संपूर्ण मानवता: मीडिया एवं मानस

डॉ. उर्वशी परमार*

प्रस्तावना

ईश्वर ने सृष्टि के सभी तत्वो का विकास मानव की कृति में किया है। कहा जाता है  कि मानव ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति एवं अभिव्यक्ति है। मानव के पास बल बुद्धि होती है जिससे वह ज्ञान प्राप्त करता है। मानवीय जीवन में संचार की प्रक्रिया जन्म से ही प्रारंभ हो जाती है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिक जीवन में संचार अत्यधिक महत्वपूर्ण है। संचार के व्यापक सूत्र प्राचीन संस्कृतियों से लेकर वर्तमान सामाजिक परिवेश में समय समय पर अपनी परिभाषा बदलते रहे हैं। वर्तमान परिस्थिति पर नजर डाली जाए तो ईश्वर की यह सुन्दर अभिव्यक्ति मानव की स्थिति आज क्या है इसे समझना बहुत मुश्किल है। क्योकि एक ओर तो हम संपूर्ण मानवता की दुहाई देते हैं और वही दूसरी ओर मानव का निजी स्वार्थ और अहंकार है।

संपूर्ण मानवता की भलाई के लिए आवश्यक है कि हम संपूर्ण मानव के ज्ञान और उपलब्धियों को साथ लेकर आगे बढ़े। संपूर्ण मानवता के लिए आवश्यक है विश्व एकता। मनुष्य आज केवल अपनी आकांक्षाओं की तृप्ति करना चाहता है। लेकिन संपूर्ण मानवता की भलाई के लिए विश्व एकता और विश्वशांति के लिए मनुष्य को ‘‘मैं” से उठकर ‘‘हम” तक जाकर सोचना होगा। संपूर्ण विश्व के सर्वांगीण विकास के लिए मनुष्य को ही प्रयत्न करना होगा। आज विश्व की जो स्थिति है उसमें सभी राष्ट्र अपने ही स्वार्थों की पूर्ति में लगे हुए हैं। संपूर्ण मानवता की तो केवल बात की जाती है काम तो केवल हितो और स्वार्थों को पूरा करने की दृष्टि से ही किया जाता है।

ऐसे समय में एक प्रश्न जो हर भारतीय मनीषी के मन में उठता है वह यह है कि क्या भारतीय संस्कृति में जो मूल्य और नियम है, उन्हें अपना कर संपूर्ण मानवता के लिए कुछ किया जा सकता है? भारतीय संस्कृति अत्यंत समृद्ध है। यह संस्कृति स्वयं में संपूर्ण एवं सक्षम है। आज विश्व की जो परिस्थिति है ऐसे में भारतीय संस्कृति के अपार समुद्र में छिपे रत्नों को पहचानने और उनके उपयोग की आवश्यकता है। भारतीय परम्परा में सत्य का प्रसार ही संचार का मुख्य लक्ष्य रहा है।

इस शोध-पत्र में हमारी भारतीय संस्कृति के एक महत्वपूर्ण ग्रंथ तुलसीदासकृत ‘‘श्रीरामचरितमानस” में वर्णित मूल्य एवं तत्वों विश्लेषण किया गया है। श्रीरामचरितमानस में कई ऐसी बाते हैं जो संचार के माध्यमों जैसे प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को सही दिशा दे सकती हैं, उन्हें संपूर्ण मानवता के हितों के लिए कार्य करने की प्रेरणा दे सकती हैं। संपूर्ण मानवता के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक मनुष्य का संर्वागीण विकास हो और यही मीडिया का उद्देश्य होना चाहिए।

शोध विधि

शोध की प्रविधि गुणात्मक पद्धति है। इस शोध पत्र में रामचरितमानस की विषयवस्तु का गुणात्मक विश्लेषण किया गया है।

भारतीय संस्कृति एवं श्रीरामचरितमानस

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। हमारी संस्कृति का यदि गहन अध्ययन किया जाए तो हमें ऐसे कई संचार सिद्धान्त मिलते हैं जो आज वर्तमान में प्रचलित संचार अवधारणाओं से अधिक प्रासंगिक हैं। वर्तमान समय से विश्व में जो परिस्थितियाँ है वे अत्यधिक जटिल एवं विषम है। ऐसे में हमारी संस्कृति, हमारे धर्मग्रंथों में दी गई शिक्षा का प्रयोग आवश्यक हो जाता हैै।

