जनमत निर्माण में मीडिया की भूमिका – लोकसभा चुनाव 2014 के संदर्भ में

ऋषि गौतम*

डा. सोनाली नरगुंदे*

हर बार आम चुनावों में ये देखा जाता है कि देश के प्रमुख न्यूज चैनल चुनाव से बहुत पहले ही अपना प्री-इलेक्शन कैंपेन शुरू कर देते हैं, जिसमें स्पेशल शोज, परिचर्चा, चौपाल, जनमत सर्वेक्षण आदि होते हैं। जहां आंकड़ों के खेल के साथ ज्यादातर चैनल आंकड़े अपने पक्ष में होने का दावा करते हैं। इसके अलावा वे खबरों की दुनिया में अपनी विश्वसनीयता का जोर-शोर से प्रचार करते हैं। यहां नजर डालते हैं अलग-अलग चैनलों के प्रमुख चुनावी कार्यक्रमों पर।

पिछले साल हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में आजतक का शो ‘राजतिलक’ और ‘श्वेत पत्र’, आईबीन 7 का ‘चुनावी चौपाल’ न्यूज 24 का शो ‘क्यों दें आपको वोट’ इंडिया टीवी का शो ‘आपका फैसला’ और ‘घमासान लाईव’ एबीपी न्यूज का ‘कौन बनेगा मुख्यमंत्री’ और ‘घोषणापत्र’, एनडीटीवी इंडिया का News Point और ‘इलेक्शन एक्सप्रेस’, जी न्यूज का ‘सिंहासन का सेमीफाइनल’ आदि जैसे महत्वपूर्ण चुनावी कार्यक्रम प्रस्तुत किये गए। इस चुनावी मौसम में तो ‘एनडीटीवी इंडिया’ ने तो अपने चैनल का पंच लाइन ही बदल डाली था। चैनल की नयी पंच लाइन थी ‘चुनाव मतलब ‘एनडीटीवी इंडिया’ जो काफी सोच-समझकर रखा था। जिसका प्रोमों बार-बार चैनल पर चलाया जा रहा था। इसमें चैनल के प्रमुख चेहरे आपस में चुनावी रणनीति पर चर्चा करते दिखाई दे रहे थे। इसका मकसद देश की राजनीति पर चैनल की पकड़ को दर्शाना था। इन सारे शोज में एबीपी न्यूज अपनी खास पेशकश ‘कौन बनेगा मुख्यमंत्री’ के साथ रेटिंग्स की दौड़ में सबसे आगे रहा। टैम के डेटा के मुताबिक, मतगणना के दिन चैनल हिंदी स्पीकिंग मार्केट (एचएसएम) में नंबर एक पर था। 2014 आम चुनाव में भी कौन बनेगा प्रधानमंत्री के नाम से आगे भी यह कार्यक्रम जारी रहेगा। कहा जा रहा है कि चैनल ने 2014 में होने वाले आम चुनावों का आउटलुक जानने के लिए 28 एजेंसियों की मदद लेने का फैसला किया था।

जनमत

जनमत शब्द सामान्यतया 19वीं सदीं में सामने आया, इसका जिक्र 1890 में लिखे गए जॉन लॉक के एक निबंध ‘अंडरस्टैंडिंग ह्यूमन कम्युनिकेशन’ में किया है। इसमें उन्होंने जनमत को एक न्यायिक एवं नैतिक दृष्टि से देखने की कोशिश की है। हालांकि इसके शताब्दियों पहले ग्रीस तथा रोम में ossa phema, Nomos के रूप में जनमत की अवधारणा सामने आयी और बाद में वह vox-populi जनता की आवाज के रूप में प्रचलिए हुआ। जनमत के बीच प्रचारित मत ये दोनों अलग-अलग चीज है। किसी भी व्यापक और विविध समाज में जनमत की कोई स्पष्ट अवधारणा निर्धारित करना संभव नहीं है लेकिन मोटे तौर पर यह कह सकते हैं कि किसी भी विषय पर व्यक्तियों, दृष्टिकोणों और विश्वासों से समान बिंदुओं और इनकी सामूहिकता ही जनमत है।

