जेलों में साहित्य, समाज और मीडिया

डॉ वर्तिका नन्दा
अध्यक्ष एवं सहायक आचार्य, पत्रकारिता विभाग, लेडी श्रीराम कॉलेज, दिल्ली

भारत में जेलें राज्य का विषय हैं और भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार इनकी देखभाल, सुरक्षा और इन्हें चलाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों के जिम्मे है। इनका संचालन जेल अधिनियम 1984 और राज्यों के बनाए जेल मैन्यूल के जरिए किया जाता है। इस काम में केंद्र सरकार जेलों में सुरक्षा, सुधार, मरम्मत, स्वास्थ्य सुविधाएं, ट्रेनिंग, जेलों के अंदर चल रही योजनाओं के आधुनिकीकरण, जेल अधिकारियों के प्रशिक्षण और सुरक्षा के विशेष ऊंचे अहातों को बनाने में मदद देती है। यह कागजी सच है।

लेकिन इन शब्दों के परे जेलों के कई बड़े सच हैं। दुनिया भर की कई जेलें अब खुद को सुधार गृह कहने लगी हैं लेकिन अब भी यहां सुधार की कम और विकार की आशंकाएं ज्यादा पलती हैं। इस वजह से कई बार अपराधी अपने कद से भी बड़ा अपराधी बन कर जेल से बाहर आता है और दोबारा अपराध से जुड़ जाता है। यह जेलों के संचालन और उसके उद्देश्य नाकाबिल साबित करता है। जेल अपराधियों को आपराधिक दुनिया के कड़वे यथार्थ, पश्चाताप और जिंदगी को दोबारा शुरू करने की प्रेरणा देने में अक्सर असफल रहती हैं। लेकिन वे सजा को लेकर नई परिपाटियां जरूर तय करती जाती हैं। सम्राट अशोक के काल में भी जेलें अव्यवस्थित थीं और यह माना जाता था कि एक बार जेल में गया व्यक्ति जिंदा बाहर नहीं आ पाएगा। लेकिन बाद में बौद्ध धर्म के संपर्क और प्रभाव में आने के बाद अशोक ने जेलों में सुधार लाने के कई बड़े प्रयास किए। बाद में हर्षचरित में जेलों की बदहाल परिस्थितियों पर कुछ टिप्पणियां की गई हैं। ह्यून सांग ने अपने यात्रा वृतांत में लिखा है कि उस जमाने में बंदियों को अपने बाल काटने या दाढ़ी बनवाने की भी अनुमति नहीं दी जाती थी। लेकिन कुछ खास मौके भी होते थे जब बंदियों को जेल से मुक्त कर दिया जाता था। कालिदास ने लिखा है कि जब किसी राजकुमार का जन्म किसी अशुभ नक्षत्र में होता था तो उसके प्रभाव को घटाने के लिए भविष्यवक्ता बंदियों की रिहाई की सलाह देते थे। इसी तरह से राजा की ताजपोशी के समय भी कुछ बंदियों को रिहा किया जाता था। प्राचीन भारत में जेलों का कोई व्यवस्थित इंतजाम नहीं था और न ही सजाओं को लेकर कोई बड़े तय मापदंड ही थे।

चूंकि जेलें प्राथमिकता सूची में नहीं आतीं, जेलें समाज से अलग एक टापू की तरह संचालित होने लगती हैं और समाज इस अहसास से बेखबर रहने की कोशिश में रहता है कि जो जेल के अंदर हैं, वे पहले भी समाज का हिस्सा थे और आगे भी समाज का ही हिस्सा होंगे। यह एक खतरनाक स्थिति है। इसलिए समाज, जन और तंत्र – तीनों के बीच पुल का बना रहना बेहद जरूरी है। पुल नहीं होगा तो जेल में सुधरने की बजाय बड़े अपराध की ट्रेनिंग और अवसाद को साथ लेकर लौटा अपराधी समाज के लिए पहले से भी बड़ा खतरा साबित होगा।

इसी पुल को बनाने की देश की अपनी तरह की पहली कोशिश है – तिनका तिनका जो जेलों को लेकर अलग-अलग स्तरों पर काम करती है। इसी कड़ी में 2015 में तिनका तिनका इंडिया अवार्ड की शुरूआत के समय यह सोचना इतना आसान नहीं था कि जेलों की यह मुहिम जल्द ही इतना बड़ा आकार ले लेगी। तिनका तिनका तिहाड़ और तिनका तिनका डासना के जरिए किताब, संगीत, कैलेंडर और दीवारों पर सपनों को उकेरने के सारे कर्म के बीच तिनका तिनका शृंखला के अवार्ड जेलों में उम्मीदों को लाने और उन्हें साकार करने में मदद कर रहे हैं। इन सम्मानों का मकसद जेलों में बंद कैदियों को मुख्यधारा से जोड़ते हुए सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना लाने का प्रयास करना है। इनमें चार वर्ग रखे गए हैं। कविता, पेंटिंग और विशेष टेलेंट के अलावा चौथा पुरस्कार जेल अधिकारियों के नाम रखा गया है। जेलों में सुधार और सृजनात्मकता के नाम रखे गए यह अवार्ड जेलों को आपसे में जोडऩे और उनमें उम्मीद की लौ जलाने की दिशा में एक प्रयास है। यह समाज से कटे वर्ग की समाज और राष्ट्र के लिए बदलती धारणाओं को जानने का एक सशक्त मंच भी है।

