सोशल नेटवर्किंग साइटों का युवा वर्ग पर प्रभाव

अनिल कुमार पाण्डेय*
डॉ. श्रीकांत सिंह**

संक्षेपिका

इंटरनेट आने के बाद जब सोशल नेटवर्किंग की शुरूआत हुई तो हमारे समाज एवं संचार वैज्ञानिकों ने इसे समूह विशेष का विषय माना था, लेकिन अगर इसके वर्तमान स्वरूप को देखा जाए और इनके उपयोगकर्ताओं की संख्या पर नजर डाली जाए तो स्थिति को आसानी से समझा जा सकता है। समूह विशेष का माध्यम माना जाने वाला सोशल मीडिया आज जनसंचार माध्यमों का एक बड़ा विस्तार साबित हुआ है। अन्य संचार माध्यमों की तरह सोशल नेटवर्किंग साइटों ने भी आम जनमानस को प्रभावित किया है, वर्तमान में तो युवाओं के दिनभर का लेखा – जोखा भी इन साइटों पर उपलब्ध रहता है। साथ ही इन सोशल नेटवर्किग साइटों ने मनुष्यों के भावात्मक गुणों को भी आत्मसात कर लिया है। आज के युवा तो इन सोशल नेटवर्किग साइटों को ही आधुनिकता की पहचान और उसका प्रतीक मानते हैं। कई सुविधाओं और सामाजिक संबंधों को विस्तार देने के साथ ही इन नेटवर्किंग साइटों ने कई शारीरिक और सामाजिक समस्याओं को भी जन्म दिया है। ऐसे में नवमाध्यम के नवीन सकारात्मक पहलुओं के साथ- साथ इनके द्वारा उत्पन्न समस्याओं पर अध्ययन आवश्यक हो जाता है। प्रस्तुत शोध पत्र में इन सोशल नेटवर्किग साइटों के युवाओं पर पडऩे वाले मनोवैज्ञानिक प्रभावों का अध्ययन एवं विश्लेषण किया गया है।

परिचय

इंटरनेट आने के बाद जब सोशल नेटवर्किग की शुरूआत हुई तो हमारे समाज एंव संचार वैज्ञानिकों ने इसे समूह विशेष का विषय माना था, लेकिन इसके वर्तमान स्वरूप को देखा जाए और उपयोगकर्ताओं की संख्या पर नजर डाली जाए तो स्थिति को आसानी से समझा जा सकता है। समूह विशेष का माध्यम माना जाने वाला सोशल मीडिया आज जनसंचार माध्यमों का एक बड़ा विस्तार साबित हुआ है। सोशल मीडिया ने दुनिया में एक अलग और नई किस्म के समाज की रचना की है, जो वास्तविक कम आभासी ज्यादा है। यही सोशल मीडिया कभी जीवटता और जीवंतता से  लबरेज नजर आता है, तो कभी इसमें वास्तविकता की परछाई रंच मात्र भी नहीं होती है। भारत जैसे उत्सवधर्मी देश में मेले, समारोह, त्यौहार व रिश्ते- नाते में रचा – बसा युवा सोशल मीडिया के माध्यम से आज दुनिया में अपनी छाप छोडऩा चाहता है। भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं पर किए गए एक शोध अध्ययन के मुताबिक भारतीय प्रयोक्ता एक चौथाई समय सोशल नेटवर्किग साइटों पर बिताता है। आज फेसबुक, ट्विटर, ऑर्कुट, लिंक्डइन जैसे सोशल नेटवर्किंग साइटों ने जनसपंर्क के दायरे को असीमित कर दिया है।

वहीं इन साइटों का इस्तेमाल करने वालों  की संख्या दिन – प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। उसकी  वज़ह यह है कि अब फेसबुक और ट्विटर जैसी लोकप्रिय साइटों पर लोग अपनी भाषा और अपनी लिपि में लिख सकते हैं। यह एक ऐसा मंच है, जहां आम नागरिकों को अपनी बात सब तक पहुंचाने की छूट है। वर्तमान में विश्व की जनसंख्या तकरीबन सात अरब है, जिनमें से सवा अरब लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। वहीं 82 प्रतिशत लोग सोशल नेटवर्किंग साइटों के माध्यम से आपस में जुड़े हुए हैं। फेसबुक 95 करोड़ एकांउट धारकों के साथ सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट है और यदि फेसबुक को एक देश मान लिया जाए तो यह आभासी देश दुनिया का तीसरी सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश होगा।

