मुक्त सूचना प्रवाह, यूनेस्को और अमेरिकी दबदबा

शिवप्रसाद जोशी
( वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक, देहरादून)

सूचना प्रवाह का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

जहाजी बेड़ों के विकास, नाविकों की उपलब्धता और हुकूमतों के बाहरी दुनिया से संपर्क की महत्वाकांक्षाओं को अमलीजामा पहनाने के लिए 15वीं सदी से अभियान शुरू किए गए थे। वजहें आर्थिक, राजनैतिक और धार्मिक थीं। यूरोपीय नाविको ने अफ्रीका, एशिया, लातिन अमेरिका के लिए बीहड़ और लंबी यात्राएं की। उन्होने वहां अपार प्राकृतिक और मनुष्य संसाधन पाया। ये व्यापारी अपने साथ कच्चा माल यूरोप लाए और आनाजाना करते रहे। उन दुर्गम इलाकों के स्थानीय लोग और आदिवासी गुलाम बने, कच्चा माल निकालते रहे और यूरोप संपन्न और शक्तिशाली और सूचना समर्थ बनता गया। उसके विकास का पहिया तेज़ी से घूमा। उद्योग और तकनीकी और कच्चे माल के लिए कॉलोनियो पर आधिपत्य ने उसे सूचना और ज्ञान के क्षेत्र में लंबी छलांग की ओर अग्रसर किया। राजनैतिक मशीनरी की बदौलत उन इलाकों पर क़ब्ज़े किए गए। अपनी ही जमीनों पर वहां के लोग गुलाम बन गए।

ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, नीदरलैंड्स जैसे यूरोपीय देशों ने एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका में स्थापित अपनी कॉलोनियों के दम पर अत्यधिक अमीरी हासिल की। बड़े पैमाने पर हुए लाभ से निवेश किए और औद्योगिक क्रांति को अंजाम दिया। बड़े पैमाने पर पूंजी जमा हो जाने के बाद और आर्थिक तौर पर समृद्धि हासिल कर लेने के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य, शोध, तकनीकी जैसे क्षेत्रों में निवेश किए गए। आर्थिक लाभ ने तरक्की के नए रास्ते इन साम्राज्यवादी देशों में खोल दिए। आर्थिक आधार की मज़बूती ने इन देशों में शुरुआती संचार और सूचना क्रांति का सूत्रपात किया। वायरलेस, टेलीग्राफ, टेलीफ़ोन, प्रिटिंग प्रेस के आविष्कार हुए। न सिर्फ़ सूचना और संचार के उपकरण बल्कि सूचना के प्रवाह में भी इन देशों ने बढ़त हासिल की। प्रभुत्व और क़ब्ज़े की लड़ाई और सघन हुई। संचार नेटवर्क की बदौलत ये देश आधिपत्य के एक दौर में दाखिल हुए।

इन यूरोपीय देशों का डंका 19वीं सदी तक बजता रहा। 19वीं सदी में ही एक नई विश्व शक्ति के उदय की आहट आने लगी थी और वो था अमेरिका। यूरोपीय कब्ज़ों और गृहयुद्धों से अनथक संघर्षों और उनमें विजय हासिल कर अमेरिका ने तेज़ी से विश्व पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। औद्योगिक क्रांति से अभिभूत यूरोप के सामने अमेरिका ने सूचना और ज्ञान की नई तकनीकी का विकास किया। नई खोजें की। संचार के नेटवर्क को आधुनिक बनाया और गेंद यूरोप के पाले से छीनने का चौतरफ़ा अभियान शुरू किया। यूरोप के सूचना उद्यम खासकर ब्रिटेन की रॉयटर्स और फ्रांस की एएफ़पी जैसी समाचार एजेंसियों के वर्चस्व को तोडऩे के लिए अमेरिका में सूचना उद्योग ने नई करवट ली। महासागरीय केबलो के नियंत्रण ने अमेरिका का दबदबा बढ़ाया। इसी दौरान अमेरिकी समाचार एजेंसी एपी ने यूरोपीय एजेंसियों को टक्कर देने के लिए अपना विस्तार किया और इस तरह अमेरिकी सत्ता और अमेरिकी उद्यम की आर्थिक और राजनैतिक प्रभुत्व क़ायम करने की चेष्टा का एक तरह से विलय हुआ। यूरोप और दुनिया के कई अन्य हिस्सों की कवरेज के लिए यूरोपीय एजेंसियों पर निर्भर रहने वाली समाचार एजेंसी, एपी(एसोसिएटड प्रेस) ने अपना साम्राज्य बढ़ाया और बने बनाए कार्टल को भंग कर प्रतिस्पर्धा मे कूद गया। वायरलेस ट्रांसमिशन अमेरिकी सूचना उद्योग के विकास में एक अहम अवसर साबित हुआ और इस तरह वैश्विक सूचना परिदृश्य अमेरिकी पक्ष में झुक गया।