जनमत और मीडिया

जनसंचार माध्यम इस सामूहिकता को अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं और किन विषयों पर और किस तरह वे अभिव्यक्ति करते हैं इससे भी जनमत प्रभावित होता है। जनसंचार माध्यमों द्वारा जनमत की अभिव्यक्ति और इस अभिव्यक्ति से जनमत का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है और हाल के वर्षों में जनसंचार क्रांति से ये प्रक्रिया और भी जटिल हो गई है। अनेक ऐसे विषय होते हैं जिन पर एक जनमत विकसित होता है और जनसंचार माध्यमों से इसे अभिव्यक्ति मिलती है। लेकिन अनेक विषय ऐसे भी होते हैं जो ‘जन’ के हिसाब से ज्वलंत हो लेकिन जनसंचार माध्यमों से इन्हें अभिव्यक्ति न मिलती हो।

जनमत और जनसंचार दोनों से राजनीति और समाज दोनों प्रभावित होते हैं। यानि जनमत के वास्तविक जनमत के बजाय उस जनमत की जो जनसंचार माध्यमों में अभिव्यक्ति पाते हैं। यह एक तरह से कार्यशील और प्रभावी जनमत है जो चुनावी राजनीति और समाज को प्रभावित करता है। इस कार्यशील जनमत में जनमाध्यमों की अहम भूमिका होती है। जनसंचार माध्यमों से लोगों को किसी भी बारे में जानकारी मिलती है जो सृजित ज्ञान में सहायक होता है।

जनमत को प्रभावित करने वाले कारक

जमनत बना बनाया नहीं होता, बल्कि व्यक्ति द्वारा तैयार किया जाता है। किसी विषय या समस्या पर व्यक्तियों द्वारा जनमत का निर्माण किया जाता है। जनमत के निर्माण में चार अवस्थाएं निहित हैं। प्रथम- समस्या उत्पन्न करना। द्वितीय- समस्या पर विचार विमर्श करना। तृतीय- विकल्पी समाधानों का प्रस्तुत करना और अंत में चतुर्थ- जनमत का प्रकट होना। ‘जनमत वास्तव में विकासात्मत प्रक्रिया होती है, सामाजिक मानदंड तथा मूल्य, सामाजिक वर्ग, घटनाएं तथा उनकी व्याख्या करना’।

चुनावी सर्वे (ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल)

अब इसके बाद बारी आती है चुनाव के दौरान इन चैनलों के साथ मिलकर सर्वे करने वाली कंपनियों की। जिनमें मुख्यरूप से C-Voter, Todays Chanak, Nielsen आदि जैसी कई संस्थाएं हैं जो इन चैनलों के लिए काम करती हैं। यहां हमारे लिए यह जानना भी जरूरी है कि सर्वे क्या है, यह होता कैसे है और इसकी शुरूआत कैसे हुई?

चुनावी मौसम आते ही सर्वे की भरमार लग जाती है। इन अलग-अलग सर्वे को मुख्यत: दो भागों में बांटा जाता है। ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल। चुनाव की घोषणा के बाद होने वाले वो सर्वे जिसमें वोटरों से पूछा जाता है कि आप कौन सी पार्टी को वोट देंगे, वैसे सर्वे को ओपिनियल पोल कहते हैं। इसी तरह मतदान के दिन जब वोटर वोट डाल कर निकलता है तो सर्वे करने वाले उससे यह पूछते हैं कि आपने कौन सी पार्टी को वोट दिया है, ऐसे सर्वे को एग्जिट पोल कहते हैं। ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल के इस विवाद के बीच वोटर ही अपना अंतिम फैसला करता है और कई बार ऐसे सर्वे के उलट हमारा जागरूक वोटर सर्वे करने वालों को आश्चर्यचकित कर देता है। फिर भी भारत में चुनाव आयोग ने एग्जिट पोल पर प्रतिबंध लगा दिया है।

