विज्ञापन: उपभोक्ता संस्कृति और सामाजिक बदलाव का संस्थान

प्रो. पुनीता हर्ने *
* जन संचार एवं पत्रकारिता विभाग,
गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद

लेटिन भाषा से मिले शब्द ‘Advert’ का अर्थ होता है ‘Turn the mind to’-अत: मन को बदलने के सक्षम साधन के रुप में सालों से स्थापित हुए इस माध्यम का यानि की विज्ञापन का उपयोग समाज के कुछ विशेष वर्ग के लोग पैसा खर्च करके अपने फायदे के लिए करें यह अत्यंत स्वाभाविक है।

निवेश, उत्पादन, बिक्री, मुनाफा और पुन:निवेश करके अपने व्यवसाय का विस्तार करने की प्रक्रिया में विज्ञापन उद्दीपक (Catalyst) के तौर पर काम करता है, और मुक्त अर्थतंत्र में जहां निवेशक स्वयं विज्ञापन का उपयोग करके स्वयं निश्चित किये हुए लक्ष्यांक को सिद्ध करने के लिए मानव मन को अपने उत्पाद, विचार, सेवा की ओर केन्द्रित करने के प्रयास करता है, और वहीँ पे, उसी मोड़ पे आर्थिक, सामाजिक और मानसिक गतिविधि होती है.

(1)

मानव को एक सुनिच्चित उत्पादन की ओर आकृष्ट करके उस उत्पादन का उपयोग करके उसकी सामाजिक स्थिति का स्तर (यहाँ स्टेटस का ख्याल) किस तरह से ऊँचा उठेगा उसका विस्तृत परिदृश्य खडा करके उसकी आमदनी (आय) में से कुछ हिस्सा खर्च में परिवर्तित करती विज्ञापन की यह प्रक्रिया काफी जटिल एवम सटीक है. विज्ञापन का एक साधारण अर्थ (Broadly Speaking) देखें तो ‘यह एक नकद खर्च करके खरीदा हुआ माध्यम है, जो बिनअंगत है और इसका उपयोग उत्पाद, विचार, सेवा के विषय में असरकारक पेशकश करके लोगों को अपनी ओर आकृष्ट करना है।

आर्थिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो, विज्ञापन मार्केटिंग का साधन है, जो विपुल मात्रा में उत्पादन, सेवा या सूचना का आदान प्रदान करता है, जिसमें उत्पादन की कीमत, उसका उपयोग, उसके फायदे के विषय में दावा (Claim) और वादा (Promise) किया जाता है।

जन संचार माध्यमों की विभिन्न कंपनिओं के मालिक, संचालक, संवाहक, कार्यकर्ता, प्रचारक, कर्मचारी गण और भावक सब अलग होते है। खास कर उत्पादक वर्ग अपने आप विज्ञापन बनता नहीं है, और विज्ञापन बनाने वाला वर्ग उत्पादक नहीं होता। अत: उत्पादक से ग्राहक तक चीजों के पहुँचने की लंबी प्रक्रिया में कई सामाजिक विक्षेप आते है। अत: असरकारक एवम प्रभावी विज्ञापन बनाने के लिए और उसके आर्थिक हितों को नुकसान न पहुँचे इस लिये समाजशास्त्रीय पद्धतियों से उपभोक्ता का अध्ययन किया जाये तो, बाजार में कहाँ पर अवकाश है यह जानकर उत्पादक के व्यापार के उदेश्य को मुनाफे में परिवर्तित किया जाता है।

जन संचार माध्यमों के उपभोक्ता कई है और कई किस्म के हैं। उनकी पहचान जटिल है और अनेक विविध स्तरों तक विभाजित है। संचार माध्यमों का उपयोग करनेवाला हर व्यक्ति अपने उदेश्य से उनका उपयोग करता है। तमाम उपभोक्ता माहिती, मनोरंजन, विज्ञापन तथा तसवीरों को उतनी ही गंभीरता से ले – यह जरूरी नहीं है। जनसंचार माध्यमों की कुल विभिन्न प्रणालियां (Total Mass Communication System) और समूह माध्यमों के कुल उपभोक्ता (Total user of mass Communication System) की संख्या, उनकी प्रकृति, उनके Likes – Dislikes की संख्या बढ़ी भी है, और उसे समझना उतना ही जटिल है.

