एसएमएस और सरकारी अंकुश

दिव्येश व्यास*
डॉ. विनोद पाण्डेय**

मोबाइल फोन हमारे दैनंदिन जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। रोटी, कपड़ा एवं मकान की भांति मूलभूत आवश्यकताओं में शुमार हो गया है। मोबाइल फोन के कारण सगे-संबंधी ही नहीं अपितु समूचे विश्व के साथ संवाद-संबंध मजबूत हुआ है। मोबाइल फोन महज दूरसंचार की सहूलियत देने वाला उपकरण नहीं है। यह हमारे लिए घड़ी भी है, स्टॉप वॉच -कैलेंडर और अलॉर्म -कैल्क्यूलेटर भी। रेडियो, कैमरा और टेप रिकॉर्डर की जरूरत भी यह पूरी करता है। अरे, इस में आप टीवी भी देख सकते हैं।  इंटरनेट सेवा से जोड़ कर विश्व को इसके जरिए अपनी मुठ्ठी में समेट सकते हैं । मोबाइल से बैंकिंग भी हमारे लिए सहज हो चली है। खैर, हथेली में चांद तो शायद नहीं आ सकता, लेकिन हां, मोबाइल फोन ने समूची दुनिया को हमारी हथेली में अवश्य समेट दिया है।

मोबाइल फोन की लोकप्रियता के ग्राफ को नित नई ऊंचाई देने में इससे जुड़ी एक शुरूआती सेवा ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। नाम है – एसएमएस (स्रूस्)। मतलब शॉर्ट मैसेज सर्विस। दूर बैठे स्वजन और इच्छित व्यक्ति से बात तो टेलिफोन से भी हो सकती है। कार्डलैस फोन के आगमन के बाद घर-दफ्तर में चहलकदमी करते हुए भी बतियाना सामान्य हो गया था लेकिन मोबाइल फोन की एसएमएस सेवा ने संवाद के इस माध्यम को रूचिकर और प्रभावशाली बना दिया। एक अथवा एक से अधिक लोगों को एक साथ संदेश भेजने की इस सेवा ने हमारे अनेक काम आसान कर दिए । साथ ही कई प्रकार की जटिलताओं से मुक्ति भी दिलवाई।

एसएमएस – एक सशक्त माध्यम

एसएमएस का चलन और प्रभाव दिनों दिन बढ़ता ही गया। बहुत ही सस्ती दरों में 150-160 शब्दों के संदेश को एक या इससे अधिक व्यक्तियों तक पहुंचाने की सहुलियत इसकी लोकप्रियता का मजबूत आधार है। इसी कारण साबित हुआ कि – एसएमएस जनसंवाद का विश्वसनीय और महत्वपूर्ण माध्यम है। लोग मोबाइल पर बातचीत कम एसएमएस द्वारा चैटिंग अधिक करते हैं। विशेष कर युवा पीढ़ी । यह युवाओं की पॉकेटमनी बजट के मुफीद भी होती है। इस वजह से एसएमएस माध्यम की धूम मच गई। मोबाइल नेटवर्क सेवा प्रदाता हर कंपनी ने एसएमएस के लिए विशेष पैकेज पेश किए। करोड़ो लोगों ने इसका लाभ भी उठाया। इसके प्रमाण में लगातार वृद्धि होती रही। हालांकि एसएमएस के सकारात्मक उपयोग की ही भांति नकारात्मक उपयोग भी चिंताजनक रूप से बढ़ा। मार्केटिंग व राजनीतिक अभियानों के लिए व्यापक स्तर पर एसएमएस का इस्तेमाल हुआ। इसको लेकर आपत्ति नहीं हो सकती । दुर्भाग्यवश एसएमएस से झूठ तथा अफवाहें भी फैलाई जाने लगीं। ऐसे काम और इरादों के लिए एसएमएस को प्रभावशाली ‘टूल’ के रूप में इस्तेमाल किया गया। कोई नेता , संस्था अथवा संगठन के प्रचार के साथ एसएमएस दुष्प्रचार का भी साधन बन गया। एसएमएस से शेर-शायरी तथा प्रेरक बातों के साथ गंदी-भ्रमित करने वाली बातों का भी प्रचार-प्रसार होने लगा। यह तनाव भगाने वाले चुटकलों के साथ-साथ भय-नफरत फैलाने वाले तत्वों के लिए संदेशवाहक भी बना।