भारत में सर्वे की शुरुआत

भारत में बेशक भारतीय लोकमत संस्थान ने 1957 के लोकसभा चुनावों से पूर्व सर्वेक्षण किया था परंतु इसे 80 के दशक में अपनी लगभग सटीक भविष्यवाणियों से एन.डी.टी.वी. के प्रमुख प्रणय राय ने ही लोकप्रिय बनाया था। चुनावी सर्वेक्षणों पर पाबंदी लगाने के मामले में राजनीतिक दलों में मतभेद हैं। जहां कुछ पार्टियां इससे लाभान्वित होती हैं वहीं सम्भावित घाटे में रहने वाले राजनीतिक दल इन सर्वेक्षणों के प्रति शंकालु रवैया रखते हैं।

औपिनियन पोल का इतिहास

ऐतिहासिक रूप में ओपिनियन पोल की जड़ें मोटे तौर पर अमरीका में तलाशी जा सकती हैं जहां 1824 में 2 समाचार पत्रों ने लोकमत का आकलन करने के लिए राष्ट्रपति चुनाव के मौके पर ओपिनियन पोल करवाया था। 20वीं सदी शुरू होने के बाद अन्य देशों ने भी यह तरीका अपना लिया। ब्रिटेन ने 1933 में और फ्रांस ने 1938 में ओपिनियन पोल की पद्धति अपनाई तथा इनके परिणाम भी लगभग सही थे। अधिकतर देशों में चुनाव पूर्व मत सर्वेक्षणों पर किसी प्रकार की पाबंदी नहीं है, फिर भी अर्जेंटीना, श्रीलंका, स्पेन, कनाडा और मैक्सिको जैसे कुछ देशों में इस पर प्रतिबंध लगा हुआ है जबकि रूस, जर्मनी, जापान, यू.के. एवं अमरीका में इन पर सरकार को किसी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं है।

शोध समस्या

यह किसी से छुपा नहीं है कि समकालीन भारतीय राजनीति और चुनावों में मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की भूमिका दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। पिछले चुनावों के मुकाबले आज के चुनाव में युवा मतदाताओं के अंदर वोट देने के लिए नया जोश देखा जा रहा है जिससे देश में मतदान का प्रतिशत भी बढ़ा है। इसका पूरा श्रेय मीडिया को जाता है जिसने लोगों को यह बात समझाया है कि अगर निंदा करना आपका अधिकार है, तो वोट देना उससे भी जरूरी अधिकार है। पिछले साल हुए पांच राज्यों के विधानसभा के चुनाव में जिस उत्साह और जोश के साथ लोगों को वोट डालने के लिए प्रोत्साहित किया गया, वह पिछले साल की खास बात रही। चुनाव आयोग के इतर मीडिया ने भी लोगों को पोलिंग बूथ तक लाने में अहम भूमिका निभाई। न्यूज चैनलों ने जिस तरह से व्यापक कवरेज किया उससे ऐसा लगा जैसे चैनल ही चुनावों के असली अखाढ़े बन गए हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि चुनाव आयोग के सख्त निर्देशों के कारण जमीन पर चुनाव प्रचार बहुत फीका हो गया था, इसलिए चुनाव प्रचार की जितनी गर्मी जमीन पर नहीं दिखाई पढ़ी उससे ज्यादा जोश, शोर, सनसनी और काटा-काटी चैनलों पर मची। अगर ये कहा जाए तो लगत नहीं होगा कि एक तरफ बढ़ी राजनीतिक लड़ाई अगर राज्य के गांवों-कस्बों और शहरों की पगडंडियों-गलियों और सड़कों पर लड़ी गई, तो उससे बड़ी राजनीतिक लढ़ाई चैनलों के स्टूडियो में छिड़ी बहसों-चर्चाओं, शहर-दर-शहर के कार्यक्रमों और जनमत सर्वेक्षणों में लड़ी गई।