जनसंचार माध्यम कई सुचना वाहिकाओं के (Information Channels) वाहक है. उन्हें खुद अपना माध्यम संघर्ष है। इन तमाम के साथ – या उनके पीछे किसी न किसी के पैसे लगे हुए हैं, जो मुनाफा अच्छा होने की अपेक्षा रखे हुए हैं।

अत: मानव मन को आहत करके उसे व्यक्ति में से ग्राहक बनाने की, ग्राह्क की तरह रहने की, Tempt Buyer में से Attempt Buyer बनाने की प्रक्रिया में संचार माध्यम सिर्फ दृष्टा नहीं बने रहते है बल्कि प्रक्रिया का हिस्सा बनते है। विज्ञापन हो या कोई ओर मीडिया प्रोडक्ट -उसमें से मिलने वाली आय उसके स्वयं के अस्तित्व के लिए अनिवार्य होती हैं।

उदार पूंजीवादी आर्थिक – सामाजिक व्यवसाय में तथ्यों की पारदर्शिता, प्राप्ति और विकल्पों की सम्भावना के विषय में सभी सूचनाएँ मिलें वह अनिवार्य है। अमरिकी मार्केटिंग असोसिएशन ने दी हुई एक व्याख्या में समझाया हुआ शब्द नॉन, फमिलिएर और स्पोंसर शब्द का अर्थ भी यहाँ समजना जरूरी है.

‘Advertising is any paid form of non personal presentation and promotion of ideas, goods and services by an identified sponsor.’ विज्ञापन वस्तु, विचार और सेवा का प्रसार करने एवम बिन वैयक्तिक निदर्शन करने के लिए एक पहचान प्राप्य प्रायोजक के द्वारा पैसे खर्च करके किया गया प्रयास है.

संचार माध्यमो की संख्या और प्रसार में जिस तरह से बढ़ोतरी हो रही है उसमें एक ओर जहां सूचना और मनोरंजन समाज के बहुत विशाल समूदाय तक पहुँचने का प्रयास करते है, वहाँ उसी मार्ग से विज्ञापन भी लोगों तक पहुंचता है। तब विज्ञापन के स्वरुप में ‘ग्राहक संस्कृति’का निर्माण करने की प्रकिया भी घर घर तक पहुँचती है।

विज्ञापन को देखनेवाला हर व्यक्ति उसका उपभोक्ता नहीं है और देखने वाला हर कोई खरीददार नहीं है। अगर है तो निर्णय करनेवाला कोई और है। अगर निर्णय ले सकता है तो वो खुद कमानेवाला नहीं होता। ऐसी कई स्थितियाँ एक साथ उपभोक्ताओं के विश्व में विद्यमान होती हैं और समय समय पर अपना असर दिखाती हैं। अत: विज्ञापन का असर अलग अलग देखने वालों के लिए भिन्न भिन्न तरीके से होता है – ‘कंज्यूमर कल्चर में ‘cult’ का निर्माण होना अर्थात खरीद करते ही जाना, खरीद करने के बाद ही शांति मिले और खरीद न सके वहां तक चैन न मिले ऐसे संप्रदाय का अनुयायी होना – ऐसी ये सरल किन्तु जटिल – सामाजिक – मानसिक – आर्थिक मशक्कत के परिणामस्वरूप बाजार में गतिशीलता रहती है, और समाज एवम् व्यक्ति एक ऐसे ख्याल में रचे बसे रहते हैं कि, कुछ विशेष उत्पादन खरीदने से और उसका उपयोग करने से उनका विकास होगया है, जीवन स्तर सुधर गया है, और कुछ खास चीजें खरीदने से उनका समाज के एक विशेष वर्ग में प्रवेश हो गया है।

अत: उत्पाद के उपभोग की आदत से विवश होने के कारण, उत्पाद तक पहुँचने के प्रयास के कारण, उसके लिए आर्थिक संपन्नता हांसिल करने के लिए क्षमता वर्धन करने के कारण, परंपरागत आदत बदलने के लिए, नई आदत स्वीकृत करने के लिए शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक एवम् सांस्कृतिक तरह से तैयार रहने वाला मनुष्य स्वयं ही नई ‘उपभोक्ता संस्कृति’ का निर्माण करता है।

विज्ञापन का निर्माण ‘सर्जन’ कौशल्य:

बतौर उपभोक्ता समाज कुछ ‘खास’ उत्पादनों का उपयोग करता है. यह जो ‘खास’ है उस खास से ही तय होता है कि आप समाज के किस स्तर में है। अगर विकास की प्रक्रिया का परिणाम यानि एक स्तर से उठकर आगे जाना, ऐसा माना जाता है तो और अगर समाज के जिस किसी स्तर में हम हैं उससे आगे उठकर अगले चरण में जाना विकास माना जाता है तो, विज्ञापन ऐसी खास स्थितियों में वातावरण का निर्माण करता है.