प्रभाव ऐसा कि प्रतिबंध की नौबत

एसएमएस संवाद का एक आधुनिक, तेज और निजी माध्यम है। यह ऐसा मंच है जिसके जरिए तमाम लोग संदेशों के आदान प्रदान के मामले में शक्तिशाली हो सके। हालांकि ऐसा भी नहीं हुआ कि सभी लोगों ने इसका सार्थक – रचनात्मक उपयोग ही किया हो। किसी सेवा और शक्ति का जब नुकसानदायक अंदाज में प्रयोग होता है तो उस पर अंकुश की जरूरत भी पडती है। जब ऐसे व्यापक पहुंच वाले माध्यम को लेकर चर्चा हो तो स्थिति और अधिक संवेदनशीलता की अपेक्षा करती है।  एसएमएस भी एक ऐसा ही शक्तिशाली संवाद का प्रमाणित माध्यम है। आसान पहुंच और सरल उपयोग तथा भारी प्रभाव सहित कारणों से कहीं न कहीं जनहित, सुरक्षा, कानून व्यवस्था व राष्ट्रहित की खातिर एसएमएस पर भी अंकुश लगाना ही पड़ता है। कभी सरकार को, पुलिस को तो कभी निर्वाचन आयोग को। बीते दशक में हमारे देश में अन्य किसी माध्यम तथा दूरसंचार की तुलना में एसएमएस पर बार-बार प्रतिबंध लगाना पड़ा है। यह स्थिति इस बात का सबूत है कि- एसएमएस  संदेश व्यवहार के माध्यम के रूप किस हद तक व्यापक और प्रभावशाली है।

एसएमएस और प्रतिबंध

हमारे देश में एसएमएस पर प्रतिबंध की शुरूआत गुजरात से मानी जाती है। बात वर्ष 2004 की है, तब मोबाइल फोन की पहुंच इतनी व्यापक नहीं हो पाई थी। वडोदरा शहर के मोबाइलधारकों को 24 सितंबर 2004 को एक एसएमएस मिला। लिखा था ” In compliance with orders of the Gujarat police, एसएमएस service will be unavailable on Monday (27-09-2004) From 2 pm to 12 midnight. Inconvenience is regretted.” गुजरात में 2002 में दंगों के बाद अधिक संवेदनशील बन चुके वड़ोदरा में गणेश विसर्जन के दिन दंगे न भडक़ जाएं, इस आशंका को ध्यान में रखते हुए गुजरात पुलिस ने एहतियातन वड़ोदरा में एसएमएस पर प्रतिबंध लगा दिया था। एसएमएस पर प्रतिबंध का यह पहला मामला था। इसके चलते सेवाप्रदाता एक कंपनी की एसएमएस सेवा वड़ोदरा के साथ-साथ अहमदाबाद में भी ठप्प हो गई , वहीं एक कंपनी तक तो प्रतिबंध लगाने की सूचना भी नहीं पहुंची थी।

गुजरात एक शांतिप्रिय राज्य माना जाता है, बावजूद इसके जुलाई-2014 से जनवरी -2015 के दरमियान सात महीनों की अवधि में एसएमएस पर इस राज्य में पांच से अधिक बार प्रतिबंध लगाने की नौबत आ चुकी है।

29 तथा 30 जुलाई 2014 को फेसबुक पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के मामले के मद्देनजर कच्छ के मुख्य शहर भुज में जिला मजिस्ट्रेट द्वारा एसएमएस एवं मोबाइल इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाया गया।

सितंबर-2014 के पहले पखवाड़े में गणेश प्रतिमा विसर्जन के समय अफवाहों से अफरा-तफरी एवं कोई अप्रिय हालात पैदा न हों तथा कानून-व्यवस्था बरकरार रखने के लिए गुजरात पुलिस ने सूरत शहर में एसएमएस एवं मोबाइल इंटरनेट पर प्रतिबंद लगा दिया था। सूरत की ही भांति पंचमहाल जिले के गोधरा शहर में भी शांतिपूर्ण एवं निर्विघ्न गणेश प्रतिमा विसर्जन सुनिश्चित करने के लिए एसएमएस व मोबाइल इंटरनेट को एक दिन के लिए प्रतिबंधित किया गया।