दरअसल, राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण और ऊचे दांव वाली इस लड़ाई में राजनीतिक ‘हवा’, जन धारणाओं (पब्लिक परसेप्शन) और छवियों की भूमिका बहुत अहम हो गई है. सारी लड़ाई जनमत को अपने पक्ष में मोडऩे और इसके लिए अनुकूल जनमत तैयार करने की खातिर जन धारणाओं और छवियों को गडऩे और तोडऩे-मरोडऩे की हो गई है। ऐसे में इस लड़ाई का सबसे प्रमुख मंच मीडिया और उसमें भी न्यूज चैनल हो गए हैं। इस मायने में चैनल भी इस खेल के बहुत महत्वपूर्ण खिलाड़ी हो गए हैं। विधानसभा चुनावों का एजेंडा तय करने से लेकर माहौल बनाने में उनकी भूमिका को अनदेखा करना अब मुश्किल है। आज के समय चुनाव की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसकी कोई सर्वसम्मत आचार संहिता मीडिया प्रसारण को लेकर अब तक नहीं बन पायी है और कुछ मौकों पर जो बनी उसका अनुपालन सही ढ़ंग से नहीं हो पाया। चुनाव पूर्व होने वाले एक्जिट पोल का प्रसारण एवं वह भी की चरणों में होना एक तरफ जनमत को तो प्रभावित करता ही है, साथ ही चुनाव की प्रकिया को भी प्रभावित करता है।

साहित्य सर्वेक्षण

जनसंचार माध्यम और जनमत निर्माण http://www.subhashdhuliya.blogspot.in, 31 July 2011

जनसंचार माध्यम एक तरह से ऐजेंडा निर्धारित करते हैं। ये तय करते हैं कि आज कौन-कौन से विषय/मुद्दे हैं जो एक राष्ट्र के रूप में और एक समाज के रूप में हमसे सरोकार रखते हैं। एक आदर्श स्थिति में लोकतंत्र का मतलब ही यही है कि निर्वाचित सरकार आम लोगों के हितों और सरोकारों का प्रतिनिधित्व करें और एक तरह से आम लोगों का एजेंडा (पब्लिक एजेंडा) ही सरकार का एजेंडा होता है। सरकार के कार्यकाल के लिए पब्लिक एजेंडा की इसका जनादेश (मेंडेट) होता है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने के नाते जनसंचार माध्यमों का यही कर्तव्य और उत्तरदायित्व होता है कि जब कभी पब्लिक एजेंडा और सरकार के एजेंडा में कोई दूरी पैदा हो तो वह इसमें हस्तक्षेप करके इस दूरी पाटने का प्रयास करे। जनसंचार माध्यमों को सरकार के कामकाज के बारे में लोगों को सूचना देना और लोगों के पक्ष में सरकार पर नजर रखना होता है। इस दृष्टि से एक आदर्श स्थिति यही होती है कि पब्लिक एजेंडा, सरकार का एजेंडा और मीडिया एजेंडा में एक परस्पर का संवाद बना रहे और एक ऐसा तंत्र अस्तित्व में रहे कि इनके बीच पनपने वाली किसी भी दूरी या विरोधाभास को दूर करने के लिए इनके पैदा होते ही सक्रिय हो उठे। लेकिन आज लोकतंत्र, जनमत और मीडिया के बीच इस तरह के तंत्र के चरित्र और स्वरूप को लेकर ही बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। आज एक तर्क ये भी है कि पब्लिक और सरकार के बीच एक मध्यस्थ की भूमिका अदा करने की बजाय जनसंचार माध्यम मीडिया का एक अपना एजेंडा भी है। इस तरह जसंचार माध्यम जनमत को प्रतिबिंबित करने से कहीं अधिक जनमत को कुछ खास राजनीतिक और व्यापारिक हितों के अनुरूप ढालने की ओर अधिक झुके हैं।

