के लिए अपना ध्यान स्थानीयता पर केंद्रित किया। पाठक को उसके परिवेश की हर छोटी से छोटी सूचना, उसकी जरूरत की हर जानकारी उसे मिलने लगी तो अखबार उसे अपनी जिंदगी का हिस्सा और अपरिहार्य लगने लगा। यह सब संभव हुआ हिंदी अखबारों की सिटी रिपोर्टिंग की ताकत से। खासकर सिटी रिपोर्टिंग के बदले स्वरूप से। हिंदी पत्रों ने अपनी सोच व दृष्टि तो वैश्विक रखी पर लक्ष्य स्थानीयता को रखा। हर शहर के अखबार के केंद्र में उसी शहर को रखा। इससे आम आदमी को लगने लगा की पत्रकारिता के केंद्र में अब वही है।

वैसे देखा जाए तो हिंदी पत्रकारिता का उद्भव ही मूलत: सिटी रिपोर्टिंग से हुआ है। 19 वीं सदी के उतरार्ध में जब कोलकत्ता से प्रथम हिंदी पत्र उदंत मार्तंड का प्रकाशन शुरू हुआ तो उसकी विषय वस्तु और प्रसार का केंद्र कोलकत्ता शहर ही था। दो शताब्दी में अपने विस्तार की वैश्विक उंचाइयों को छूने के बाद अब फिर हिंदी पत्रकारिता के केंद्र में सिटी रिपोर्टिंग ही है। हिंदी का पहला अखबार उदंत मार्तंड भी भले ही अपने सीमित साधनों की वजह से ही सही, पर एक शहर तक केंद्रित अखबार ही था। शहर में जहाजों के आवागमन के समय की जानकारी से लेकर शहर के लोगों के उपयोग की अनेक लोकल सूचनाएं उसमें छपती थी।

आज के अखबार हर शहर के पाठक और बिजनेस को अपने से जोड़े रखने की कवायद में हर छोटे-बड़े शहर पर केंद्रित हैं। अखबारों का वैश्विक बाजार अब महानगरों की बजाय छोटे शहरों की ओर बढ़ रहा है। क्षेत्रीय अखबार ही नहीं, राष्ट्रीय अखबार भी छोटे-छोटे शहरों तक अपने अलग संस्करण, अलग पुलआउट शुरू कर रहे हैं। इसलिए सिटी रिपोर्टिंग की भूमिका और महत्व निरंतर बढ़ रहे है।

हर घटना का समाचारीय महत्व उसकी स्थानीयता से भी निर्धारित होता है। किसी भी समाचार संगठन के लिए किसी समाचार के महत्व का मूल्यांकन उस आधार पर भी किया जाता है कि वह घटना उसके कवरेज क्षेत्र और पाठक/दर्शक/श्रोता समूह के कितने करीब हुई। सबसे करीब वाला ही सबसे प्यारा होता है। यह मानव स्वभाव है और स्वाभाविक भी है कि लोग उन घटनाओं के बारे में जानने के लिए उत्सुक होते हैं जो उनके करीबी होती हैं। इसका एक कारण तो करीब होना है और दूसरा कारण यह भी है कि इसका असर भी करीब वालों पर ही अधिक पड़ता है। मसलन किसी एक खास कॉलोनी में चोरी-डकैती की घटना के बारे में वहां के लोगों की रूचि होना स्वाभाविक है। रूचि इसलिए कि घटना उनके करीब हुई है और इसलिए भी कि इसका संबंध स्वयं उनकी अपनी सुरक्षा से है।

अपने आस-पास होने वाली घटनाओं के प्रति लोगों की अधिक रूचि से हम सब वाकिफ हैं और समाचारों और समाचार संगठनों का अधिकाधिक स्थानीयकरण इसी रूचि को भुनाने का परिणाम है। इस थ्योरी को निकटता का सिद्धांत भी कहा जाता है। इस सिद्धांत को सबसे पहले डॉक्यूमेंटेड करने वाले ग्रीक के महान फिलोसॉफर थ्योडोर न्यूकॉम्ब (1903 -1984) थे। इनका रिव्यू 2002 में रिव्यू ऑफ जनरल फिलोसॉफी सर्वे में पब्लिश हुआ। इनके अलावा अमेरिका के नियोन फेस्टिंगर (1919-1989) ने भी इस सिद्धांत पर अच्छा काम किया और वे इसे पब्लिक डोमेन में लेकर आए। लेखक केवल जे कुमार ने अपनी पुस्तक मास कम्युनिकेशन इन इंडिया में कम्युनिकेशन थ्योरी व निकटता के सिद्धांत पर विस्तार से प्रकाश डाला है।