सितंबर-2014 के पहले सप्ताह में वडोदरा में सांप्रदायिक तनाव के हालात बन गए थे। सोशियल मीडिया पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले कंटेट के मुद्दे पर वड़ोदरा में हिंसक घटनाएं हुई थीं। 25-26 सितंबर को फॉरवर्ड एसएमएस एवं सोशियल नेटवर्किंग साइट्स सरीखे माध्यमों से भडक़ाऊ और तनाव पैदा करने वाली बातें फैलाए जाने पर कानून व्यवस्था स्थापित करने हेतु पुलिस को 27 सितंबर 2014 को एसएमएस व मोबाइल इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। यह रोक 30 सितंबर 2014 तक बरकरार रही।

अंतिम बार 2015 के आरंभ में ही मकर संक्रांति (गुजरात में उत्तरायण) के वक्त दक्षिण गुजरात के भरूच जिले की हांसोट तहसील में सांप्रदायिक हिंसा हो गई। अफवाहों को फैलने से रोकने एवं कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिला कलेक्टर ने 15 जनवरी, 2015 को ही एसएमएस व मोबाइल इंटरनेट पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया।

राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध

वर्ष 2010 में अयोध्या में राम मंदिर के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आना था। इस संवेदनशील केस पर अदालती फैसले के बाद देश में कानून व्यवस्था के लिए चुनौती पैदा होने की आशंका भी शासन-प्रशासन को सता रही थी। विविध स्तरीय एहतियाती उपाय किये जा रहे थे ताकि पूरे देश में शांति-व्यवस्था बरकरार रहे। इसी क्रम में सरकार ने अचानक एसएमएस पर प्रतिबंध लगा कर सबको हैरत में डाल दिया। समाचार पत्र, टीवी चैनल, रेडियो सहित अन्य किसी माध्यम पर नहीं किन्तु एसएमएस पर ही प्रतिबंध लगाया गया। इस प्रतिबंध से जनमानस के ख्याल में आया कि- एसएमएस नामक छोटी सी सेवा का प्रभाव व प्रहार कितना गहरा एवं व्यापक है। भारत भर में 22 सितंबर 2010 को अगले 72 घंटे के लिए एसएमएस तथा एमएमएस प्रतिबंधित कर दिए गए। इस अवधि को बाद में बड़ा कर 30 सितंबर तक तथा 30 सितंबर को अयोध्या मामले पर अदालती फैसला आने पर अगले पांच दिनों तक बढ़ाया गया। अयोध्या मामले पर अदालती फैसले के बाद देशभर में कहीं कोई अप्रिय वारदात नहीं हुई और न ही ऐसी स्थिति पेश आई। हालांकि एसएमएस पर प्रतिबंध का बड़े पैमाने पर विरोध भी हुआ। इस विरोध के चलते 04 अक्टूबर, 2010 को प्रतिबंध हटाया गया।

अयोध्या मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद देश में पुन: एसएमएस- एमएमएस पर प्रतिबंध अगस्त-2012 में लगा। वजह, उड़ीसा में सांप्रदायिक हिंसा का भडक़ गई थी। उत्तर -पूर्व भारतीयों के खिलाफ घृणा व अफवाहें फैलाने वाले एसएमएस- एमएमएस का जोर भी बढ़ गया था। इस कारण,  हालात तनावपूर्ण बन गए थे। उत्तर-पूर्व के लोग बेंगलुरु, हैदराबाद, चैन्नई, मुंबई, पुणे एवं मैसूर आदि शहरों से बड़े पैमाने पर पैतृक राज्य पहुंचने के लिए बैचेन हो गए। ऐसी स्थिति बनने पर 17 अगस्त , 2012 को 15 दिन के लिए एसएमएस- एमएमएस को प्रतिबंधित कर दिया गया। एक दिन में सिर्फ पांच ही एसएमएस करने की छूट थी। दूसरी ओर, एसएमएस पर प्रतिबंध को लेकर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई तो सरकार को 23 अगस्त को पांच एसएमएस की दैनिक मर्यादा को बढ़ा कर 20 एसएमएस प्रतिदिन  करना पड़ा। हालांकि 20 एसएमएस प्रतिदिन की रियायत भी लोगों को स्वीकार नहीं थी। उधर उत्तर-पूर्व के लोगों का मामला शांत हो गया था। अत: सरकार ने 30 अगस्त, 2012 को तत्काल प्रभाव से एसएमएस- एमएमएस के प्रतिबंध को हटा लिया।