टेलीविजन और चुनावी सच को दिखाया एनडीटीवी ने mail.sarai.net, May 11 2009

हर कॉमर्शियल ब्रेक पर बीजेपी के अभिमान और कांग्रेस के जय हो का डंका पिटनेवाले चैनलों ने देश के आम दर्शकों को ये कभी नहीं बताया कि आपके प्रत्याशी और राजनीतिक पार्टियां चुनावी विज्ञापन और मीडिया प्रचार की सवारी करके चुनाव जीतने के लिए परेशान है उसमें न केवल आपके विकास का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है बल्कि इससे किसी भी स्तर पर लोकतंत्र के मजबूत होने की कोई संभावना भी नहीं है। आज जबकि चुनावी महौल लगभग खत्म होने तक न्यूज चैनल देश के आम दर्शकों को ये बता रहे थे कि मीडिया ने चुनावी विज्ञापन के जरिए लोकतंत्र और विकास की जो तस्वीर बनाए और दिखाए वो सब झूठ है। अब तो आप-हम वोट दे चुके हैं, राजनीतिक सक्रियता के स्तर पर फिलहाल कुछ खास नहीं कर सकते लेकिन राजनीतिक पार्टियों की धज्जियां उड़ाने के क्रम में चैनल ने जो आंकड़े पेश किए हैं उससे हम मीडिया, चुनाव और देश की वस्तुस्थिति को लेकर अपनी समझदारी दुरुस्कर सकते हैं। अनुराग बत्रा (एडीटर इन चीज,एक्सचेंज फॉर मीडिया) का साफ मानना है कि आप कुछ भी कह लीजिए लेकिन आनेवाले समय में चुनाव को लेकर विज्ञापन और मीडिया का प्रसार और असर बढ़ता जाएगा।

जनमत सर्वेक्षण महज एक मनोरंजक कार्यक्रम jagranjunction.com, 21 Oct, 2013

आम तौर पैर यह देखा गया है की इलेक्शन से पहले कई प्रकार के सर्वेक्षण होते रहते हैं जो मीडिया चैनलों के अपने अपने निजी झुकाव के अनुसार राजनीतिक पार्टी के जीतने की भविष्यवाणी करते हैं। इन सर्वेक्षणों का विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि इन सर्वे में मात्र कुछ इलाकों बुद्धिजीवी वर्ग को शामिल होते हैं और भारत की राजनीति के इतिहास में बुद्धिजीवी वर्ग का योगदान सबसे कम रहता है वैसे भी जो मीडिया टी आर पी की भूख की खातिर एक बाबा के सपने को भी इतनी बार प्रसारित करता है की सरकार तक को वह बात सच मानकर खुदाई का आदेश देना पड़ता है। सपनो को तवज्जो देने वाले इस मीडिया पर भरोसा करना कितना तर्कसंगत और प्रासंगिक है अब तो विभिन्न चैनलों में आने वाले ये सर्वेक्षण जनता के लिए मनोरंजन का प्रोग्राम बनकर रह गए हैं कुछ लोगों का मानना है की इन भ्रामक प्रचारों में पड़कर जनता उलझती है परन्तु ऐसा नहीं है लोकतंत्र में आपका वोट आपकी इच्छा के अनुसार पडऩा है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की वह पार्टी जीतती है या नहीं जनता इन दुष्प्रचारों को मनोरंजन की भांति देखती है और स्वयं में मंथन करती है वैसे भी जो पार्टी जीत रही है उसे पडऩे या न पडऩे से कोई फर्क नहीं पड़ता आपको तो बस अपने वोट का प्रयोग करना है और अब तो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद तो जनता के पास इनमे इ कोई नहीं का विकल्प भी आ गया है जिसको प्रयोग में लाना जनता भली भांति समझती है

शोध का उद्देश्य

  • मीडिया एवं जनमत निर्माम के अंतर्संबंधों का सूक्ष्म विश्लेषण
  • प्रस्तुत अध्ययन से चुनाव की प्रक्रिया में मास मीडिया की पारदर्शी भूमिका का पता लगाना।
  • चुनावी कार्यक्रमों से जनता पर पडऩे वाले प्रभाव का पता लगाना।

उपकल्पना

  • जनमत निर्माण में मीडिया की भूमिका का अध्ययन!
  • चुनाव के दौरान जनमत निर्माण की प्रक्रिया का अध्ययन!
  • मीडिया की भूमिका सकारात्मक या नकारात्मक जनमत निर्माण के परिप्रेक्ष में!