दिसंबर, 2016 को मानवाधिकार दिवस पर जेलों के 17 बंदियों और जेल अधिकारियों को पुरस्कृत करने की घोषणा हुई। बरेली जेल, उत्तर प्रदेश में बंदी 45 वर्षीय वैभव जैन की कविता ‘छींटेÓ को तिनका तिनका इंडिया अवार्ड (कविता) के लिए पहला पुरस्कार मिला। पेशे से अध्यापक रहे वैभव जेल की अपनी सजा काटते हुए अब कविता लिखते हैं। इस श्रेणी में दूसरा पुरस्कार राजकोट, गुजरात की 30 वर्षीया मनीषा राम सिंह डोडिया को उनकी कविता ‘फासलाÓ के लिए दिया गया। तीसरा पुरस्कार आगरा जेल में बंदी दिनेश गौड़ को उनकी कविता ‘मैं कैद हूंÓ तो क्या हुआ, मन मेरा आजाद है- के लिए मिला। यह सभी कविताएं देश मौजूदा माहौल से उपजी हैं और राष्ट्रवाद और मानवीयता को जेल की सींखचों से एक नए परिप्रेक्ष्य में देखती हैं।

2016 का तिनका तिनका इंडिया अवार्ड ( पेंटिंग) में पहला पुरस्कार बिलासपुर जेल, छत्तीसगढ़ में बंदी बलवीर कुमार विश्वकर्मा को नोटबंदी पर बनाई उनकी पेंटिंग के लिए दिया गया। 38 वर्षीय राम चरण धू्र को दूसरा पुरस्कार और 72 वर्षीय भैश सिंह साहू को नोटबंदी पर ही उनकी पेंटिंग के लिए तीसरा पुरस्कार दिया गया है। इस वर्ग में रवि शंकर सिंह को बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ के लिए सांत्वना पुरस्कार दिया गया। 28 वर्षीय रवि शंकर जेल में आने से पहले स्टील की एक कंपनी में काम करते थे। खास बात यह है कि पेंटिग में सभी पुरस्कार छत्तीसगढ़ की बिलासपुर जेल के नाम गए। यह सभी पेंटिंग्स भी देश के ज्वलंत मुद्दों पर बंदियों की चिंता और सोच को दिखाती हैं।

दुनिया का सर्वश्रेष्ठ साहित्य जेलों में लिखा गया। जेलों ने आजादी के दौर में क्रान्तिकारियों की ऊर्जा को बनते और पनपते देखा हैं। जेलों में राष्ट्रवाद पनपा। जेलों ने क्रांतियों को जन्म दिया। भारत में आजादी पाने के दौर में जेल जाने वाले क्रांतिकारियों ने इन्हें अपना तीर्थ माना और यहां से देशभक्ति की अलख जगाई। यह भी जेलों का एक रूप है।

लेकिन साथ ही जेलें अपराध की रोकथाम की जरूरत समझीं गईं। वे इसलिए भी बनीं ताकि वे अपराध की तय की हुई सजा को पूरा करवाने की जगह बनें और सुधार गृह की परिपाटी पर खरा उतरें। लेकिन जेलें और कानून इस बात की गारंटी कभी नहीं दे पाये कि इनकी मौजूदगी भर से अपराधों का खात्मा हो जायेगा। फिल्मी दुनिया ने अक्सर जेलों को रहस्य और यंत्रणा से लबालब दिखाया। जेलें कल्पना का हिस्सा कभी नहीं बनतीं और सपनों का भी नहीं। जेलों पर लिखने वाले सीमित ही हैं और जेलों के अन्दर जो लिखा जाता हैं, उसे बाहर लाने के लिए खिड़कियां भी नहीं हैं। लेकिन इसके बावजूद इस सच को नकारा नहीं जा सकता कि जेलों में लिखा जाने वाला साहित्य समय और समाज की कसौटी पर खरा उतरने की एक बड़ी काबिलियत रखता है।

अपने शोध के दौरान मैंने दुनियाभर में जेलों को लेकर जो भी जानकारी, सामग्री और साहित्य सुलभ हो सका, उसे पढऩे और समझने की कोशिश की। इस कोशिश में अखबारों में छपी रिपोर्टों और ऑनलाइन मीडिया ने भी मेरी काफी मदद की। यह एक बड़ा सच है कि जेल के अनुभवों पर लिखा गया साहित्य हमेशा दिलचस्पी की नजर से देखा गया है।

अकेलेपन से उपजे आत्मचिंतन से जेल प्रवास के दौरान लिखने की परंपरा बरसों पुरानी है। आत्म अवलोकन के बीच लिखा गया कुछ साहित्य भले ही निजी कहानियों में सिमट कर रह गया लेकिन इसके बावजूद ऐसा बहुत कुछ लिखा गया जिसने समाज की दिशा भी तय कर दी।

2016 में तिहाड़ जेल में बंदी रहे सुब्रत राय की लाइफ मंत्र,यरवदा जेल के अनुभवों पर आधारित संजय दत्त की सलाखें और जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार की जेल अनुभवों पर आधारित किताब लिखने की घोषणा भी जेलों को साहित्य को लेकर एक नए रोमांच को जन्म दे चुकी है।

बिहार की हजारीबाग जेल में अपने अनुभवों पर आधारित किताब ‘माई ईयर्स इन एन इंडियन प्रिजन’ के जरिए मेरी टेलर ने भारतीय जेलों का खाका ही खींच कर रख दिया है। इसे भारतीय जेलों पर अब तक की सबसे खास किताबों में से एक माना जाता है। इस ब्रितानी महिला को 70 के दशक में नक्सली होने के संदेह में भारत में गिरफ्तार किया गया था। 5 साल के जेल प्रवास पर लिखी उनकी यह किताब उस समय की भारतीय जेलों की जीवंत कहानी कहती है।

इस प्रकाश में तिनका तिनका जेलों को लेकर एक ऐसे अभियान पर है जहां जेलें मुख्यधारा के चिंतन का एक बड़ा बिंदु बन सकेंगीं।

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