वर्तमान में पत्रकारिता की दृष्टि से हमारे शहर-कस्बे बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं। संचार क्रांति ने भौगोलिक दूरियों को पाटते हुए दुनिया के हर कोने को इतनी सघनता से एक-दूसरे से जोड़ दिया है कि पूरा विश्व एक शहर जैसा प्रतीत होता है। दूसरी ओर उन्नत प्रौद्योगिकी और बहुआयामी विकास के बूते हर शहर ही अपने आप में एक संपूर्ण दुनिया बन गया है।

दुनिया जैसा विस्तार और एक पड़ोसी घरों जैसी सघनता अब हर शहर की विशेषता हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव, फ्रांस पर आतंकी हमला, किसी यूरोपीय देश में आई बाढ़-तूफान, अरब-इजरायल में बढ़ता तनाव अब केवल उन देशों में ही नहीं बल्कि दुनिया के हर देश के हर शहर के लोगों की चर्चा के केंद्र में होते हैं। दूसरी ओर दिल्ली में हुआ निर्भया कांड जैसी घटना अब केवल उस शहर की एक आपराधिक घटना नहीं अपितु, विश्व व्यापी बहस और चिंता का कारण बनती है। यानी, शहर को सीमाओं के दायरे में बांधना और समझना अब जितना कठिन होता जा रहा है, शहर के लिए समाचारों का संकलन, चयन उतना ही मुश्किल होता जा रहा है। यही सिटी रिपोर्टिंग की सबसे बड़ी चुनौती है।

आज शहर में आयोजित लिटरेरी फेस्टिवल में जब हम दुनिया भर के लेखकों से रूबरू होते हैं, फिल्म इंटरनेशनल फेस्टिवल में प्रदर्शित फिल्मों में विभिन्न देशों की सभ्यता व संस्कृति परिचय पाते हैं, मेडिकल सेमिनार में विश्व के प्रख्यात चिकित्सकों स्वास्थ्य संबंधी नवीन जानकारी पाते हैं, आर्थिक-औद्योगिक सम्मेलनों में भागीदारी के लिए टॉप बिजनेस लीडर्स शहर के मेहमान होते हैं, नई फिल्म के प्रमोशन के लिए नामी सितारे छोटे से शहर में होते हैं, शहर के सांस्कृतिक आयोजनों में विश्वविख्यात कलाकारों की प्रस्तुतियां होती हैं, तो हमारा शहर हमें एक पूरी दुनिया जैसा अहसास देता है। ऐसे समय सिटी रिपोर्टिंग एक वैश्विक घटना के कवरेज जैसा महत्वपूर्ण हो लगता है। पर, जब कॉलोनी के किसी हिस्से में एक छोटी सी वारदात होती है तो हमें उस छोटी सी घटना पर भी केंद्रित होना पड़ता है। क्योंकि उस कॉलोनी के पाठकों को उस छोटी से घटना के बारे में भी हर एंगल से संपूर्ण जानकारी की अपेक्षा अखबार से ही होती है।

इसलिए सिटी रिपोर्टिंग कॉलोनी की एक छोटी सी घटना को भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यानी, सिटी रिपोर्टिंग की भूमिका स्थानीयता के शुरुआती बिंदु से लेकर वैश्विकता के चरम बिंदु तक भूमिका व्याप्त है। इसलिए इसका कलेवर जितना विशाल व व्यापक है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। अपने शहर की कसौटी पर खरा उतरना सिटी रिपोर्टिंग की दूसरी बड़ी चुनौती है। अब हर शहर का अपना वजूद, अपना मिजाज, अपना कायदा, अपनी सोच, अपनी परंपरा, अपनी संस्कृति, अपनी जरूरतें, अपने सपने, अपनी विशेषताएं हैं। इसलिए हर शहर के अखबार के केंद्र में उसी के पाठक को रखना होता है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगरों को छोड़ दें तो भी जयपुर, जोधपुर, भोपाल, चंडीगढ, लखनऊ, पटना, अहमदाबाद जैसे समान स्तर के शहरों की सिटी रिपोर्टिंग में भी एक जैसे मानदंड नहीं अपनाए जा सकते।

हर शहर के पाठकों की अलग अभिरुचि होती है। जो साहित्यिक सामग्री भोपाल के पाठकों को चाहिए वह जरूरी नहीं की अहमदाबाद के पाठकों को भी अच्छी लगे। फिल्मों व फैशन से जुड़ी जो सामग्री चंडीगढ़ के पाठकों को दी जाती है वह जयपुर के पाठक को नहीं परोसी जा सकती। हर शहर की रिपोर्टिंग के लिए अलग मानदंड, अलग तौर-तरीके अपनाने होते हैं। इसलिए सिटी रिपोर्टिंग का क्षेत्र जितना विविधतापूर्ण, बहुआयामी है उतना ही चुनौतीपूर्ण और तकनीकी भी है। अपने आप में यह पत्रकारिता की एक स्वतंत्र विधा बन चुका है।