चुनाव और एसएमएस प्रतिबंध

दिसंबर- 2007  में गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव एक साथ हुए। इसी साल चुनाव आयोग ने पहली बार एसएमएस पर अंकुश-प्रतिबंध की पहल की। वजह, चुनाव प्रचार के अलावा दुष्प्रचार का जोखिम था। ऐसी स्थिति पेश आने पर निष्पक्ष, निर्विघ्न और भयरहित माहौल में चुनाव करवाने में अड़चन की आशंका थी। अत: चुनाव आयोग ने मतदान के 48 घंटे पहले ही बल्क एसएमएस पर प्रतिबंध लगा दिया।

कनार्टक में 20 मार्च 2010 को चुनाव होना था। इन चुनावों को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग ने टीवी, अखबार सहित प्रचार माध्यमों के साथ-साथ एसएमएस पर भी प्रतिबंध लगा दिया। आयोग ने यह व्यवस्था मतदान के 48 घंटे पहले ही दी।

आंध्र प्रदेश में साल 2012 में विधानसभा के उपचुनाव के दौरान राजनीतक दुष्प्रचार और शांति-व्यवस्था बनाए रखने की खातिर एसएमएस पर प्रतिबंध लगा दिया था। आयोग ने 10 जून 2012 को प्रतिबंध लगाया था। इसके अलावा भी छोटे-बड़े चुनावों के दौरान समय-समय पर 24 अथवा 48 घंटे पहले प्रतिबंध लगाने के कदम उठाए गए।

प्रतिबंध की घटनाएं और भी…

देश के संवेदनशील माने जाने वाले राज्यों में कानून व्यवस्था और सैन्य जरूरत के बंदोबस्त की खातिर एसएमएस पर बार-बार अंकुश लादना पड़ता है। सामरिक-रणनीतिक रूप से जम्मू-कश्मीर भारत का अति संवेदनशील राज्य माना जाता है, जहां पांच साल तक एसएमएस प्रतिबंधित रहे। साल 2010 में कश्मीर की ‘आजादी’ के लिए अलगाववादी की मुहिम जब पुन: आक्रामक हो रही थी। आतंकवादी-अलगाववादी प्रवृत्ति , हिंसक हमलों को अंजाम देने के लिए एसएमएस का उपयोग होता प्रतीत हुआ तो राज्य सरकार ने जून-2010 में एसएमएस पर प्रतिबंध लगा दिया।  इस रोक का मुखर रूप से विरोध हुआ। एसएमएस पर रोक के मामले के तूल पकडऩे पर छह महीने के बाद पोस्टपेड मोबाइलधारकों को प्रतिबंध से बाहर कर दिया गया। हालांकि जम्मू-कश्मीर के 50 लाख से (राज्य के लगभग 70 प्रतिशत मोबाइलधारक) अधिक प्री-पेड मोबाइल उपभोक्ताओं को कोई राहत नहीं मिली। इन पर लगा प्रतिबंध 21 मई-2014 को हटाया गया।

कश्मीर में एसएमएस पर प्रतिबंध कोई नई बात नहीं है। नवंबर-2007 में पाकिस्तान में जनरल परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ का तख्ता पलट कर खुद सत्ता हथिया ली। पड़ोसी देश के इस घटनाक्रम से कश्मीर में माहौल तंग होने लगा। 2008 में अमरनाथ जमीन मामले को लेकर भी माहौल खराब हुआ तो अगस्त-2008 में वहां एसएमएस प्रतिबंधित कर दिए गए। एसएमएस पर इस प्रतिबंध का कड़ा विरोध हुआ। मामला जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट तक पहुंच गया। हाईकोर्ट ने रोक हटाने का हुक्म दिया, राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। सर्वोच्च न्यायालय ने एसएमएस पर प्रतिबंध को सही ठहराया। हालांकि कश्मीर में हालात सुधरने पर जनवरी-2009 में एसएमएस के आदान-प्रदान पर लगी रोक को हटा लिया गया।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ जम्मू-कश्मीर में ही एसएमएस पर प्रतिबंध की घटनाएं हुईं। देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसे प्रतिबंधात्मक कदम उठाने पड़े हैं। पांच मार्च, 2015 को नागालैंड के दीमापुर शहर में गुस्साए लोगों की भी? ने असम निवासी सैयद शरीफुद्दीन नामक कथित दुष्कर्म के आरोपी को जेल से निकाला और पीट-पीट कर मार डाला। शव को चौराहे पर लटका कर फोटो-वीडियो भी लिए गए। इस मसले को लेकर असम-नागालैंड में विवाद शुरू हो गया। अत: दोनों राज्यों के सीमा क्षेत्र में हाईअलर्ट जारी करना पड़ा। साथ ही आठ मार्च को नागालैंड में इंटरनेट एवं एसएमएस- एमएमएस पर 48 घंटों के लिए प्रतिबंध लगाना पड़ा। 12 मार्च को कर्फ्यू हटा हटा लेने के बाद एसएमएस पर प्रतिबंध हटाया गया.