उसी दौरान अमेरिका में समाचार पत्र उद्योगों ने सूचना की आज़ादी और निर्बाध संचार प्रवाह की वकालत जोरशोर से शुरु कर दी। अमरेकी कांग्रेस को भी ये एप्रोच रास आई और मुक्त प्रवाह का सिद्धांत धीरे धीरे जन्म लेने लगा। इस प्रवाह की बुनियाद में फ़लसफ़ा सीधे सीधे मुनाफ़े का ही था। मुनाफे के प्रवाह को अवरुद्ध न करने देने की एक किस्म की प्रतिबद्धता अमेरिकी विचार में चली आई, पूंजीवाद का एक आग्रह इस तरह पूरा हुआ। और तो और अमेरिका ने 1948 के संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार घोषणापत्र में भी अपने विचार के कुछ बिंदु छोड़ दिए। मुक्त प्रवाह को आदर्श की तरह स्थापित करने की भरसक कोशिश की जाती रही। अमेरिका का उस वक्त तक संचार प्रौद्योगिकी में बढत हासिल हो चुकी थी लिहाजा मुक्त प्रवाह की अवधारणा हर हाल में उसी के पक्ष में रह जाने वाली थी। आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय संचार पर अमेरिकी पकड़ इस तरह उत्तरोत्तर मजबूत होती चली गई।

20वीं सदी में प्रथम विश्व युद्ध के खात्मे के बाद अमेरिका एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरने लगा था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान और उसके पश्चात तो विश्व राजनीति और आर्थिकी में उसका बोलबाला हो गया। सूचना का असली युद्ध दूसरे विश्व युद्ध के बाद शुरू हुआ जिसे शीत युद्ध का काल भी कहा जाता है। दुनिया दो राजनैतिक और आर्थिक विचारधाराओं वाले दो ध्रुवों में बंट गई, एक ओर पूंजीपति अमेरिका था तो दूसरी ओर समाजवादी सोवियत संघ। इसी दौरान तीसरी दुनिया भी बनी जिसमें इन दोनों विचारधाराओं से अलग एक गुटनिरपेक्ष मंच प्रकट हुआ। भारत, मिस्र और यूगोस्लाविया जैसे देश इसकी अगुवाई कर रहे थे। सोवियत संघ के विघटन के साथ अमेरिका के रूप में एकध्रुवीय सूचना विश्व तैयार हो गया।

सूचना युद्ध में अमेरिका की एक तरह से जीत हुई और उसकी अगुवाई में पूंजीपति देशों का वर्चस्व बढ़ता गया। सूचना के प्रवाह पर अमेरिका का नियंत्रण हुआ, वह बढ़ता चला गया, कुछ कोशिशें इस प्रवाह का रुख बदलने की बीसवीं सदी के आखिरी दशकों में की गईं लेकिन अंतत: ये अमेरिकी प्रवाह और प्रबल हुआ। तब इसे नाम मिला सांस्कृतिक साम्राज्यवाद। अमेरिकी संस्कृति ही इस सूचना प्रवाह का स्रोत बन गई और जो भी सूचना व्यवस्थाएं पूरी दुनिया में निर्मित हुई उनमें किसी न किसी रूप में इस संस्कृति की छाप देखने को मिली। इससे छुटकारा असंभव होता गया और आज 21वीं सदी के दो दशक बाद हम ऐसे वैश्विक समय में हैं जहां अमेरिका द्वारा निर्मित कथित मुक्त सूचना प्रवाह अपने पूरे वेग से राष्ट्र-राज्य की सीमाओं को धुंधला कर रहा है, मूल्यों और स्थानीय संस्कृतियों को प्रभावित कर रहा है और एक नया वैल्यू सिस्टम गढ़ चुका है जिसे हम कभी भूमंडलीकरण, कभी ग्लोबल गांव, कभी मुक्त अर्थव्यवस्था तो कभी आर्थिक उदारवाद के रूप में कहते सुनते हैं। इस सिस्टम के मूल में जाहिर है निर्बाध सूचना प्रवाह है। जो एक छोर से आता हुआ पूरी दुनिया में बह रहा है।