सिटी रिपोर्टिंग हिंदी अखबारों की रिपोर्टिंग का एक अहम हिस्सा है। एक प्रकार से यह हिंदी अखबारों की रीड़ है। सिटी रिपोर्टिंग का मतलब है आम आदमी को उसके परिवेश से जुड़ी हर छोटी से छोटी सूचना उपलब्ध करवाना। उसकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन जाना। पाठक को उसकी जरूरत की हर ऐसी जानकारी उपलब्ध करवाना जो ज्ञान व जानकारी के स्तर पर उसे समाज में आगे रख सके। जैसा कि पत्रकारिता को परिभाषित करते हुए महात्मा गांधी ने लिखा है – पत्रकारिता एक सामाजिक धर्म है और वह समाज के स्वास्थ्य के लिए है। पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने लिखा है कि पत्रकारिता पेशा नहीं, यह जनसेवा का माध्यम है। डेविड हॉफमन की पुस्तक सिटीजन्स राइजिंग : इंडिपेंडेंट जर्नलिज्म एंड दी ज़्..ऑफ डेमोक्रेसी में मीडिया के बदलतें चेहरे को दर्शाते हुए कहा गया है कि पहले पत्रकारिता सिर्फ जानकारी का एक माध्यम था लेकिन अब यह समाज का आईना बन चुकी है और इसमें समाज को बदलने में पत्रकारिता की ताकत को बताया गया है। अंग्रेजी अखबार डेली मिरर के पत्रकार लार्ड थामसन ने पत्रकारिता के बारे में लिखा है कि जनता को वह बताओ जो वह सुनना चाहती है। यानी अब पाठकों को उनकी रूचि की खबरें देनी होंगी और व्यक्ति की सबसे पहली रूचि उसके अपने आसपास के परिवेश की जानकारी में होती है।

इसलिए अब पत्रकारिता का स्वरूप बदल चुका है। अखबार पाठकों की अभिरुचि आधारित होने लगें हैं। प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गई है कि अब पाठकों की पसंद का अखबार निकालना मीडिया समूहों की प्राथमिकता ही नहीं एक मजबूरी बन गई है। चूंकि स्थानीय खबरें सदा से ही पाठकों की पहली पसंद रही हैं इसलिए शहर की खबरें यानी सिटी रिपोर्टिंग ही उनके बीच सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा बन गई है। आज अखबार के छह से सात पेज सिटी रिपोर्टिंग की खबरों से भरे होते हैं। सबसे ज्यादा और जल्दी प्रभाव और पाठक प्रतिक्रिया भी सिटी की खबरों में होती है। यही नहीं, अखबारों का पूरा अर्थशास्त्र व विज्ञापन भी सिटी रिपोर्टिंग पर टिका है।

सूचना व संचार के माध्यमों में हुए तकनीकी विकास से दुनियाभर में मीडिया का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। डिजिटल मीडिया के बढ़ते दायरे ने मीडिया के ही दूसरे स्वरूपों के समक्ष चुनौती खड़ी कर दी हैं। ख्यात पत्रकार एन राम ने -मीडिया लॉंड्री.काम – पर प्रदर्शित अपने आलेख इंडियन प्रिंट मीडिया स्टिल है टाइम बिफोर नेगेटिव ट्रेंड स्टार्टस में डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित करते हुए लिखा है कि प्रिंट मीडिया को भी अब अल्टरनेट ढूंढऩा चाहिए। युएसए में डिजिटल मीडिया की ग्रोथ के कारण अ$खबार की रीडरशिप में काफी गिरावट हुई है। जबकि भारत में प्रिंट रीडरशिप अभी भी बढ़ रही है। खासकर के हिंदी और रीजनल अखबारों की। हाल ही जारी एबीसी की ताजा रिपोर्टों में खुलासा किया गया है कि अन्य अखबारों की तुलना में हिंदी अखबारों के पाठकों की संख्या में वृद्धि हो रही है। यह संभव हो पा रहा है हिंदी प्रिंट मीडिया के लोकल स्वरूप के कारण, उसमें स्थानीय खबरों को मिल रहे महत्व के कारण, उसकी मजबूत सिटी रिपोर्टिंग के कारण।