साल 2013 में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने अयोध्या में राममंदिर के मुद्दे पर संकल्प सभा का आयोजन किया । उत्तर प्रदेश सरकार ने 18 अक्टूबर, 2013 को सुरक्षा व्यवस्था चाकचौबंद करने के साथ-साथ एहतियातन एसएमएस पर भी प्रतिबंध लगा दिया।

सांप्रदायिक तनाव-हिंसा और सट्टेबाजी पर नियंत्रण के लिए भी एसएमएस प्रतिबंधित किए जा चुके हैं। बात 2011 की है। क्रिकेट विश्वकप का फाइनल मैच, मुंबई के वानखेडे स्टेडियम में होना था। मुंबई पुलिस ने  31 मार्च की मध्यरात्रि से 02 अप्रैल-2011 तक की अवधि तक मुंबई सर्कल क्षेत्र एसएमएस पर प्रतिबंध लगा दिया।

अंकुश अन्य देशों में भी

सूचना क्रांति के चलते पाकिस्तान में भी मोबाइल फोन एवं इंटरनेट सरीखे अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम लोगों तक पहुंच चुके हैं। कट्टरवादी तत्वों को अभिव्यक्ति की आजादी सहन नहीं होती। अगस्त-2013 में पाकिस्तान को भी एसएमएस पर प्रतिबंध से दो चार होना पड़ा। वहां की सरकार ने नैतिक-धार्मिक मूल्यों की रक्षा के कारण को आगे कर एसएमएस पैकेज पर नियंत्रण लाद दिए। पाकिस्तान में एसएमएस पर भी सेंसरशिप लागू हैं।

चीन ने 2011 में मोबाइल-इंटरनेट के लिए मार्गदर्शिका जारी की । इसमें डेमोक्रेसी, ह्यूमन राइट्स, टैलिंग द ट्रूथ, एंटी करप्शन, जून-4 सरीखे लगभग 1000 शब्दों को प्रतिबंधित शब्द करार दिया गया। एसएमएस के किसी संदेश में ये इन शब्दों का जिक्र हुआ तो वे संदेश सामने वालों को कभी मिलते ही नहीं हैं। प्रतिबंधित शब्दों का वारंबार प्रयोग करने वाले मोबाइलधारक की सेवा भी बंद कर देने की सख्त व्यवस्था भी चीन ने अपना रखी है।

सैंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक नामक देश ने भी 02 जून 2014 से देश में एसएमएस सेवा को प्रतिबंधित किया है। वहां की सरकार का कहना है कि- सुरक्षा कारणों से यह प्रतिबंध लगाया गया है। अन्य देशों में भी समय-समय पर एसएमएस पर अंकुश -प्रतिबंध लगाए जाने की घटनाएं बनती रहती हैं।

उपसंहार

शांति-सुरक्षा कारणों से एसएमएस पर प्रतिबंध लादने के कदम को उचित कहा जा सकता है। बावजूद इसके जब-जब भी एसएमएस पर प्रतिबंध लगाया गया तब-तब विरोध भी किया गया। ये उदाहरण और घटनाएं यह साबित करती हैं कि- एसएमएस लोगों की दैनंदिन जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया है। लोगों के लिए एसएमएस अभिव्यक्ति की आजादी का महत्वपूर्ण-प्रभावशाली माध्यम साबित हुआ है। तनाव की घटनाओं के समय में अन्य समाचार माध्यमों की बजाय एसएमएस पर ही प्रतिबंध लगाया जाता है, यह इस बात का प्रमाण है कि-एसएमएस सूचना के आदान-प्रदान का एक प्रभावशाली माध्यम है।

संदर्भ वेब लिंक्स

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