मुक्त समाज, मुक्त सूचना, मुक्त इकोनमी यही इस दौर का मंत्र बन गया है। एक समय गुटनिरपेक्ष रहने वाली विकासशील अर्थव्यवस्थाएं इस मंत्र पर मुग्ध हैं और उसे अपनी तरक्की के लिए लागू कर रही हैं। 15वीं और 16वीं सदी के उपनिवेशों का दौर चक्कर काटता हुआ 21वीं सदी में नई शक्लों में हमारे सामने आता रहा है। कुछ समय पहले तक यानी 20वीं सदी के अंत तक वो आर्थिक उपनिवेश का दौर कहलाता था तो अब उसे सूचना उपनिवेश का दौर कहा जाता है। ज्ञान का उपनिवेश भी ये दौर कहलाया जाने लगा है। विकासशील देश, गरीब देश अब सूचना और ज्ञान के उपनिवेश बन गए हैं। और अमेरिकी बाज़ार संस्कृति का एकाधिकार हो चुका है। इस वर्चस्व को तोडऩे की कोशिश अपने स्तर पर चीन जैसे देश कर रहे हैं, लेकिन इस लड़ाई का अंजाम अभी आना बाक़ी है। क्योंकि चीन का मॉडल भी पूंजीवादी अवधारणा से ही प्रश्रय पाता रहा है।

1970, यूनेस्को और एनवाइको

1970 का दशक अंतरराष्ट्रीय संचार और सूचना प्रवाह की वैश्विक बहस के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। विकासशील देश जो उस समय तक गुटनिरपेक्ष छतरी के नीचे एकजुट हो चुके थे और उन्हें गुटनिरपेक्ष देश भी कहा जाने लगा था, मुक्त सूचना प्रवाह का मुखर विरोध कर रहे थे। दूसरी बात इस प्रवाह के समांतर अपना एक संतुलित पारदर्शी और सामूहिक सूचना तंत्र विकसित करने का विचार सामने आया। इसी कड़ी में गुटनिरपेक्ष समाचार एजेंसी पुल का गठन 1975 में किया गया था। मुक्त प्रवाह को मुक्त और संतुलित प्रवाह की अवधारणा के रूप में बदलने का बीड़ा उठाया गया और सबसे महत्त्वपूर्ण कदम ये सामने आया कि सूचना प्रवाह के असंतुलन और अन्य गड़बडय़िों की जांच के लिए एक अंतरराष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया। जिसे हम मैकब्राइड आयोग के रूप में जानते हैं।