शोध प्ररचना

मैंने अपने शोध में विवरणात्मक या वर्णात्मक प्ररचना का प्रयोग किया।

शोध की पद्धति और प्रणाली

शोध पद्धति-

इस विषय पर शोध करने के लिए शोधार्थी रूारा शोध की अलग . अलग पद्धितयों में सें सर्वेक्षण विधि और अवलोकन पद्धित का चयन किया गया है।

प्राथमिक स्त्रोत– प्रश्नावली, साक्षात्कार।

रिूतीयक स्त्रोत– संबंधित साहित्य का अध्ययन।

शोध प्रणाली –

शोधार्थी द्वारा इस शोध में प्रश्नावली और साक्षात्कार प्रणाली का चयन किया गया है।

प्रस्तुत शोध में चयनित समग्र क्षेत्र में 50 प्रश्नावली का वितरण किया गया। इसमें शोध से संबंधित 10 प्रश्न थे।

शोध का क्षेत्र व निदर्शन

संबंधित अध्ययन के शोध के लिए देवी अहिल्या विश्वविद्यालय का चयन किया गया। इसमें विश्वविद्यालय के पीएच.डी., एम.फिल. और स्नातकोत्तर स्तर के विद्यार्थियों का चयन किया गया।

शोधार्थी द्वारा इस शोध में कोटा निदर्शन पद्धति का प्रयोग किया जाएगा।

आंकड़े का प्रस्तुतीकरण और परिणाम

अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 60 प्रतिशत चुनाव के दौरान मीडिया की भूमिका सकारात्मक से समहत हैं। 35 प्रतिशत असहमत तथा 5 प्रतिशत कुछ न कहने की स्थिति में नजर आये। निष्कर्षत: चुनाव के दौरान मीडिया की भूमिका सकातात्मक है।

अध्ययन में प्राप्त आंकड़ों के अनुसार मीडिया द्वारा चुनाव हेतु व्यापक जनचेतना का प्रसार होता है, इस पर 65 प्रतिशत लोगों ने हां में अभिमत प्रदान किया, 20 प्रतिशत लोगों ने नहीं तथा 15 प्रतिशत लोगों ने कुछ न कह सकने की स्थिति में नजर आये। निष्कर्षत: मीडिया द्वारा चुनाव के समय व्यापक जन चेतना का प्रसार किया जाता है।

अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार मीडिया द्वारा चुनाव के समय लोगों के लिए स्वच्छ परिचर्चा, संवाद, प्रसारण, लेखन पर बल दिया जाता है, इस पर 78 प्रतिशत लोगों ने हां में अभिमत प्रदान किया है तथा 15 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने नहीं एवं 7 प्रतिशत लोगों ने कुछ न जानकारी होने के पक्ष में अभिमत प्रदान किया है। यानि चुनाव के समय मीडिया जनमानस के लिए स्वच्छ परिचर्चा, संवाद प्रसारण एवं लेखन पर बल देती है।

मीडिया द्वारा चुनाव के समय जनता में चुनाव प्रक्रिया के प्रशिक्षण के लिये परिचर्चाओं का आयोजन करती है के प्रश्न पर 58 प्रतिशत उत्तरदाताओं में हां में, 36 प्रतिशत ने नहीं तथा 6 प्रतिशत ने कुछ पता नहीं में अपना मत प्रदान किया है। साफ है कि मीडिया द्वारा जनता में चुनाव प्रक्रिया की प्रशिक्षण हेतु विशेष प्रसारण एवं परिचर्चाओं का समय-समय पर आयोजन किया जाता है।

अध्ययन में 62 प्रतिशत हां में प्राप्त आकड़ों के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि मीडिया प्रसारण में सभी राजनीतिक पार्टियों को बराबर कवरेज नहीं दिया जाता है।

अध्ययन में प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण में 75 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना है कि पेड न्यूज कहीं न कहीं चुनाव के नतीजों को बहुत प्रभावित करती है, ऐसे में मीडिया को तो पैसे मिल जाते हैं पर देश का भविष्य कहीं न कहीं अंधकार में चला जाता है।

