

COMMUNICATION TODAY
Media Quarterly (Journal)
(Lighthouse of Media Professionals)
A Double-Blind Peer-Reviewed Bilingual Media Quarterly
204th National Webinar | Mar 23, 2026

📅 Date: Monday | Mar 23, 2026
🕠 Time: 5:30 PM onwards
💻 Mode: Online (Webinar)
🟢 Organised by: Communication Today (Quarterly Media Journal, Jaipur)
🤝 In collaboration with: Bharati Vidyapeeth, New Delhi
🎯 Subject: TV@100 Television in the Age of Streaming and Smartphones
🗓 Schedule:
🔹 Login & Networking: 5:30 PM – 6:00 PM
🔹 Experts’ Talks: 6:00 PM – 7:15 PM
🔹 Discussion & Certification: From 7:15 PM onward
🔗 Join the Webinar:
👉 Webinar Link: https://bvicam.webex.com/meet/webinar
📺 Live Streaming on YouTube:
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📝 Advance Registration (Free):
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With warm regards,
Prof. Sanjeev Bhanawat Editor, Communication Today, Jaipur
Prof. M. N. Hoda Director, Bharati Vidyapeeth, New Delhi
203rd National Webinar | Mar 17, 2026
203वाँ राष्ट्रीय वेबिनार
विषय: “Voices of Women: A Dialogue Analysis of Female Representation in Indian Cinema”
आयोजक: कम्युनिकेशन टुडे एवं भारती विद्यापीठ, नई दिल्ली
दिनांक: मंगलवार, 17 मार्च 2026
जयपुर से प्रकाशित प्रतिष्ठित मीडिया त्रैमासिक कम्युनिकेशन टुडे तथा भारती विद्यापीठ, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 203वें राष्ट्रीय वेबिनार में “Voices of Women: A Dialogue Analysis of Female Representation in Indian Cinema” विषय पर अत्यंत गंभीर, समसामयिक और दूरगामी महत्व का सार्थक विमर्श संपन्न हुआ।
मुख्य वक्ता के रूप में ओडिशा के बालासोर स्थित फकीर मोहन विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. स्मिति पाधी ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सोच, मूल्यों और लैंगिक संरचनाओं का सशक्त प्रतिबिंब है। उन्होंने फिल्मों के संवादों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि समय के साथ स्त्री की छवि में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है—जहाँ पहले उसे त्यागमयी, आज्ञाकारी और सीमित भूमिकाओं में दिखाया जाता था, वहीं आज की महिला आत्मनिर्भर, जागरूक और अपने अधिकारों के प्रति सजग रूप में उभर रही है।
डॉ. पाधी ने Mr. & Mrs. 55, भूमिका और सत्यमेव जयते जैसी फिल्मों के उदाहरणों के माध्यम से बताया कि संवाद किस प्रकार पितृसत्तात्मक सोच को या तो मजबूत करते हैं या उसे चुनौती देते हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि समकालीन सिनेमा में महिलाओं की भागीदारी और सशक्तिकरण के नए आयाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।
कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए राजस्थान विश्वविद्यालय के जनसंचार केंद्र के पूर्व अध्यक्ष एवं कम्युनिकेशन टुडे के संपादक प्रो. संजीव भानावत ने कहा कि भारतीय सिनेमा समाज की बदलती सोच का दर्पण है। उन्होंने संवादों के विश्लेषण के माध्यम से स्त्री प्रतिनिधित्व को समझने की आवश्यकता पर बल देते हुए इसे लैंगिक समानता और संवेदनशील समाज निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
कार्यक्रम का शुभारंभ भारती विद्यापीठ की सहायक प्राध्यापक सुश्री प्रियंका सिंह द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ, जिसने आयोजन को सांस्कृतिक गरिमा प्रदान की। इसके पश्चात मुख्य वक्ता को ई-बुके एवं ई-स्मृति-चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के सफल आयोजन में जयंत राठी, पुष्पेंद्र सिंह, डॉ. सुनील कुमार तथा भारती विद्यापीठ के अंबुश का विशेष योगदान रहा।
अंत में प्रतिभागियों एवं दर्शकों से आग्रह किया गया कि वे इस सार्थक विमर्श को अधिक से अधिक साझा करें तथा वीडियो को Like, Comment, Share और Subscribe कर आगामी वेबिनारों से जुड़े रहें।
Special Moments
डॉ महेंद्र भानावत
लोकपरंपराओं के अडिग प्रहरी को अंतिम प्रणाम
लोक साहित्य, परंपराओं और संस्कृति के महान संरक्षक डॉ. महेंद्र भानावत का निधन एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने अपने जीवन को भारतीय लोककथाओं, लोकगीतों, कठपुतली कला और परंपरागत लोकसंस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में समर्पित किया। उनके लेखन का विस्तार अत्यंत व्यापक था—उन्होंने लगभग 100 पुस्तकें लिखीं, 10,000 से अधिक लेख प्रकाशित किए और अपने विशिष्ट कार्यों के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के 80 से अधिक पुरस्कार प्राप्त किए।
डॉ. भानावत ने लोकसंस्कृति को शोधपरक दृष्टि से प्रस्तुत कर उसे नई पहचान दिलाई। उनकी विद्वता, सरलता और समर्पण भाव ने उन्हें लोकसंस्कृति जगत में एक विशिष्ट स्थान दिलाया।
आज उनके उड़ावणा के अवसर पर हम उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनके विचार और कार्य सदा अमर रहेंगे।
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एक मुलाकातः रीना अशोक जारोली से
प्रेम की मिसाल: पति को किडनी दान और कैंसर से संघर्ष
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही एक महिला के लिए जीवन पहले से ही एक चुनौती बन जाता है। ऐसे में इस महिला ने न केवल अपनी बीमारी से संघर्ष किया, बल्कि अपने पति के जीवन को बचाने के लिए उसे अपनी किडनी भी दान कर दी। यह निर्णय न केवल साहस और निस्वार्थता का परिचायक है, बल्कि यह हमें मानवीय शक्ति और करुणा की गहराई का भी अहसास कराता है।
इस कहानी के विभिन्न आयाम हैं। पहला आयाम है, संघर्ष और विजय का। कैंसर जैसी बीमारी से लड़ते हुए, शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम बने रहना, और उसके बावजूद अपने पति की ज़रूरत को प्राथमिकता देना अद्वितीय साहस का उदाहरण है। यह महिला न केवल एक योद्धा है, बल्कि एक ऐसी प्रेरणा है, जो हमें सिखाती है कि कठिनाइयों के बावजूद भी हम दूसरों के लिए कितनी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
दूसरा आयाम है, निस्वार्थ प्रेम और समर्पण का। पति-पत्नी के रिश्ते की यह कहानी हमें यह दिखाती है कि सच्चे प्रेम और समर्पण में कोई सीमा नहीं होती। यह महिला हमें यह सिखाती है कि प्रेम केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में भी व्यक्त होता है।

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