इंटरनेट मोबाइल एसोसिएशन के अनुसार गत वर्ष इंटरनेट प्रयोक्ताओं में 16 फीसदी की दर से वृद्धि दर्ज की गई। वहीं ग्लोबल आनलाइन पॉपुलेशन फोरकास्ट सर्वे के अनुसार वर्ष 2013 के अंत तक विश्व में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 2 अरब 20 करोड़ तक पहुंच जाएगी और भारत, चीन और अमेरिका के बाद विश्व का तीसरा सबसे अधिक इंटरनेट प्रयोगताओं वाला देश बन जाएगा। कॉम स्कोर द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार  जून 2012 में गूगल वेबसाइट की पहुंच सबसे अधिक रही और 15 साल की उम्र से ज्यादा के कुल 95 फीसदी इंटरनेट उपभोक्ता गूगल पर आए। गूगल की साइट पर 15 साल की उम्र से ज्यादा के पांच करोड़ सत्तर लाख लोग पहुंचे। वहीं फेसबुक का नंबर दूसरा रहा, जहां पांच करोड़ नौ लाख लोगों ने उपस्थिति दर्ज की और याहू की वेबसाइट तीसरे नंबर पर रही, औसतन भारतीय इंटरनेट उपभोक्ता फेसबुक पर चार घंटे और गूगल पर दो से तीन घंटे बिताते हैं। अमेरिका स्थित प्रतिष्ठित व्यू रिसर्च सेंटर द्वारा वर्ष 2011 किए गए शोध के अनुसार  लगभग 65 प्रतिशत वयस्क उपयोगकर्ता इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइटों पर सक्रिय रहते हैं। वर्ष 2008 में यह आंकड़ा महज 29 फीसदी था और 2005 में तो केवल 8 प्रतिशत व्यस्क लोग ही इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों का उपयोग करते थे। केवल कुछ ही वर्षों में यह आंकड़ा तेजी से बढ़ा है। यही कारण है कि आज वेबसाइटों का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में हो रहा है। अपनी इन विशेषताओं के कारण ही इस आभासी दुनिया ने वास्तविक दुनिया में अपनी महत्वपूर्ण जगह बना ली है। साथ ही यह जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन गया है। व्यक्तिगत एवम् सामाजिक जीवन में इसकी अधिकाधिक हिस्सेदारी और सेंधमारी के कारण न सिर्फ मीडिया के जानकार बल्कि मानव विज्ञानी भी इसके दुर्गुणों से आमजन को अवगत करा रहे हैं।

भारत में टाइम इंटरनेट लिमिटेड, नेटवर्किंग 18, रेडिफ इण्डिया और भारत सरकार की वेबसाइट एनआईसी डॉट इन शीर्ष दस में रहीं। ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया सिर्फ समय व्यतीत करने का साधन मात्र है। इस पर कई सकारात्मक प्रयोग हाल ही में हुए हैं। जिनमें अन्ना आंदोलन प्रमुख है, जिसे सोशल मीडिया ने बड़ी सफलता से प्रचारित प्रसारित किया है। ममता बनर्जी से लेकर कई राजनेता भी सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा लगाकर इससे जुड़ चुके हैं। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं, जहां सोशल मीडिया ने मुख्य धारा के मीडिया से भी बेहतर काम किया है। मिस्त्र के तहरीर चौक, गद्दाफी का तख्तापलट और ट्यूनीशिया के जैस्मीन रेवोल्यूशन में सोशल मीडिया ने सार्थक और सकारात्मक भूमिका निभाई है लेकिन हाल ही में सोशल मीडिया से अंजाम दिए गए कार्यों ने इसकी साख पर बट्टा लगा दिया है, जिनमे बंगलुरु से पूर्वोतर के लोगों का वापस लौटना और असम, मेरठ में हुए दंगे शामिल हैं।

सोशल मीडिया और जन माध्यमों को नया आयाम देने वाला नया मीडिया आज के आधुनिक जीवन में इतना घुल -मिल गया है कि इसके प्रभावों से बचना कठिन है। आज सोशल नेटवर्किंग साइटों का इस्तेमाल युवाओं की आदतों का हिस्सा है। वहीं आयुर्विज्ञान के विशेषज्ञों ने भी इनके द्वारा होने वाले स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों को अपने शोध का हिस्सा बनाया है। मानव स्वास्थ्य के जानकारों के अनुसार इंटरनेट और इन साइटों के अधिक उपयोग के कारण  हृदय एवम् अस्थमा के मरीजों की संख्या  में इजाफा हो रहा है क्योंकि वे अब साधन की जगह आदत का हिस्सा बन रहे हैं।