अध्ययन के आंकड़ो से यह पता चलता है लोगों को चुनाव की पल-पल की खबर जानने की बहुत उत्सुकता रहती है, ऐसे में टीआरपी बढऩा लाजमी है, इन पल-पल की खबरों से भले ही न्यूज चैनलों की टीआरपी बढ़ जाए, पर चुनाव व्यवस्था के सम्मान में कहीं न कहीं गिरावट जरूर आती है।

अध्ययन में 62 प्रतिशत लोगों ने सहमति प्रदान की है कि चुनाव के दौरान जनमत निर्माण में मीडिया के ब्रेकिंग न्यूज के कांस्पेप्ट्स का काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 34 प्रतिशत लोगों ने माना कि इसमें जनमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है तथा 4 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कुछ भी नहीं कहा। निष्कर्ष ये कि चुनाव के दौरान जनमत निर्माण में मीडिया का ब्रेकिंग न्यूज के कांस्पेप्ट का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

अध्ययन में 67 प्रतिशत न माना कि पेड न्यूज, राजनीतिक विज्ञापन और ओपिनियन पोल को अतिरंजित करके दिखाने की प्रवृतियों से जनमत निर्माण में मीडिया की भूमिका का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है तथा 33 प्रतिशत लोगों ने माना कि इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। साफ है कि इससे ये बात सामने आई कि राजनीतिक विज्ञापन और ओपिनियन पोल को अतिरंजित करके दिखाने की मीडिया की प्रवृत्तियों का जनमत निर्णाम में नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

अधरयन से प्राप्त आंकड़ों में 72 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि मीडिया द्वारा चुनाव के पूर्व में जनमत सर्वेक्षण करना उचित है, 25 प्रतिशत ने माना कि पूर्व में सर्वेक्षण करना उचित नहीं है तथा 3 प्रतिशत ने कुछ भी नहीं कहा। साफ है कि मीडिया रूारा चुनाव के पूर्व में जनमत सर्वेक्षण करना उचित है।

शोध का निष्कर्ष

अध्ययन में आकड़ों के विश्लेषण से जनमत निर्माण में मीडिया की भूमिका का सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों पहलू का व्यापक रूप सामने आये है। चुनावों के परिप्रेक्ष में मीडिया की भूमिका पर बहुत बिहंगम परिचर्चाओं ने जहां मीडिया की भूमिका को जनमानस में प्रभावी रूप से स्थापित किया वहीं मीडिया के मनोबल को भी काफी उंचा किया। आज के दौर में जनमत निर्माण में मीडिया की भूमिका अति महत्वपूर्ण है। वर्तमान मीडिया काफी शक्तिशाली है। अखबार, रेडियो, टेलीविजन, इंटरनेट, नव सूचना तकनीक एवं नव संचार तकनीक के इस दौर में जनमत के मिजाज एवं रुझान को सहज ही प्रभावित किया जाता है।

संदर्भ-सूची

  1. फाडिय़ा बीएल और जैन पुखराज, भारतीय शासन एवं राजनीति, राजपाल एंड सन्स, दिल्ली, 2011
  2. मून, निक- ओपिनियन पोल, मैनचेस्टर यूनिवर्सिटि प्रेस, 1999
  3. गुप्त, बलदेवराज- जनसंपर्क, विश्वविद्यालय प्रकाशन, 2001
  4. भगत, अंजना- भारत में चुनाव और चुनाव सुधार, विकास पहब्लिशिंग हाउस, 1996
  5. उपाध्याय, अंजू शरण- इलेक्टोरल रीफॉर्म इन इंडिया, कांसेप्ट प्रकाशन, 2005
  6. चोपड़ा, जोगिन्दर कुमार- पॉलिटिक्स ऑफ इलेक्शन रिफॉर्म इन इंडिया, मित्तल प्रकाशन, 2008
  7. तिवारी, अर्जुन- जनसंचार समग्र, उपकार प्रकाशन, आगरा, 2008
  8. गुहाठाकुरता परंजय- मीडिया एथिक्स, ऑक्सफोर्ड, 2009,
  9. Bhadas4media.com
  10. Indianexpress.com
  11. Open magazine.com

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