अंतरराष्ट्रीय संचार की सैद्धांतिकी को देखें तो राष्ट्रीय और सांस्कृतिक प्रणालियों के बीच संचार प्रक्रिया में हर राष्ट्र को स्वत:स्फूर्त, मुक्त और निर्णायक ढंग से भागीदार होना चाहिए। लेकिन वास्तविकता इस सिद्धांत से अलग रही है। राष्ट्रों के बीच मतभेदों को छोड़ दें तो बड़े छोटे, अमीर गऱीब, संसाधन संपन्न और विपन्न का फ़ासला बहुत चौड़ा है। यहीं पर सूचना की आवाजाही का सवाल भी निहित है। पहले से सूचना संपन्न देशों में सूचना की आवाजाही सघन है लेकिन पिछड़े मुल्कों में इस आवाजाही की गति या तो बेहद धीमी है या नगण्य है। अंतरराष्ट्रीय समाचार प्रवाह प्रणाली में किसी राष्ट्र या उसके मीडिया संस्थानों का दर्जा तय होता है इस बात से कि वहां का राष्ट्रीय मीडिया तंत्र किस तरह की भूमिका निभाता है: उपभोक्ता-खऱीददार की भूमिका या ग्राहक-विक्रेता की भूमिका। अर्थव्यवस्था ही तय करती है कि समाचार संकलन और वितरण का बुनियादी ढांचा कैसा होगा। इस दिशा में मौजूद कई विसंगतियों को देखते हुए यूनेस्को ने 1961 में एक प्रस्ताव तैयार किया था जिसके मुताबिक किसी देश के 100 निवासियों के लिए सूचना मुहैया कराने के उद्देश्य के तहत दैनिक अखबार की दस प्रतियां, पांच रेडियो रिसीवर और दो टीवी सेट अपेक्षित माने गए थे। लेकिन वित्तीय संसाधनों, तकनीकी और मैनपावर की कमी के चलते उस दौरान कई नवसृजित और विकासशील देश इस स्थिति में नहीं थे कि अपने यहां उत्पादक-वितरक के स्वरूप वाले मीडिया को स्थापित कर पाते। लिहाज़ा उनके पास इसके सिवा कोई विकल्प नहीं था कि पश्चिमी जगत के मीडिया द्वारा उत्पादित और वितरित समाचार सामग्री के उपभोक्ता-खऱीददार बन जाएं। इस सामग्री में हार्डवेयर, तकनीकी और सॉफ़्टवेयर प्रोग्राम भी शामिल थे। अब ऐसी स्थिति का अर्थ ये हुआ कि पश्चिमी मीडिया और उसकी एजेसियां ही दुनिया में समाचार प्रवाह की दिशा तै करती हैं, किसी घटना पर ये एजेंसियां जिस तरह से रिपोर्ट करती हैं, उपभोक्ताओं का दृष्टिकोण वैसा ही बनेगा, समाचार प्रवाह एकतरफ़ा होगा और इस प्रवाह में विकासशील और पिछड़े देशों के बारे में कम ख़बरें होंगी और अगर होंगी तो वे नकारात्मक ही होंगी। मिसाल के लिए हिंसा, तख्ता पलट, गरीबी, अशिक्षा, बेकारी, भुखमरी और मौतें। विकासशील या तीसरी दुनिया के देशों के समाज में फैली जलालत ही पश्चिमी एजेंसियों के लिए $खबर थी लेकिन उन देशों के संघर्ष, विकास और बदलाव की कहानियां उन एजेंसियों में जगह नहीं बना पाती थीं।

यही वे वजहें थीं जिनके चलते विकासशील देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय होकर इस एकतरफ़ा और असंतुलित समाचार प्रवाह को दुरुस्त करने के लिए एकजुट हुए। इन देशों ने अंतरराष्ट्रीय संचार के इस गंभीर पहलू की ओर न सिर्फ ध्यान देना शुरू किया बल्कि इसके ख़िलाफ़ आवाज़ें भी उठने लगीं। अमेरिकी और यूरोप से आयात होने वाले सांस्कृतिक उत्पादों जैसे किताबें, फिल्में, संगीत, टीवी कार्यक्रम और पत्रिकाएं आदि के ज़रिए एक तरह से सांस्कृतिक दबाव विकासशील देशों पर पडऩे लगा। जिसे बाद में कल्चरल इम्पीयरिलिज़्म यानी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के तौर पर चिंहित किया गया। इस तरह अमेरिका द्वारा प्रसारित और प्रायोजित मुक्त प्रवाह का सिद्धांत सवालों और बहस के घेरे में आया।

एनवाइको का गठन

इन्हीं सवालों के बीच एक नई विश्व सूचना और संचार व्यवस्था (New World Information and Communication Order -NWICO – एनवाइको) बनाने की मांग उठने लगीं। यूनेस्को इस मांग का प्रमुख मंच भी बना और ज़रिया भी। विकासशील देशों की बढ़ती संख्या के बीच उनकी मांग को नज़रअंदाज़ किए रखना संभव नहीं रहा। इस तरह एनवाइको के इतिहास में चार प्रमुख चरण रहे हैं।