हमारी संस्कृति में कई ऐसी बाते हैं जो हमें संपूर्ण मानवता के लिए सोचने पर विवश करती हैं। ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’’ भारतीय संस्कृति में ऐसी कल्पना की गई है कि सभी का भला हो , सभी सुखी रहें, यही तो संपूर्ण मानवता है। प्रत्येक मनुष्य सुखी रहे और उसका सर्वांगीण विकास हो और संपूर्ण मानवता के लिए यही आवश्यक है। आज विश्व में पश्चिमी संस्कृति द्वारा ‘‘ग्लोबल विलेज” की परिकल्पना की जा रही है। लेकिन भारत की पाँच हजार वर्षों से अधिक की सभ्यता में ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम” का वर्णन मिलता है जिसका अर्थ है कि संपूर्ण विश्व एक परिवार है। इसका यही अर्थ निकाला जा सकता है कि हमारी भारतीय संस्कृति कितनी समृद्ध एवं सक्षम है। संपूर्ण समाज या संपूर्ण सृष्टि के एकीकीकरण के लिए आवश्यक है कि मानव के विचार भी संकलित हों।

हमारे धर्म ग्रंथों में से एक श्रीरामचरितमानस शाश्वत जीवन मूल्यों का आकाशदीप है। सोलहवीं सदी में रचा गया यह महाकाव्य एक विशाल सागर के समान है जिसमें जितनी बार डूबा जाए कुछ नया अवश्य मिलता है। श्रीरामचरितमानस में आस्तिकता, धार्मिकता, प्रभु भक्ति जैसी दिव्य भावनाओं और उच्च नैतिक आदर्शों का वर्णन मिलता है। मानव के स्वभाव, भावनाओं और संघर्षों का मार्मिक और हृदयहारी चित्रण किया गया है। रामचरितमानस प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति का दर्पण है। एक व्यक्ति, एक मनुष्य किस प्रकार एक आदर्श पुत्र, आदर्श भ्राता, आदर्श पति और आदर्श सम्राट की भूमिका निभा सकता है।

श्रीरामचरितमानस में श्री राम का वर्णन मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में किया गया है। श्री राम को मानव रूप में चरितार्थ किया गया है। श्री राम का चरित्र मानव और संपूर्ण मानवता के परिपेक्ष्य में एक मौलिक आयाम है। मानस तो बहुत विशाल है। इसमें दिए गए तत्वों की कुछ शब्दों में व्याख्या नहीं की जा सकती । इसलिए इस शोध-पत्र में श्रीराम के चरित्र की प्रमुखताओं का ही आधार लिया गया है। मातापिता का आज्ञापालन, सत्यवादिता, प्रतिज्ञा परिपालन, दीन दुर्बल एवं आश्रित संरक्षण, एकपत्नीव्रत , वर्णाश्रम मर्यादा अनुसार आचरण , त्याग, उदारता आदि गुणों का चित्रण रामचरितमानस में मिलता है। और यही मानवता है। श्रीराम गंभीरता में समुद्र के समान, धैर्य में हिमालय तुल्य, पराक्रम में विष्णु समान, प्रियदर्शन में चद्रमा के समान, क्षमा में पृथ्वी के समान, दान में कुबेर के समान है। श्री राम के चरित्र की कई ऐसी बाते है जिसका प्रतिपालन यदि मीडिया करें तो निश्चित ही यह संपूर्ण मानवता के हित में होगा। श्री राम ने जिन मानवीय मूल्यों को स्थापित किया है वे हैं:-

  1. सत्यता
  2. लोकहित
  3. दीन, दुर्बल एवं आश्रित संरक्षण
  4. संचार के लिए भाषा एवं शब्दों का चयन
  5. मर्यादा
  6. दायित्व निर्वहन

श्रीराम के चरित्र की यह सभी खुबियाँ इस बात की ओर इशारा करती हैं कि श्री राम के ऐसे व्यक्तित्व निर्माण के पीछे सत्य, संदेश एवं श्रेष्ठ चरित्र का संचार करना था। श्रेष्ठ एवं सत्य के प्रसार की मान्यता की परम्परा श्रीरामचरितमानस में व्याप्त है।