सोशल मीडिया की दुनिया आभासी है। जिसमें वास्तविकता के होने का आभास मात्र होता है। इस आभासी दुनिया में अधिकाधिक सक्रियता के कारण वास्तविक जीवन की सक्रियता का ह्रास होता जाता है। हम दुनिया भर से तो संपर्क में होते हैं लेकिन हमारे पड़ोस में क्या हो रहा है उससे अनजान रह जाते हैं। आभासी दुनिया की सक्रियता खुद की निजता भंग करने के साथ हमें वास्तविक दुनिया में निष्क्रिय बना देती है। आज बड़ी संख्या में लोग सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं। इसके जरिए वे  एक दूसरे के संपर्क में आते हैं, एक दूसरे से संबंध  जोड़ते हैं, प्यार करते हैं, फिर विवाह और अंतत: बात ऑनलाइन तलाक तक पहुंच जाती है। आज के समय में बिना मोबाइल फोन, लैपटॉप और इंटरनेट के समय व्यतीत करना कठिन हो गया है। वहीं कई लोग सोशल मीडिया के नकारात्मक अनुभवों को  भी साझा कर रहे हैं। उनके अनुसार सोशल साइटों पर होने वाले संवाद पर अत्यधिक निर्भरता खतरनाक साबित हो सकती  है। यह समय बर्बाद करने वाले माध्यम से ज्यादा और कुछ भी नहीं है।

एक शोध अध्ययन के मुताबिक सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक बच्चों और युवाओं को चिड़चिड़ा बना रहा है, वहीं इसके उपयोगकर्ताओं की आदतों में फेसबुक कुछ इस तरह से शुमार हो चुका है कि वे नित्य क्रिया व भोजन करते हुए भी इसका उपयोग करते हैं। पंजाब विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग द्वारा एक अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ है कि युवाओं पर शारीरिक और सामाजिक तौर पर फेसबुक का बुरा प्रभाव पड़ रहा है। इंटरनेट पर अधिक सक्रियता के कारण ही युवाओं की शारीरिक सक्रियता भी कम हो गई है। अनैतिक एवं अमर्यादित टिप्पणियां करने, अश्लील चित्र और अन्य जानकारियां साझा करने के लिए अनेक उपयोगकर्ता गलत और झूठे परिचय व खाते का सहारा लेते हैं। उपयोगकर्ताओं के आभासी जीवन में वास्तविक जीवन से काफी ज्यादा मित्र होते हैं, परिणामत: पड़ोसी, मित्र और रिश्तेदारों से मिलने जुलने का वक्त सिमट जाता है। ये कहना गलत नहीं होगा कि सोशल मीडिया एक नए किस्म के सामाजिक संसार की रचना कर रहा है।

बोविल और लिविंग स्टोन (2001) ने अपने एक अध्ययन  में   सोशल साइटों के उपयोग को बेडरूम कल्चर का नाम दिया है। उन्होंने अपने शोध में पाया कि जिस तरह दूरदर्शन के आने से पूरा परिवार उसके बहाने इकट्ठा हो जाता था, वहीं नई टेक्नोलॉजी के आने से परिवार के सदस्य अलग- अलग कमरों में बंट गए हैं। इसका प्रभाव बच्चों की परवरिश पर भी पड़ता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार सोशल साइटें अकेलापन, तनाव, चिंता सहित कई अन्य तरह की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकती हैं। यह रिपोर्ट अपने आप में बताने के लिए काफी है कि हम ग्लोबल विलेज की तरह दुनिया से जुडऩे के भ्रम में जी रहे हैं। जबकि हमारी दुनिया ही बहुत छोटी हो गई है।

अध्ययन का उद्देश्य

इस बात का पता लगाना कि क्या

  1. सोशल नेटवर्किंग साइटें युवाओं की अति आवश्यक जरूरतों का हिस्सा हैं।
  2. इन साइटों से युवाओं की दिनचर्या व निजता प्रभावित होती है।
  3. यह साइटें युवाओं के लिए दिमागी टॉनिक का काम करती हैं।
  4. यह साइटें युवाओं को अभिव्यक्ति का एक मंच प्रदान करने के साथ- साथ उनके ज्ञान में अभिवृद्धि करती हैं।
  5. इन साइटों के इस्तेमाल के प्रभाव से युवा वास्तविक जीवन से दूर हो गए हैं।

विशिष्ट उद्देश्य

क्या सामाजिक जनमाध्यम (सोशल नेटवर्किंग साइटें) अपने उपयोगकर्ताओं के  सामाजिक संबंधों और उनके स्वास्थ्य को प्रभावित करता है ?