पहला चरण 1973-76 का था जिसमें नई व्यवस्था की मांग ने जन्म लिया और उसका आकार बनना शुरू हुआ। दूसरे चरण में 1976-1979 के तहत एनवाइको की मांग की सार्थकता के पक्ष में बड़े पैमाने पर शोध, आंकड़े और प्रमाण जुटाए गए। तीसरे चरण यानी 1980 में मैकब्राइड आयोग की रिपोर्ट का प्रकाशन हुआ, इसे यूनेस्को में पेश किया गया और यूनेस्को ने इसे मंज़ूर किया और आईपीडीसी यानी इंटरनेशनल प्रोग्राम फ़ॉर डेवलेपमेंट ऑफ़ कम्यूनिकेशन (IPDC) का गठन किया गया।

लेकिन एनवाइको की राह इतनी आसान नहीं थी। एक लंबी लड़ाई और अनथक श्रम इसके पीछे था और इस सारी जद्दोजहद के पीछे था नैम(NAM-Non Aligned Movement), जिसके तहत दुनिया के गुटनिरपेक्ष देश संगठित हुए थे। गुटनिरपेक्ष देशों ने ये जान लिया था कि संचार, $गरीबी और बेकारी से उनके संघर्ष का एक प्रमुख औजार बन सकता है, इसलिए इस लड़ाई को और शिद्दत से उसके मुकाम तक पहुंचाना ज़रूरी था और इसके लिए ज़रूरी था मुक्त सूचना प्रवाह की ख़ामियों को लक्षित कर उन्हें दूर करना। और ऐसा बिना किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन की मदद के संभव नहीं था क्योंकि इस प्रवाह के सूत्रधार और निर्माता बड़े और विकसित देश थे, अमेरिका जिनमें प्रमुख था। इसलिए संयुक्त राष्ट्र के संगठन यूनेस्को को मंच बनाया गया और वहीं पर पुरज़ोर बहसें हुईं। एनवाइको से पहले एनआईईओ का गठन भी किया गया था, (न्यू इंटरनेशनल इकोनमिक ऑर्डर- NIEO.)  लेकिन सूचना विसंगतियों की सघनताओं और अन्य पेचीदगियों के बीच एक नई और विस्तृत अवधारणा की ज़रूरत महसूस की गई और इस तरह एनवाइको का जन्म हुआ।

गुटनिरपेक्ष देशों का अलग रास्ता

1973 में अल्जीरिया की राजधानी अल्जीयर्स मे गुटनिरपेक्ष देशों के विदेश मंत्रियों की एक महत्त्वपूर्ण बैठक हुई। इसमें दोनों महाशक्तियों से अलग एक स्वतंत्र रास्ता अख़्तियार करने का फ़ैसला किया गया ताकि दोनों में से किसी के हाथों की कठपुतली न बन जाएं। ये देश तीसरे विकल्प पर ज़ोर दे रहे थे। बाद के वर्षों में एनवाइको का मुद्दा इस तीसरे विकल्प को आगे बढ़ाने का प्रमुख बिंदु बनता गया और इस दिशा में पेरु, ट्यूनिशिया, मेक्सिको, भारत और श्रीलंका में गुटनिरपेक्ष देशों के सेमिनार हुए। 1974 में यूनेस्को का 18वां आम सम्मेलन हुआ जिसमें मास मीडिया डिक्लेरेशन, एमएमडी के ड्राफ्ट पर बहस हुई। लेकिन विकसित और विकासशील देशों का टकराव इतना तेज़ हो चुका था कि यूनेस्को ने इस मुद्दे पर ज़्यादा विवाद में पडऩे से बेहतर ये समझा कि इस मुद्दे को विशेषज्ञों के एक पैनल के हवाले कर दिया जाए।

