कार्टून : स्वतंत्रता या भावनाओं के साथ खेल?

प्रो. (डॉ.) दीपक शिंदे*

प्रस्तावना :

वैसे भारतीय संदर्भ में, कार्टून ने ब्रिटिश के साथ भारत में प्रवेश किया है, कार्टून के प्रभाव व लोकप्रियता के कारण पिछले कुछ वर्षों से यह भारत में बेहद लोकप्रिय है ! शंकर पिल्लई को भारतीय कार्टूनिंग का पिता माना जा सकता है। समाचार पत्र सिर्फ गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए इस हास्य के हथियार का उपयोग करते है ऐसा नही है , कइ बार सामाजिक प्रश्न, खुशी के प्रसंग, या दुखीत क्षण कार्टून के माध्यम से समाज के सामने लाये जाते है! कार्टून एक शक्तिशाली संचार उपकरण के रूप में उभरने के लिए सभी मीडिया जीमेदार है जिसमे अखबार, प्रिंट मीडिया। ऑडियो विजुअल मीडिया, इंटरनेट, फिल्म, मल्टी मीडिया, विज्ञापन, होर्डिंग इनका नाम लिया जा सकता है! सार्वजनिक संदेशों के लिए व अधिकतम लाभ के लिए यह सभी माध्यम कार्टून का उपयोग लेते है। कार्टून के तरफ ध्यान आकर्षित करने के लिए एक उल्लेखनीय उल्लेख आर.के.लक्ष्मण का है! उनकी उपलब्धि के लिए 1984 में उन्हे रोमन मैग्सेसे पुरस्कार दिया गया! लक्ष्मण ने कार्टून्स को हर घर मे पहुचा दिया ! लेकीन फ्रांस के शार्ली हेब्दों पर हुवा हमला पुरे दुनिया मे एक प्रश्न निर्माण कर रहा है की, कया यह कला भावनाओं के साथ खेल रही है ? इस शोध निबंध में इसी का अध्ययन किया गया है !

 (* डायरेक्टर, स्कूल ऑफ मीडिया, स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाडा यूनिवर्सिटी, नांदेड.)

विषय प्रवेश :

फ्रांस के शार्ली हेब्दों पर हुवा हमला पूरी दुनिया मे एक प्रश्न निर्माण कर रहा है की, क्या कार्टून यह कला मानव के भावनाओं के साथ खेल रही है ? अगर ऐसा है तो, यह कला किस काम की है, ? पत्रकारिता के रक्षक इसे पत्रकारिता पर हमला कहेंगे, किसी भी हमले को माना नही जाएगा लेकिन ऐसे क्यों हुवा इस प्रश्न का शोध कर इसका जवाब लेना जरूरी है !

ये सच है कि कलाकार स्वतंत्रता की ज़मीन पर ही काम करता है। उसके विचारों कि स्वतंत्रता ही उसकी वो जादुई तुलिका होती है, जिसके माध्यम से वो अनेकानेक रचनाओं में रंग भरता है। कलाकार स्वतंत्र नहीं होगा तो किसी भी नयी रचना की सम्भावना भी नहीं रहेगी। विचारों कि जितनी स्वतंत्रता होती है, कल्पना की उड़ान भी उतनी ही ऊंची होती जाती है।

फिर भी, हमारी स्वतंत्रता बस वहीं तक सीमित है जहाँ तक ये किसी और की स्वतंत्रता में हस्तछेप न करे। दुनिया में कितने ही ऐसे शीर्षस्थ कलाकार हुए हैं जिनकी कल्पना की उड़ान की प्रशंसा करते हुए हम वाह-वाह करते नहीं थकते। उनकी कृतियाँ हमें हमेशा प्रेरणा देती हैं। कुछ ऐसा रचने के लिए जो सार्वभौमिक हो, सर्वग्राह्य हो और सर्वमान्य भी।

चूंकि एक कार्टूनिस्ट के साथ हास्य, व्यंग्य और कटाक्ष के रंग हमेशा साथ चलते हैं, इसलिए विवादस्पद स्थितियां उत्पन्न होने की संभावनाएं भी अक्सर होती हैं। ये सच है कि कलाकार जानबूझकर किसी कि भावनाओं को आहत करने का जोखिम कभी नहीं उठाना चाहता लेकिन जाने-अनजाने, रचनाओं में रंग भरते-भरते कल्पनाओं के असीम सागर में वो इतन डूब जाता है कि वो उस सीमा रेखा को भी लांघ जाता है जो किसी कि भावनाओं को ठेस पंहुचा सकती हैं!