शोध का क्षेत्र : भोपाल शहर (मध्यप्रदेश)

भोपाल, देश के ह्दय प्रदेश के नाम से प्रसिद्ध मध्यप्रदेश राज्य  की राजधानी है। कभी ताल-तलैया और नवाबों के शहर के नाम से प्रसिद्ध भोपाल आज देश के प्रमुख शहरों में से एक है। वर्तमान में भोपाल प्रदेश के एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा केन्द्र के रुप में स्थापित हो चुका है। यहां पर पांच राज्य विश्वविद्यालय सहित तकरीबन 84 इंजीनियरिंग महाविद्यालय, अन्य महाविद्यालय तथा कई अन्य महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान हैं। जिनमें मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान,अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान, राष्ट्रीय फैशन तकनीकी संस्थान और भारतीय वन प्रबंधन संस्थान  जैसे प्रतिष्ठान शामिल है। शहर में कई महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान होने के कारण यहां देश-प्रदेश से छात्र  शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते हैं। वहीं शहर की आधे से अधिक जनसंख्या युवाओं की है, ऐसे में शहर के बाहर से आने वाले छात्र भोपाल को और  अधिक युवामय बनाते हैं। आज का युवा तकनीक प्रिय है, लिहाजा  सूचनाओं की प्राप्ति, मनोरंजन और आपसी संवाद के लिए वे सोशल नेटवर्किंग साइटों का इस्तेमाल करते हैं। इन सोशल साइटों के इस्तेमाल के लिए इंटरनेट का होना आवश्यक है, अतएव इसके लिए वे  या तो इंटरनेट की सुविधा वाले मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं या फिर इंटरनेट कैफे का रुख करते हैं। अधिकांश युवा इन सोशल नेटवर्किंग साइटों के आदी हो गए हैं। उनका अधिकांश समय या तो मोबाइल पर या फिर सायबर कैफे में बीतता है। उपरोक्त वर्णित तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत शोध पत्र के शोध संबंधी आंकड़ों के एकत्रीकरण  के लिए भोपाल  उपयुक्त शहर है।

शोध विधि 

कई सुविधाओं और सामाजिक संबंधों को विस्तार देने के साथ ही इन साइटों ने कई शारीरिक और सामाजिक समस्याओं को भी जन्म दिया है। ऐसे में इस माध्यम के नवीन सकारात्मक पहलुओं के साथ इनके द्वारा उत्पन्न समस्याओं पर अध्ययन आवश्यक हो जाता है। इस शोध अध्ययन की जांच के लिए प्राथमिक और द्वितीयक दोनों तरह के  आंकड़ों को आधार बनाया गया है। प्राथमिक आंकड़ों के एकत्रीकरण के लिए सर्वेक्षण शोध विधि के अन्तर्गत प्रश्नावली शोध यंत्र का इस्तेमाल किया गया है। शोध संबंधी प्राथमिक आंकड़ों का चयन उद्देश्यानुसार न्यादर्शन पद्धति (Purposive Sampling) का  इस्तेमाल  करके किया गया है।

न्यादर्श का चुनाव

इस शोध कार्य में मुख्यत: प्राथमित स्त्रोतों पर आधारित तथ्यों का इस्तेमाल किया गया है। वहीं शीर्षक से संबंधित पूर्व में किए गए शोध परिणामों का उपयोग मेटा विश्लेषण के तौर पर किया गया है। शोध संबंधित आंकड़े भोपाल शहर के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित साइबर कैफे में आए हुए युवाओं से एकत्रित किए गए हैं। शोध में संकलित न्यादर्श  की इकाइयों की संख्या 100 है। इन युवाओं का चयन उद्देश्यानुसार न्यादर्शन पद्धति  (Purposive Sampling) का इस्तेमाल करके किया गया  है। हमने उन्हीं युवाओं का बतौर समंक चयन किया है जो कि इंटरनेट व सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना जानते हैं।