1976 में नैरोबी में यूनेस्को की जनरल असेंबली की 19वीं बैठक हुई जिसका प्रमुख विषय था: सूचना की जीवंत भूमिका और सूचना नीतियों के ज़रिए विकास को गति देना। विकासशील देश पश्चिमी सूचना आयात के बदले अपने स्थानीय सूचना पर्यावरण को मजबूत बनाना चाहते थे और यह बैठक इसी दिशा में विचार करने वाली थी। यूनेस्को के तत्कालीन महानिदेशक थे- अफ्रीकी देश सेनेगल के नेता अमादाऊ महतार मैबाऊ। उनके लिए ये बैठकें एक नया इतिहास रचने की तरह थीं। बैठक में जो भावना पेश की गई थी उसे ‘स्पिरिट ऑ$फ नैरोबी’ कहा गया था। मीडिया के रोल और सरकार की भूमिकाओं पर लंबी बहसों के बाद नैरोबी में आखिरकार एक प्रस्ताव तैयार किया गया जिसमें 12 अनुच्छेद रखे गए थे। 12वां अनुच्छेद ही बैठक में छाया रहा जिसके तहत मीडिया गतिविधियों के संचालन के लिए सरकार की जवाबदेही बताई गई थी। संकेत ये था कि मीडिया पर सरकार का प्रभावी नियंत्रण रहना चाहिए। ज़ाहिर है सूचना के मुक्त प्रवाह के पक्षधर बड़े देश ऐसे किसी नियंत्रण या नियमन के $िखला$फ थे। ये बैठक टकराहट के बीच बिना किसी मक़सद के ख़त्म न हो जाए, इस बात से आशंकित मैबाऊ ने एक चतुराई भरा $फैसला किया और सभी देशों को इस विषय पर एक आयोद के गठन के लिए राज़ी करा लिया। इस तरह यूनेस्को ने संचार समस्याओं के अध्ययन के लिए अंतरराष्ट्रीय आयोग का गठन कर दिया। आयरलैंड के सीनेटर शॉन मैक्ब्राइड इस आयोग के अध्यक्ष बना दिए गए। इसे मैक्ब्राइड कमीशन भी कहा गया। मैक्ब्राइड कमीशन में नामीगिरामी और अपने दौर के धुरंधर पत्रकार, लेखक और चिंतक शामिल थे। 16 सदस्यों में से भारत की ओर से इसमें प्रख्यात पत्रकार और हिंदुस्तान टाइम्स के तत्कालीन संपादक बीजी वर्गीज़ थे। इसी कमीशन में कोलंबिया से नोबेल पुरस्कार विजेता मशहूर उपन्यासकार और पत्रकार गाब्रिएल गार्सिया मार्केस भी शामिल थे।

1978 में यूनेस्को की 20वीं आम सभा में मास मीडिया प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी गई। बेलग्रेड में यूनेस्को की 21वीं आम सभा 1980 में बुलाई गई और अंतरराष्ट्रीय संचार की दिशा में वैश्विक बहसों का ये एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव था। इस बैठक में न सि$र्फ मैक्ब्राइड कमीशन की रिपोर्ट को स्वीकृति मिली बल्कि यहीं से एक नया झगड़ा अमेरिका बनाम गुटनिरपेक्ष देशों के बीच शुरू हुआ जिसका $खामियाज़ा ज़ाहिर है पिछड़े देशों के वंचित शोषित और सूचनाविहीन जन को किसी न किसी रूप में भुगतना पड़ा।

21वीं आमसभा में 39 सदस्यों वाले ‘इंटरनेशनल प्रोग्राम फॉर द डेवलेपमेंट ऑ$फ कम्यूनिकेशन’ (आईपीडीसी) का गठन किया गया था। इस कार्यक्रम का मुख्य कार्य था गरीब देशो में संचार परियोजनाओं को मदद मुहैया कराना। लेकिन इसकी फंडिंग को लेकर अमेरिका अड़ गया। उसका कहना था कि आईपीडीसी के लिए अंतरराष्ट्रीय कोष में वो मदद का वादा नहीं कर सकता। उलटा उसने सुझाव दिया कि यूनेस्को के नियमित जनसंचार बजट से ही इस प्रोग्राम के लिए पैसे निकाल जाएं। अमेरिकी नाराज़गी यहीं नहीं थमी। मैक्ब्राइड कमीशन की सिफारिशों और प्रस्तावों से वो और आगबबूला हुआ और उसने यूनेस्को छोड़ देने की धमकी दे दी।

अमेरिका का अड़ंगा और यूनेस्को का रोल

पेरिस में यूनेस्को की 22वीं आमसभा वैश्विक तनाव और टकराव के लिहाज़ से निर्णायक साबित हुई। अमेरिका का रवैया अडय़िल बना रहा। उसने यूनेस्को और गुटनिरपेक्ष देशों पर सूचना के मुक्त प्रवाह को नियंत्रित करने के आरोप लगाए, वाद विवाद और हंगामे के बीच बैठक तो ख़त्म हो गई लेकिन अमेरिका ने बैठक के प्रस्तावों से भडक़ कर यूनेस्को से हटने का फ़ैसला कर लिया। दिसंबर 1984 में अमेरिका ने यूनेस्को से किनारा कर लिया।