विज्ञापन एक साथ दोहरी कार्यवाही करता है। एक और जहां वह विद्यमान सामाजिक सांस्कृतिक चिह्नों को गुप्त समाहर्ता (hidden ersuader) के तौर पे संभालता है, कार्यानवित् रखता है, तो दूसरी और वो स्वयं समाज के लिए सांस्कृतिक मूल्यों का, चिह्नों के निर्माण करने का सहेतुक प्रयास भी करता है।

अत: विज्ञापन बहुत ही सुक्ष्म रूप से शान्त तरीके से संदेश स्थापित करता है, और खुद के रचे हुए उन तमाम मूल्यों को पुन: स्थापित करता है. यह सहेतुक प्रयास स्वाभाविक है कि प्रायोजित ही होते हैं।

…….और आश्चर्य की बात तो यह है कि, विज्ञापन प्रकृतिगत और उत्पादकीय रूपसे बिन वैयक्तिक है ओर यही वजह है कि, उसके उपर सीधा आक्षेप मंडित करने के लिए हाथ में कुछ भी नहीं आता है और फिर भी जो दिखता है वो हर बार सच नहीं होता।

विज्ञापन और उसकी समाजशास्त्रीय संदर्भ में पहचान:

समाजशास्त्र के जनक आगस्त कोम्त कहते हैं कि, ‘सामाजिक घटनाएँ कुछ विशेष नियमों के अधीन हैं, ये नियम मनुष्य समाज की अनिवार्यताओं की उत्क्रांति के रुप में संचालित होते हैं। इस तरह गति करते हुए समाज के विभिन्न धारकों के बीच अंतरसंबंधो के नियम और मानव समाज की प्रगति के नियम – ये उस नये विज्ञापन की वस्तु (सामग्री) बनते है (जोशी 1984)। स्पेन्सर इसे सामाजिक उत्क्रांति के नियम के तहत जांचते हैं। मेकाईवर उसे सामाजिक संबंधो का विज्ञान करार देते हैं। जोहनस को उसमें सामाजिक मुद्दों का अभ्यास करनेवाला शास्त्र दिखाई देता है, ग्रीन उसे तमाम मानवीय संबंधो के विषय में व्यापक और सुग्रथनात्मक अभ्यास करनेवाला विज्ञान कहते है (जोषी 2004)

..तो जोशी स्वयं उसे अनेक चल पर अवलंबित किन्तु, समाज की सामाजिकता के जतन करने वाले मानांक, संस्कारमूल्य, उसमें होते हुए सामाजिक परिवर्तन इत्यादि को समझने एवम् समझाने का प्रयास करने वाले शास्त्र के रूप में मानते हैं. उनके मत अनुसार समाजशास्त्र अपने आपमें खास है और वह राज्यशास्त्र और अर्थशास्त्र की तरह किसी बात के एक ही पहलू का अभ्यास नहीं करता बल्कि, सभी आयामों को विविध अंग मानकर सामाजिक संगठन को उसकी अखिल स्थिति में समझनेका प्रयास करता है।

अगर हम विज्ञापन को एक सामाजिक साधन के स्वरूप में जाँचते हैं तो , विज्ञापन के उसके स्पष्ट आर्थिक हेतु होते हैं जिसके लिए वह सांस्कृतिक मूल्य, आदतें, वातावरण एवम् सर्वमान्य परिस्थितियों का आधार लेता है। वह एक material Culture का निर्माण करता है, जिसके लिए वह एक Institutional Culture, (सामुदायिक संस्कृति) और intellectual normative and artistic culture, बौद्धिक , नौतिक एवम् सौदार्यलक्षी -रसलक्षी कल्पना एवम् उर्मि की अभिव्यक्ति करके सर्जनों के पारस्परिक संबंध एवम् कार्यों का समस्त सामाजिक, संस्थानिकृत संदर्भ में उपयोग करता है और परिणाम स्वरूप एक नई उपभोक्ता संस्कृतिका निर्माण करता है (जोशी 2008)।