तथ्यों का संकलन एवम् विश्लेषण

फेयर चाइल्ड ने तथ्यों के संबंध में कहा है कि ‘‘कोई प्रदर्शित करने या प्रकाशित करने योग्य, वास्तविकता का मद, पद या विषय ही तथ्य है।’’ इसका संबंध एक वास्तविक घटना से होता है। इसमें शोधकर्ता का ज्ञान एवं अनुभव विस्तृत होता है। तथ्यों का बोध अनुभव के द्वारा ही होता है।

शोध पत्र के शीर्षक के अनुरूप युवाओं के सोशल नेटवर्किंग साइटों के अनुभवों व सोशल मीडिया के प्रति युवाओं के नजरिए को जानने के लिए 12 प्रश्नों की एक प्रश्नावली तैयार की गई। और यही प्रश्नावली जब शहर के विभिन्न  इंटरनेट कैफे में आए युवकों से भरवाई गई तो इनसे प्राप्त आंकड़े कुछ तो आशा के अनुकूल रहे जबकि वहीं कुछ प्राप्त आंकड़े चौंकाने वाले रहे।

  1. पहले प्रश्न, आप सोशल नेटकर्विंग साइट पर कितना समय बिताते हैं, के उत्तर में 75 फीसदी युवाओं ने माना कि वे इन साइटों में एक से दो घंटा बिताते हैं, वहीं 15 फीसदी ने स्वीकार किया कि वे 2 से 3 घंटे इन साइटों का इस्तेमाल करते हैं, शेष 10 फीसदी ने माना कि वे इन साइटों को उपयोग 3 घंटे से अधिक समय के लिए करते हैं। यानि की युवाओं की दिनचर्या का लगभग एक हिस्सा इन सोशल नेटवर्किग साइटस में बीतता है। उपरोक्त वर्णित तथ्य ये प्रमाणित करते हैं कि सोशल नेटवर्किंग साइटस इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले युवाओं की जरुरतों का अहम हिस्सा है।
  2. दूसरे प्रश्न क्या आप सोशल नेटवर्किंग साइटों में अपनी दिनचर्या की बातों का जिक्र करते हैं के उत्तर में 89 फीसदी युवाओं ने हां में जवाब दिया। जबकि शेष 11 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे अपने जीवन की  दैनिक गतिविधियों को सोशल नेटवर्किंग साइटों पर साझा नहीं करते हैं।  यानि कि लगभग सभी इंटरनेट यूजर्स जिनके  सोशल नेटवर्किंग साइटों पर खाते हैं वे सभी अपने जीवन की निजी बातों को इन साइटों पर  साझा करते हैं। परिणाम स्वरूप ये सभी सामाजिक जनमाध्यम की विषयवस्तु का निर्माण भी करते हैं साथ ही उपभोग भी।
  3. ये जानने पर कि क्या आप मानते हैं कि इन सोशल नेटवर्किंग साइटों के चलते आपकी दिनचर्या प्रभावित होती है तो 86 फीसदी युवाओं ने माना कि ये सच है कि इन साइटों को समय देने के कारण उनकी दिनचर्या प्रभावित होती है जबकि शेष 14 फीसदी ने नहीं में उत्तर दिया।
  4. वहीं चौथे प्रश्न के जवाब में 82 फीसदी युवाओं ने माना कि वे इन सोशल साइटों की विषयवस्तु से प्रभावित होते हैं। उत्तरदाताओं के प्रतिशत के अनुसार  लगभग सभी उपयोगकर्ता इनकी विषयवस्तु से प्रभावित होते हैं। नवमाध्यम अन्य जनमाध्यमों की तुलना में ज्यादा अन्त: क्रियात्मक है। वहीं इसकी विषयवस्तु के निर्माण, संपादन तथा उपभोग का दायित्व इसके उपयोगकर्ताओं पर है। परिणामत: इसकी अधिक प्रभावशीलता के कारण ही इसके उपयोगकर्ता इसकी विषयवस्तु से ज्यादा प्रभावित होते हैं।
  5. पांचवे प्रश्न के उत्तर में 74 फीसदी युवाओं ने माना कि सोशल नेटवर्किंग साइटें समाज में पहचान स्थापित करने का विशेष उपकरण हैं। जबकि शेष 26 फीसदी युवाओं ने इसे नकार दिया। बहुसंख्यक उत्तरदाताओं की सोच में न्यू मीडिया उनकी पहचान बनाने में मददगार साबित होते हैं। यही कारण है कि वे नियमित तौर पर न्यू मीडिया की  विषयवस्तु का हिस्सा बनते हैं।