मैकब्राइड कमीशन की सिफ़ारिशें जहां की तहां रह गईं। अमेरिका और मित्र देशों ने उन्हें मानने से साफ़ इंकार कर दिया। गुटनिरपेक्ष देशों की लड़ाई लडख़ड़ा गई। देश अपनी अपनी विवशताओ में लौट गए। पूंजी का निर्मम चक्र अपना काम करता रहा। मैबाऊ ने 1986 में यूनेस्को का महानिदेशक पद छोड़ दिया। अमेरिका के हितैषी माने जाने वाले स्पेन के फेदेरिको मायर 1987 में यूनेस्को के प्रमुख बने। 1999 तक पद पर रहे मायर ने मैबाऊ और गुटनिरपेक्ष देशों की कोशिशों को झटका देते हुए यूनेस्को की भूमिका ही बदल दी और एनवाइको का समर्थन भी नहीं किया।

विश्व पटल पर एकध्रुवीय शक्ति के रूप में अमेरिका के आने की ये जोरदार आहटें थीं और मायर जैसे लोग उसकी इस रणनीति को सफल बनाने में अपनी तरह की कोशिशें कर रहे थे। 1989 में यूनेस्को की 25वीं आम सभा में मायर ने एक नई संचार रणनीति जारी कर दी। इसका जोर प्रेस की आज़ादी की पश्चिमी अवधारणा पर था। स्वतंत्र और बहुविध मीडिया का विकास और अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसी आकर्षक मान्यताओं के साथ मायर ने एक तरह से मुक्त प्रवाह की धारा में इस बीच आए गतिरोध हटाने शुरू कर दिए थे। जब ऐसा हुआ था तो जाहिर है अमेरिका के लिए मु$फीद स्थिति बनी और उसने यूनेस्को में लौटने का फ़ैसला कर लिया। हालांकि इस काम के लिए उसे कोई हड़बड़ी नहीं थी। उसका एजेंडा यूनेस्को में प्राथमिकता में आने लगा था। 1995 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने यूनेस्को में लौटने की इच्छा जताई लेकिन ये रवैया ऐसा था कि अच्छा सोचेंगे, देखते हैं, कब वक़्त मिलता है। यूनेस्को पर एक कृपा उन्होंने और यह कहकर भी कि यूनेस्को का सदस्यता शुल्क जो पिछले कई वर्षों से लंबित था और जो उस समय तक डेढ़ अरब डॉलर से ज्यादा हो चुका था, उसे अमेरिका लौटा देगा। 1999 में ये रकम लौटाने का वादा किया गया था।

यूनेस्को में अमेरिकी आधिपत्य और दबंगई का एक दौर था लेकिन साल 2013 में उससे वोट देने के अधिकार छीन लिया गया क्योंकि उसने कोष में अपना निर्धारित फ़ंड कई वर्षों से जमा ही नहीं कराया। इस बारे में गहराई से जानने के लिए जर्मन रेडियो डॉयचे वेले की हिंदी वेब सेवा की उस मामले पर तत्कालीन ख़बर को यहां जसकातस पेश किया गया है:-

दुनिया की संस्कृति, विज्ञान और शिक्षा पर अमेरिकी प्रभाव को एक करारा झटका लगा है। दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को में अमेरिका के वोट देने का अधिकार खत्म हो गया है। पैसा न देने की वजह से छिना अधिकार।

अमेरिका ने यूनेस्को का पैसा एक फैसले के विरोध में रोक रखा है। यह फैसला 2011 में फलीस्तीन को यूनेस्को का सदस्य बनाने का था। इस्राएल और अमेरिका ने विरोध जताने के लिए यूनेस्को को पैसा देना बंद कर दिया। इन दोनों देशों के पास शुक्रवार सुबह तक का समय था कि वो या तो पैसा जमा करते या फिर अपनी स्थिति के बारे में जानकारी देते। दोनों ने ऐसा नहीं किया, इस वजह से यूनेस्को के नियमों के तहत उनके वोटिंग का अधिकार अपने आप ही खत्म हो गया।