इसलिए केवल प्रिंट मीडिया ही नहीं, समग्र मीडिया के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे अपनी खबरों के केंद्र में स्थानीयता को रखे। लोकल खबरों को प्राथमिकता दे। डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव का सबसे बड़ा कारण है इसका लोकल और हाइपर लोकल स्वरूप। राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय खबरें तो न्यूज एजेंसियों व रेडियो-टीवी पर लंबे समय से उपलब्ध थीं। पर अब अपने शहर, अपने मोहल्ले में घटी किसी घटना की सूचना भी उसे वेब पोर्टल या मोबाइल एप्प पर तत्काल मिल जाती है। ऐसे में इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया के लिए भी यह महत्वपूर्ण हो गया है कि वह लोकल खबरों को कितना जल्दी और अन्यों से अलग व बेहतर रूप में अपने रीडर को पहुंचा सकता है। उसकी लोकल खबर रीडर को कितना प्रभावित कर सकती है, उसे अपने अखबार या चैनल से कितना जोड़े रख सकती है, इसी पर उस अखबार या चैनल का भविष्य निर्भर करने लगा है।

यही कारण है कि अखबारों का स्वरूप भी अब लोकल से हाइपर लोकल होता जा रहा है।

उदाहरण के तौर पर राजस्थान के दोनों प्रमुख अखबार स्थानीय पाठकों जोडऩे की कवायद में जिला पुलआउट से सेक्टर पुलआउट तक प्रकाशित करने लग गए हैं। दोनों अखबार जयपुर में सेक्टर स्तर तक के पुलआउट निकाल रहे हैं, ताकि उस सेक्टर विशेष की हर सूचना, गतिविधि, समस्या की जानकारी अपने पाठकों को दे सकें। राजस्थान पत्रिका का पुलआउट मानसरोवर पत्रिका तथा दैनिक भास्कर का पुलआउट वार्ड भास्कर सिटी रिपोर्टिंग में हाइपर लोकल की शुरुआत के ताजा उदाहरण हैं।

किसी भी शहर में अपनी प्रसार संख्या बढाने के लिए अब अखबार सबसे पहले वहां की सिटी रिपोर्टिंग को आधार बनाते हैं। इतना ही नहीं, सिटी रिपोर्टिंग अब अखबार या चैनल्स की रीडरशिप और व्यूअरशिप का भी पैमाना बन गई है। किसी अखबार की सिटी रिपोर्टिंग ही उस शहर में उस अखबार की रीडरशिप की संख्या की निर्धारक होती है। किसी अखबार की सिटी रिपोर्टिंग जितनी मजबूत और लाइव होगी उतनी ही ज्यादा उस शहर में उस अखबार की प्रसार संख्या बढऩे के अवसर रहेंगे। सिटी रिपोर्टिंग की इस अहमियत को समझते हुए सभी बड़े न्यूज चैनलों ने लगभग हर राज्य व शहर में अपने रीजनल और लोकल न्यूज चैनल शुरू कर दिए हैं। सिटी कवरेज ही उनकी टीआरपी मापने का आधार बनी हुई है।

सिटी रिपोर्टिंग किसी भी मीडिया के लिए कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मीडिया के लिए मार्केट सर्वे व रिसर्च करने वाली एजेंसिया अपने सर्वे व रिसर्च में छोटे-छोटे शहरों को अपना केंद्र बनाती हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि आने वाले समय में मीडिया का भविष्य इस बात से तय होगा कि इन शहरों और कस्बों में किस मीडिया की कितनी पहुंच है। इसलिए सभी मीडिया संस्थान एक-एक शहर को केंद्र में रखते हुए अपनी रिपोर्टिंग व कार्यक्रमों को तय कर रहे हैं। इस दृष्टि से आने वाले समय में सिटी रिपोर्टिंग का महत्व और भी बढऩा तय है।

हिंदी पत्रकारिता के विकास की सबसे ज्यादा संभावना सिटी रिपोर्टिंग के क्षेत्र में हैं। इसलिए हिंदी अखबारों में अब सिटी रिपोर्टिंग को लेकर यद्यपि काफी काम होने लगा है, बहुत से प्रयोग भी हुए हैं, पर अभी और बहुत काम होना है। सिटी रिपोर्टिंग के मायने, बीट सिस्टम, खबरों की प्रस्तुति, आदि के संबंध में बहुत सी पुरानी धारणाएं अप्रासंगिक हो चुकी हैं। उन्हें नए प्रतिमानों की कसौटी पर परखना, उनमें बदलाव लाना जरूरी है। इसके लिए सिटी रिपोर्टर्स को नई सोच व नई तकनीक को अपनाने के साथ ही काम करने के पुराने तरीके भी बदलने होंगे। नवीन सोच, अनुसंधान, प्रयोग व विशेषज्ञताओं को अपनाना होगा, तभी वे सिटी रिपोर्टिंग के क्षेत्र में आ रही नई मुश्किलें और नई चुनौतियों का मुकाबला करने में सक्षम होंगे।

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