  6. सोशल नेटवर्किंग साइटें ज्ञान में अभिवृद्धि करने के साथ ही क्या जागरुक भी करती हैं ? के संबंध में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 94 प्रतिशत युवा मानते हैं कि सोशल नेटवर्किंग साइटें उनके ज्ञान में अभिवृद्धि करने के साथ ही  उन्हें जागरुक भी बनाती हैं।
  7. सातवें प्रश्न के उत्तर में क्या आप इन साइटों के माध्यम से देश के समकालीन मुद्दों पर राय रखते हैं ? 86 फीसदी युवाओं ने माना कि वे इन सोशल नेटवर्किंग साइटों के माध्यम से देश के तत्कालीन मुद्दों पर अपनी राय प्रकट करते हैं जबकि शेष 14 फीसदी युवा इन क्रियाकलापों में खुद को शामिल नहीं पाते। यानि कि न्यू मीडिया युवाओं की रायशुमारी में मद्द करता है। साथ ही मुद्दे विशेष पर युवाओं को जानकारी  भी उपलब्ध कराता है।
  8. आठवें प्रश्न के जवाब में 83 फीसदी युवाओं ने सोशल नेटवर्किंग साइटों को अपनी अतिआवश्यक जरूरतों में से एक माना जबकि शेष ने नहीं। मतलब सोशल नेटवर्किंग साइटों का उपयोग उनकी आदतों का हिस्सा है वहीं उपयोग न कर पाने की स्थिति में उपभोक्ताओं के स्वभाव में  परिवर्तन के साथ ही उन्हें मानसिक तौर पर बेचैन तथा चिढ़चिड़ा बनाता है।
  9. नवें प्रश्न में भी 72 फीसदी युवाओं ने माना कि इन साइटों के अधिकाधिक उपयोग से व्यक्ति एकाकी और आभासी जीवन जीने का आदी हो जाता है, जबकि शेष उत्तरदाता इस बात को नकारते हैं। प्राप्त आंकड़ें इस बात की सत्यता के स्पष्ट प्रमाण हैं कि इन साइटों के अधिकाधिक इस्तेमाल के कारण युवा वास्तविक जीवन से दूर हो गए हैं। वे वास्तविकता से इतर तकनीकी संजालों में ज्यादा समय व्यतीत कर रहे हैं। परिणामत: वास्तविकता से उनकी नजदीकियां निरंतर कम होती जा रही हैं।
  10. दसवें प्रश्न में क्या सोशल नेटवर्किंग साइटों के अधिकाधिक उपयोग से मानव स्वास्थ प्रभावित होता है ? के उत्तर में 69 फीसदी युवाओं ने माना कि इन साइटों पर ज्यादा समय देने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। जिनमें अनिद्रा, शारीरिक दर्द (पीठ का दर्द, गर्दन का दर्द) चिढ़चिड़ापन, बेचैनी व लगातार ज्यादा समय देने से दिनचर्या के अनियमित होने के कारण पाचन संबधी दिक्कतों के साथ ही अवसाद की स्थिति भी बन सकती है। ये आयुर्विज्ञान के शोधकार्यों से प्रमाणित हो चुका है।
  11. ग्यारहवें प्रश्न, क्या सोशल नेटवर्किंग साइटें हमारी निजता को प्रभावित करती हैं ? के उत्तर में 86 फीसदी ने हां में उत्तर दिया। वहीं शेष 14 फीसदी युवाओं ने नहीं में उत्तर दिया। प्राप्त आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि सोशल नेटवर्किंग साइटें उपयोगकर्ताओं की निजता को प्रभावित करती हैं। क्योंकि इसकी विषयवस्तु के निर्माण, संपादन तथा उपभोग का दायित्व स्वंय इसके उपयोगकर्ताओं पर है, ऐसे में उपयोगकर्ताओं की निजता प्रभावित होना स्वाभाविक है।
  12. वहीं अन्तिम प्रश्न, क्या इन सोशल नेटवर्किंग साइटों के उपयोग से आप मानसिक राहत महसूस करते हैं ? इसके उत्तर में 55 फीसदी ने हां में उत्तर दिया और शेष 45 फीसदी ने नहीं में। यानि कि सोशल साइटें युवाओं को मानसिक संतुष्टि तो देती हैं लेकिन क्षणिक मात्र। कुल मिलाकर सोशल नेटवर्किंग साइटें युवाओं के लिए दिमागी टॉनिक का काम करती हैं।