संपूर्ण मानवता के परिप्रेक्ष्य में मीडिया एवं उसके दायित्व

संचार तो मनुष्य जीवन का अभिन्न अंग है। इसके बिना मानव का सामाजिक जीवन संभव नहीं है। संचार के स्वरूप में निरंतर परिवर्तन होता आया है। भाषा संचार का सार्वभौम माध्यम है। किंतु वर्तमान में संचार के अनेक माध्यम प्रयोग में लाये जाते हैं। संचार की प्रकृति संदेश पर आधारित होती है। इसी प्रकार संचार, सम्प्रेषक और ग्रहीता की प्रकृति पर निर्भर करता है, वे इसे जिस रूप में चाहे प्रयुक्त कर सकते हैं। आज आवश्यकता है कि हमें वैश्वीकरण के परिप्रेक्ष्य में वर्तमान मीडिया को देखना चाहिए। आज मीडिया के व्यापारीकरण की वजह से उसके समक्ष आदर्श, नैतिकता, आचार संहिता, मानवता आदि सभी गौण के होते हैं। आज वैश्वीकरण की बहुआयामी प्रक्रिया मानव जीवन को विभिन्न स्तरों पर प्रभावित कर रहा है। अत: मीडिया का यह उत्तरादायित्व हो जाता है कि इसके प्रभाव की सकारात्मकता या नकारात्मकता को मीडिया पहचाने और उसके अनुरूप कार्य करें।

वर्तमान समय में देखा जाए तो विश्व और संचार दोनों परस्पर एक हो गये हैं। आज यह कहा जा सकता है कि विश्व में व्याप्त मित्रता या शत्रुता कई हद तक मीडिया की ही देन है। संचार का यह प्रभाव जनसंचार माध्यमों के संदेशों का परिणाम है। वर्तमान में सार्थक और समर्थ पत्रकारिता की आवश्यकता है। कुछ आवश्यक बात है जिनका अनुकरण मीडिया को करना चाहिए-

  1. मीडिया का ध्येय लोकमंगल या लोककल्याण होना चाहिए।
  2. मीडिया के लिए सत्य सर्वोपरि होना चाहिए।
  3. मीडिया का सकारात्मक भावना के साथ कार्य करना चाहिए।
  4. मीडिया का संवेदनशील होना चाहिए।
  5. नैतिक दायित्वों का निर्वहन ही मीडिया का कत्र्तव्य होना चाहिए।
  6. मीडिया का सामाजिक सरोकार होना आवश्यक है।
  7. मीडिया को मूल्यनिष्ठ शैली का संदेशवाहक होना चाहिए।
  8. मीडिया को हर कार्य पूरे दायित्व के साथ करना चाहिए।

इन सभी मूल्यों का उल्लेख हमें रामचरितमानस में भी मिलता है। यदि मीडिया इन सभी उक्त बातों को ध्यान में रखकर संचार करे तो इससे संपूर्ण मानव जाति का भला होगा।

निष्कर्ष

इस कार्य में मीडिया प्रमुख भूमिका निभा सकता है लेकिन इसके लिये आवश्यक है कि मीडिया नीति अनुसार कार्य करें। मानवता के कल्याण की भावना को आगे रखकर मीडिया को अपना कार्य करना होगा। आज मीडिया में सरयता एवं दायित्व बोध की कमी खलती है। मीडिया को अपने दायित्व समझना चाहिए और मर्यादा में रहकर अपना कत्र्तव्य पालन करना चाहिए।

भारतीय संस्कृति में कई बार इस बात का उल्लेख है कि सत्य ही सर्वोपरि है। ऋग्वेद में उल्लेख है ‘‘ऋति नक्षत्र” अर्थात् सत्य का प्रसार करो। भारतीय परम्परा में सत्य का प्रसार ही संचार का मुख्य लक्ष्य रहा है। आज मीडिया को भी आवश्यकता है कि वह सत्य का प्रसार करे। आवश्यता है तो केवल उसे खोज कर उस पर अमल करने की। यदि मीडिया, मानवता के इन तत्वों और मूल्यों को ध्यान में रखकर विषय वस्तु को प्रस्तुत करें तो निश्चित ही यह संपूर्ण मानवता के लिये कल्याणकारी सिद्ध होगा।

संदर्भ सूची

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