अगर हम विज्ञापन को उत्पादन के social positioning के रूप में सोचते हैं तो, ‘विविध प्रचार प्रसार माध्यमों के द्वारा उसका ज्यादातर अन्जान लक्षितों तक पहुँचता हुआ सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक स्थिति का अभ्यास करके उसके साधारणीकरण (generalisation) के आधार से बना यह एक print, audio & audiovisual प्रकार का साधन है, जो किसी व्यक्ति का सर्जन या हथियार न बनकर उत्क्रांति की प्रक्रिया का एक घटक बनता है, और खुद भी कई परिवर्तनों को अपने आपमें स्वीकार करते हुए, समाज विशेष में अपना स्थान बनाये रखता है.

विज्ञापन की समाजशास्त्र के आधार पर क्षमता की चर्चाओं को केन्द्र में रखते हुए यह अध्ययन में केडबरी कंपनी के डेरी मिल्क चोकलेट के टेलीविजन पर प्रसारित विज्ञापन का अध्ययन किया है। समाज के निभिन्न स्तरों मे उसने जो काम किया है उसे समझने का प्रयास यहाँ किया गया है।

केडबरी डेरीमील्क (केडेमि/CDM) चोकलेट भारत में 1948 के बाद आई. उसकी अधिकृत वेबसाईट में उसने अपनी विज्ञापन के विषय में लिखा है कि,

“CDM encapsulates, enormous, breath of emotions, it has shared value as togetherness, to the personal Values of individual enjoyment of pure magic.”

केडबरी डेरीमिल्क आनंद के सहवास की अमूल्य मिल्कत के हिस्सेदार बनने की उन संवेदना भर अनेक मूल्यवान पलों की साक्षी बनती है। सहदयता के लिए वह हमेशा आपके साथ है। केडबरी डेरीमिल्क सम्पूर्ण शुद्ध संज्ञासूचक जादू है।

CDM के विविध स्टेक होल्डर (उपभोक्ता) हैं. उसे इस तरह कहें तो समाज में विभिन्न उम्र के वर्गों में केडबरी विभिन्न स्लोगन एवम थीम के साथ विद्यमान है। लोग जब विज्ञापन देखते तब वह एक उसके लिए वे विशेषत: अलग से समय देते हैं या फिर चैनल बदल देते है. पर केडबरी के विज्ञापन में लोगों को, उपभोक्ताओं को उनके sentimental traits का उपयोग करके उन्हें विज्ञापन की ओर जोड़े रखते हैं. यहाँ केडबरी के जिन विज्ञापनों का अध्ययन किया गया है उनका क्रमश: विश्लेषण प्रस्तुत है.

कुछ खास है जिंदगी में:

यह विज्ञापन 80 के दशक के शुरू के वर्षों में टी.वी. पे आता था। क्रिकेट का मैदान, अंतिम ओवर को अंतिम बोल, 99 रन, आउट होने की संभावना, फिल्डर का बोल चुक जाना, 100 रन होना, क्रिकेटर की फेन/प्रेयसी का वोचमेन के हाथ के नीचे से दौडक़र मैदान में घुस जाना … अंत में स्लोगन असली स्वाद जिंदगी का …

CDM के इस विज्ञापन में स्टेक होल्डर यूथ (युवावर्ग) है, और असली स्वाद जिंदगी का स्लोगन की अपील के साथ बने इस विज्ञापन में fun centric approach है। युवती का मैदान में घुस जाना, क्रिकेटर का शरमाना, उन दिनों में कई लोगों को इस विज्ञापन ने प्रभावित किया था। समाज के संपन्नवर्ग के लोगों की प्रोडक्ट के स्वरुप में प्रस्तुत हुई CDM अपने हर एक campaign में अलग सोच प्रस्तुत करती थी। सादा कोई भी चोकलेट नहीं, सिर्फ CDM खाने से मैदान में दोडक़र घुसने की हिम्मत आती है CDM खाइए और बोल्ड बनिए ऐसे गर्भित संदेश के साथ प्रसारित होते हुए इस विज्ञापन ने अपने समय में अनेक वर्गों को प्रभावित किया था।

इसी शृंखला में अन्य कई विज्ञापन आये, जिसमें खुद अपनी शादी की महेंदी भी CDM खाने की लगन में खराब हो जाती है या CDM खाने की इच्छा के सामने आप कोई भी महत्वपूर्ण बात भूल जाते हो, यह बात सिद्ध होती है।

पप्पू पास हो गया ….