निष्कर्ष-

सोशल नेटवर्किंग साइटों के रूप में नए युग का सूत्रपात हो चुका है। सभी प्रकार के दोषों के बाद भी सोशल नेटवर्किंग साइटों का सकारात्मक उपयोग किया जा रहा है। इन साइटों के कारण ही  पत्रकारिता  जनपत्रकारिता का और संवाद जनसंवाद का रूप ले रहा है। सही मायनों  में जनता के द्वारा जनता के लिए जनता की पत्रकारिता की जा रही है। जितनी अंत:क्रियात्मकता परम्परागत माध्यम में सम्भव थी, उतनी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कभी संभव नहीं  हो पाई और ना ही हो पाने की संभावना दीख पड़ती है।  वहीं सोशल नेटवर्किंग साइटों ने संचार और संवाद में जनभागीदारी की अनन्त सम्भावनाएं पैदा की हैं।  ऐसे में इस सम्भावना को तकनीकी और सही नीयत के आधार पर अवसर में बदला जा सकता है। वर्तमान में सोशल नेटवर्किंग साइटों का सकारात्मक उपयोग करने की जरूरत है। इसकी विषयवस्तु के निर्माण, संपादन तथा उपभोग का दायित्व स्वयं इसके उपयोगकर्ताओं पर है, ऐसे में उपयोगकर्ताओं की निजता प्रभावित होना स्वाभाविक है।

शोध सम्बंधी आंकड़े बताते हैं कि इन साइटों के उपयोग के दौरान प्रयोक्ता, हमारे युवा खुद को एक छोटी शख़्सियत मानने लगते हैं। ऐसे में उनके द्वारा लिखे गए कथन पर लाइक मिलना, नहीं मिलना  उन्हें भावनात्मक रूप से प्रभावित करता है। सोशल साइटें युवाओं को मानसिक संतुष्टि तो देती हैं लेकिन क्षणिक मात्र। कुल मिलाकर सोशल नेटवर्किंग साइटें अल्प समय के लिए ही सही लेकिन युवाओं के लिए दिमागी टॉनिक का काम करती हैं। यह साइटें सामाजिक रूप से प्रभावित करने के साथ ही स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी उत्पन्न कर रहीं हैं। इन साइटों के अधिकाधिक इस्तेमाल के कारण युवा वास्तविक जीवन से दूर हो गए हैं। वे वास्तविकता से इतर तकनीकी संजालों में ज्यादा समय व्यतीत कर रहे हैं। परिणामत: लोगों में एकाकीपन का हावी होना स्वाभाविक रुप से देखा जा रहा है। ऐसा होने से परिवारों पर भी संकट खड़ा हो गया है। अत: उपरोक्त परिस्थितियों से बचने के लिए यह जरूरी हो गया है  कि हम वास्तविकता पर आभासीपन को भारी न होने दें बल्कि इस माध्यम की विश्वसनीयता एवम् अन्त: क्रियात्मकता को बनाए रखने के साथ ही आभासी रहते हुए भी वास्तविकता के सहचरी बनें।

संदर्भ  :-

  • दयाल,डॉ.मनोज,मीडिया शोध, हिसार, हरियाणा ग्रन्थ अकादमी।
  • कुमार, विजय. ‘कहां पहुंचा रहे हैं अतरंगता के नए पुल’ : नवनीत हिंदी डायजेस्ट (मुम्बई), पृष्ठ-18
  • द्विवेदी, संजय. (2012 ) ‘सोशल मीडिया के सामाजिक प्रभाव’ : पंचनद रिसर्च जर्नल, अंक सं 19
  • भाटिया, चेतना.(2012) ‘सामाजिकता के आईने में सोशल मीडिया’ : पंचनद रिसर्च जर्नल, अंक सं 19
  • मानस,जयप्रकाश. (2012) ‘नागरिक पत्रकारिता का प्रात:काल’ : मीडिया विमर्श, वर्ष 6, अंक सं 24

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