अमेरिका हर साल यूनेस्को को करीब 8 करोड़ डॉलर देता है जो उसके कुल राजस्व का करीब 22 फीसदी है। अमेरिका के पैसा न देने की वजह से संयुक्त राष्ट्र की इस एजेंसी को आर्थिक दिक्कत का सामना करना पड़ा। पिछले दो साल में होलोकॉस्ट एजुकेशन और सूनामी रिसर्च जैसे कई कार्यक्रम बंद कर देने पड़े। अमेरिका में कई लोग इस बात से चिंतित हैं कि उनका देश यूनेस्को का एक गैरप्रभावशाली सदस्य बनने की राह पर है। उन्हें डर है कि शिक्षा के जरिए आतंकवाद से लडऩे, लैंगिक समानता और प्रेस की आजादी जैसे मुद्दों पर अमेरिकी आवाज कमजोर पड़ जाएगी। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यूनेस्को में अमेरिका के कमजोर होने से इस्राएल विरोधी भावना बढ़ेगी क्योंकि यहां क्षेत्रीय विवाद के कारण अरब नेतृत्व में इस्राएल की आलोचना हमेशा से एक मुद्दा रहा है।

अप्रभावी अमेरिका

यूनेस्को के लिए अमेरिका की राष्ट्रीय आयुक्त फाइलिस मागराब ने कहा, ‘हम पहले जैसा दम नहीं रख पाएंगे। हमारे पास सारे हथियार नहीं होंगे, हमारा हथौड़ा ही नहीं होगा।‘ यूनेस्को मामले की वजह से अमेरिकी कानूनों की भी आलोचना हो रही है। इन कानूनों की वजह से ही फलीस्तीन के सदस्य बनते ही संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी को भुगतान रुक गया। जिन देशों के वोट देने का अधिकार खत्म हुआ है उनके नाम शनिवार को यूनेस्को की आम सभा में पढ़े जाएंगे।

फलीस्तीन से मुश्किल

यूनेस्को में इस्राएल के राजदूत नीमरोद बारकान ने समाचार एजेंसी एपी से कहा कि उनका देश अमेरिका के उस फैसले का समर्थन करता है जिसमें, ‘फलीस्तीन जैसे किसी अस्तित्वहीन इलाके को शामिल कर यूनेस्को या किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन के राजनीतिकरण करने का विरोध किया जा रहा है।’

यूनेस्को को भले ही दुनिया भर की संस्कृतियों को अपनी विरासत में शामिल करने के कार्यक्रम के लिए जाना जा रहा हो लेकिन इसका प्रमुख मिशन एक गैर चरमपंथी संगठन बनाना था। 1946 में जब यह एजेंसी बनाई गई, तब अमेरिका इसके संस्थापकों में था और तब इसकी बुनियाद इसी सोच पर रखी गई थी। आजकल यह लोगों तक साफ पानी की पहुंच, लड़कियों की शिक्षा, गरीबी मिटाने, अभिव्यक्ति की आजादी को बढावा और हिंसक चरमपंथ से बचने के लिए रचनात्मक क्षमताओं को बढ़ावा देने के लिए काम करता है।

पैसे की कमी की वजह से यूनेस्को के कई कार्यक्रमों में पहले ही कटौती की जा चुकी है। इनमें एक कार्यक्रम इराक में पानी की सुविधा बहाल करने में मदद करने के लिए था। पैसे की कमी की वजह से अफ्रीका में होलोकॉस्ट और नरसंहार के बारे में जागरूकता का कार्यक्रम खतरे में है। इसके जरिए दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान यहूदियों के नरसंहार का उदाहरण दे कर अफ्रीका में अहिंसा, समानता और जातीय सहिष्णुता के बारे में जागरुकता फैलाने की योजना है। इस कार्यक्रम का खटाई में पडना खासतौर से अमेरिका के लिए बड़ा झटका होगा, क्योंकि 2002 में दोबारा एजेंसी में शामिल होने के बाद अमेरिका ने बहुत आक्रामक रूप से एजेंसी के इस एजेंडे को आगे बढ़ाया है। संगठन की सोच से मतभेद होने के कारण 18 साल तक अमेरिका इससे बाहर रहा था।

स्रोत और संदर्भ सामग्री:

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