यह अभियान CDM के विज्ञापनो में अपने आप में खास किस्म का था क्योंकि इस विज्ञापन से अमिताभ बच्चन इस प्रोडक्ट से जुड़े। Fun centric mood के इस विज्ञापन में 30-35 उम्र में पप्पू बारहवी पास करता है। यह एक बड़ी घटना है जिसे celebrate करना जरुरी है और सबको CDM बाँटा जाता है। पैसे कौन देगा? पैसे पप्पू देगा। ‘पप्पू’ यहाँ पात्र भी है, और विशेषण भी।

भारतीय परंपरा अनुसार अगर कोई अच्छे नम्बरों से पास होता था तो पेढे बाँटने की परंपरा थी, यहाँ से यानि की एस विज्ञापन से CDM बांटकर, खिलाकर भारतीय सांस्कृतिक परंपरा को replace करने की शुरुआत हुई दिखती है.

भारत के विज्ञापन जगत् में अमिताभ बच्चन का इस स्वरुप में आना, और ‘तमाम अवरोध के बावजूद पप्पू का पास होना – तो CDM तो बनता है’ ऐसा वातावरण निर्माण और स्थापित करने में CDM कामियाब होता है.

युवा और वयस्कों को केंद्र में रखकर बनाये हुए इस विज्ञापन का स्पष्ट संदेश है, ‘पास हो जाओ तो CDM देना पडेगा’ पेढे बाँटना तो बीते ज़माने की बात है.

‘कुछ मीठा हो जाये’

इस अभियान में CDM खाने के लिए युवती के शरीर में प्रवेश करते अमिताभ बच्चन समाज में मीठा मतलब CDM इस बात को स्थापित कर देते है.

‘पहली तारीख’

मध्यमवर्गीय बजट में चोकलेट, पिपरमिंट का निश्चित स्थान तो था ही पर फालतू खर्च की गुंजाईश नहीं थी। ‘पहली तारीख’ को तनखाह के साथ जोडक़र ‘मीठा है खाना आज पहली तारीख है’ स्लोगन वाले विज्ञापन से CDM मध्यमवर्ग के 5rs. सेगमेंट में पहुंचती है. ‘पहली तारीख’ कन्सेप्ट को केंद्र में रखकर अलग अलग कई विज्ञापन किये गये है. 70’ के Indian Cultural traits जैसे की बचत करना, सिनेमा जाना, मीठा खाना, इन सब के लिए पहली तारीख का बड़ा महत्वपूर्ण दिन होता था… ईएसआई कई भारतीय समाज की अनिवार्यता और मानसिकता का उपयोग करके CDM समाज के एक अन्य स्तर में पहुँचती है।

‘खाने वालो को खाने का बहाना चाहिए’

स्लोगन वाली विज्ञापन में थाली में मिठाई की जगह 5 Rs. वाली CDM रखी हुई है जो नवसंपन्न, अभिजातवर्ग के लोगों के वहाँ हो रहे सामाजिक प्रसंग में सबको दी जा रही है। इस विज्ञापन में दिखाये जा रहे लोग समाज के ट्रेंड सेटर के रूप में है। उसमें एक आह्वान भी है कि, अगर आप खर्च कर सकतें हैं तो मिठाई की जगह CDM बाँटिए.

‘शुभारंभ’

यह अभियान 2010 में आया. इसमें टीनेज, युवा, मध्यम वयस्क युगल, नवदंपती को विज्ञापन में लेकर समाज के हर किसी वर्ग में पहुँचने की कोशिश की गई है.

‘माँ ने कहा है कुछ अच्छा करने से पहले मीठा खाना चाहिए….’
‘Jeans और मैं…? पडोसी क्या कहेंगे?’
‘तुमने मुझे लास्ट में आई लव यु कब बोला…?’
‘इट्स टू डायरेक्ट …. आई एम एक्सपेक्टिंग….’

इन तमाम अभियानों में CDM खाने से आप में वो सब कुछ कहने की या करने की हिम्मत आ जाती है जिसके लिए आप बड़ी मशक्कत कर रहे होते हैं.

भारतीय परंपरा में दही या गुड खाकर नए काम का शुभारंभ किया जाता है. CDM ने इन भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को replace कर दिया है और कुछ भी नया करते वक्त CDM खाना-खिलाना अनिवार्य है ऐसा उन विज्ञापनों ने सिद्ध कर दिया था। शुभारंभ अभियान के बारे में केडबरी डेरी मिल्क की अधिकृत वेबसाइट में लिखा है कि,

“2010 shubharambh campaign was launched during lines from the traditional Indian customs of having something sweet before embarking on something new.”

2011-12 में आया ‘‘खाने में क्या है?’’, ‘मीठे में क्या है’? अभियान इस विज्ञापन शृंखला में भारतीय परंपरा मे भोजनांते मीठा खाने की परंपरामें मिठाई की जगह CDM को replace करने का प्रयास किया गया है।

समाज के मध्यमवर्ग में अपनी जगह बनाने के लिए CDM ने ‘लड्डू फुटा’ अभियान बनाया। ये अभियान अत्यंत सफल रहा। ‘मन में एक लड्डू फुटा, दूसरा लड्डू फुटा….’ इस अभियान के बाद CDM ‘यूँ ही खा सके’ वाले स्तर में पहुँचती है और समाज के हर किस्म के लोगों तक पहुँचने की कोशिश में रहती है।

सामाजिक स्तरीकरण

सिर्फ 2 Rs. में समाज के संभवत: तमाम स्तर के लोगो के पास पहुँचने के बाद भी CDM अपने विज्ञापनों के माध्यम से पुन: सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया में कार्यान्वित होता है और CDM सिल्क को बाजार में लोंच किया जाता है.

थोड़ी महंगी मुलायम (ज्यादा सॉफ्ट) CDM silk उत्तेजित करनेवाली विज्ञापन के साथ समाज में ष्ठद्गह्यद्बह्म्द्ग को जन्म देने वाली विज्ञापन बनकर प्रस्तुत होती है।

“Have you felt silk lately” जैसी erotic punch line के साथ, kiss me, close your eyes and miss me जैसी जिंगल के साथ introduce होती हुई इस प्रोडक्ट के विज्ञापन में ऐसा दावा किया गया है कि, You have to forgive them who are having CDMS as they are lost in indulging and savoring CDMS and they are so innocent and busy in unabashed joy and unmindful of their surroundings.” (official Website CDM)

CDM के इस विशेष विज्ञापन ने CDM के Edict users को opt for silk, to have it and for that to ask for it from (parents, friends etc.) की प्रक्टिसको गतिशील बना दिया था। Market Movers ने CDM silk और previous product को समाज में उतनी ही तेजी से establish कर दिया।

उसके बाद आया Silk का (2013) version. इस विज्ञापन में बर्फीली घाटी में घुमते हुए युगल की बात है. यह विज्ञापन एक विषमता और विरोधाभास का वर्णन करता है. एक दूसरे के साथ रहेने के लिए अपने अतिव्यस्त शेड्यूल में से वक्त निकालकर घुमने आये हुए युगल में से पुरुष अकेले में भी सुकुन और आनंद नहीं पा रहा है और वर्च्युअल वर्ल्ड में अपने मोबाइल में व्यस्त है। स्त्री जो उसकी पत्नी, प्रेयसी या मित्र जो कोई भी है – वह उसका साथ पाने की आशा रखती है, और उसके ऊपर बर्फ फेंकती है। संबंधो में गरमाहट लाने के लिए बर्फ का गोला बनाकर फेंकती है – और ये गुस्ताखी पुरुष से मानो सहन न हुई हो वैसे वो देखता है. स्त्री Sorry कहती है … और अचानक पुरुष ‘सोरी की बच्ची’ कहकर उसे पकडऩे दौड़ता है. उम्र के कारण वे ज्यादा न दौड़ते हुए बर्फ में गिर जाते है। स्त्री उसके गालो पे प्यार से ठंडा ठंडा CDM लगाती है, पुरुष उसे लेने जाता है, वह रेपर के निचे से CDM लेकर वापस उठकर भागती है.

एक विशिष्ट बौद्धिक, संपन्न, अत्याधुनिक, अतिव्यस्त मध्यमवयस्क वय यूथ में CDM को establish करना अपने आपमे दुष्कर कार्य था। जो इस विज्ञापन के माध्यम से CDM ने हांसिल कर लिया है। सिग्नल पे वेट करते हुए CDM को खाना / चाटना अब गंदा नहीं बल्कि New erotic / attractive gesture बन गया है – या बना दिया गया है.

(3)

अंतत: यह एक ongoing research study है जिसका निरीक्षण के आधार पर किया किया गया विश्लेषण है। अपने आप में उसकी कई मर्यादाए हैं, पर फिर भी इस क्षेत्र का इस किस्म का यह प्रथम प्रयास है.

भारतीय परंपरा की लाक्षणिकताओ का उपयोग करके (मिठाई, त्यौहार, कपड़े- रीतिरिवाज) CDM के रास्ते समाज के हर स्तर में पहुँचने का यह एक सुनियोजित प्रयास है. और एक paid form के माध्यम से यह deliberate and planned effort सफल होता है. CDM की विज्ञापनों की शृंखला में, राखी में भाई बहन को CDM का पेकेट देता है तभी बहन भाई को खुशी खुशी राखी बांधती है। वहां से लेकर पोस्टमेन एक दूसरे की चिठ्ठी एक दूसरे के घर पहुंचाकर सबको इकठ्ठा करता है और सब CDM खाते है इन तमाम विज्ञापनों की मदद से समाज में ‘नए सांस्कृतिक मूल्यों और चिन्हों का निर्माण’ हुआ है.

विज्ञापन स्वयं अनेक मर्यादाए और वैविध्यो की असमंजस के बीच जन्म लेता हुआ एक प्रोडक्ट है, वह एक प्रणाली (system) की तरह काम करता है और उसके निवेशको के हित एवम लाभ/फायदे को ध्यान में रखकर उसे वफादार रहकर मानव समाज की आदते बदलती है, और इन सबसे अनभिज्ञ समाज उसे मनुष्य सभ्यता के उत्क्रांति के एक चरण के स्वरुप में स्वीकार भी कर लेता है क्योंकि मूल्यों और परंपराओ का संवर्धन करने के प्रयास भी परंपरावादी या रुढिवादी होना माना जाता है और उसके लिए समाज भी कई मामलों में स्वयं तैयार नहीं होता.

विज्ञापन का विषयवस्तु अच्छे से अच्छा तैयार होना, प्रोडक्ट के लिए संशोधन होना, नए आर्थिक सामाजिक हित को नजर के सामने रखना, निवेशक, उत्पादक और बाजार की तरह एवम अंतरराष्ट्रीय प्रवाहो को ध्यान में रखना एवम नियंत्रण संस्थाओ से मिली सूचनाओ का पालन करना-इन तमाम का संकलन करते हुए एक अच्छे विज्ञापन का निर्माण होता है. अत: इतने विशिष्ट तरीके से रचती हुई, बनती हुई विज्ञापन स्वयं सांस्कृतिक संस्थानवाद के सामने संस्कृति के मूल्यों का उपयोग करके विशिष्ट तरह की ‘उपभोक्ता संस्कृति का’ निर्माण करती है. इस प्रक्रिया के दौरान व्यक्ति स्वचित ही अपने व्यक्तिगत हित को देख सकता है. व्यक्ति में से उपभोक्ता बनने की प्रक्रिया में व्यक्ति और क्रमश: समाज भी उन मूल्यों को निर्विरोध स्वीकार कर लेता है, और आधुनिक होने के भ्रामक ख्याल में रचे बसे रहकर उन्ही बदले हुए सांस्कृतिक मूल्यों को खुद के मूल्य मनाकर उसके पालन और संवर्धन में व्यस्त रहता है।

अत: प्रणालि से संक्रमित हो जाने के बाद भी उसका विरोध करके बाहर आने के बजाय बृहद समाज उसका हिस्सा बने रहने के आनंद में रचाबसा रहता है. ऐसा इस अभ्यास के अंत में स्फूट होता है. यह तारण अंतिम नहीं है किन्तु फिलहाल तो अत्यंत मौलिक एवम आखरी है।

  1. Ahuja, Ram, Indian Social System. 1993 Rawat Publication, Jaipur
  2. Bhanawat Sanjiv Jansampark avam Vigyapan. 2002 Jan Sanchar Kendra, Rajasthan Vishwavidyalay, Jaipur.
  3. Hovland Roxanne and Wolberge Joyce, Advertising, Society and consumer culture 2011 M.E Sharpe, NewYork 10504 USA.
  4. Joshi, Vidhyut Sahitya ane Samaj 2004 Parshwa Publication, Ahmedabad

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