वस्तुत: कलाकार के बारे मे जब हम बात करते हैं तो हम कोमल और संवेदनशील मन की बात कर रहे होते हैं, जिसका उद्देश्य अपनी कला के माध्यम से बात को जनमानस के समक्ष प्रस्तुत करना होता है। कलाकार मात्र अपनी कल्पना को अपने ढंग से प्रस्तुत करता है। किसी कि भावनाओं को आहत करने का उद्देश्य लेकर वो कोई कृति नहीं बनाता. ऐसे कलाकार की कलाकृति लोग देखते नही, कलाकार ने यह सोचना चाहिये की उसने जनमानस कि प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप उसने किसकी भावनाओं को कितना सुकून दिया या कितना आहत किया। फिल्मों के कितने ही दृश्य सेंसर बोर्ड को उसके निर्गत होने से पहले अमान्य करने पड़ते हैं. इसके बावजूद उनमे ऐसा कुछ सम्पादित करने के लिए फिर भी रह जाता है जिसे दर्शकों की नापसंदगी और भत्र्सना का सामना करना पड़ता है ! कई बार अनुभवी लोगों का पूरा निर्णायक मंडल या कलाकार को भी ये बात नहीं समझ पाती कि कौन सी बात किन धर्मावलम्बियों या किन लोगों को को कितनी बुरी लगेगी! शार्ली हेब्दों कार्टून के मामले में भी हम यही कह सकते हैं कि यह अभिव्यक्ति कि ऐसी स्वतंत्रता है जिसने जाने-अनजाने किसी और कि भावनाओं और उसकी स्वतंत्रता का ध्यान नहीं रखा. इसलिए रचनाकारों के लिए ये अति आवश्यक है कि वो अपनी पूरी शक्ति और संपूर्ण सामर्थ्य ऐसी रचनाओं के निर्माण पर प्रयोग करें जो सार्वभौमिक हों तथा जिनमें किसी व्यक्ति विशेष या जाति-धर्म पर कोई टीका-टिप्पन्नी न हो! टीका-टिप्पन्नी होने पर लोग कहते हैं कि, ‘‘हमारी आज़ादी वहीं पर खत्म होती है जहां पर दूसरे की नाक शुरु होती है’’ आज की इस परिस्थिति में कलाकार को यह ध्यान रखना चाहिये की, मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं हो सकती। किसी भी चित्र में ऐसे नहीं दिखाना चाहिए। ‘‘अभिव्यक्ति का मतलब ये नहीं कि किसी भी धर्म या किसी व्यक्ति के बारे में कुछ भी विचार प्रस्तुत किये जाये!’’ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ -साथ कुछ दायित्व भी होते हैं। लोगों को दूसरों की भावना का सम्मान करना सीखना चाहए। अपनी अभिव्यक्ति को लोग धार्मिक मामलो से ही क्यों उजागर करते हैं? क्या हक है कि लोग दूसरे की आस्था को ठेस पहुंचाए! शार्ली हेब्दों के पूर्व भी ऐसे प्रयास हुए है जिस के कारण तनाव बढ गया! सोशल नेटवर्किंग के माध्यम से ऐसे प्रयास होते हैं लेकिन बाद मे उन लोगों पर कारवाई होती है, लेकिन संचार माध्यम मे प्रसारित कार्टून के कारण कोई कारवाई होने का प्रमाण उपलब्ध नहीं हुवा!

अनुसंधान की विधियां : इस विषय को मुलाखत तथा चर्चा के माध्यम से अनुसंधान किया गया है ! ऐसा करने के लिए कुछ प्रश्न रखे गये जिसे गृहीतक्रत्य कहा जा सकता है, जिसमें –

  1. भावनाओं को ठेस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है
  2. अभिव्यक्ति स्वतंत्रता पर चर्चा होने की जरूरत है
  3. संचार और सूचना के क्षेत्र में कार्टून एक क्रांति है
  4. कार्टून एक कला है

यह अनुसंधान बांधे गये हैं! इसका अध्ययन करने के लिए कार्टून का समाज जीवन पर होने वाला प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम भी जांचा गया है। कम उम्र के साथ ज्यादा लगाव रखने वाला कार्टून दुनिया का सबसे प्रभावी माध्यम है।

आज यह कहा जाता है कि मानव सभ्यता सूचना युग में प्रवेश कर रही है। पिछले 50 वर्षों में संचार और सूचना के क्षेत्र में एक क्रांति आई है। आज दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली किसी घटना की जानकारी हमे चंद पलों में मिल जाती है। हमारे जीवन में समाचार माध्यमों का महत्व बहुत बढ़ गया है। देश-दुनिया में जो कुछ हो रहा है उसकी अधिकांश जानकारियां हमें समाचार माध्यमों से मिलती हैं। यह भी कह सकते हैं कि हमारे प्रत्यक्ष अनुभव से बाहर की दुनिया के बारे में हमे अधिकांश जानकारियां माध्यमों द्वारा दिए जाने वाले समाचारों से ही मिलती है। जिस तरह समाचार मे यथार्थता (Accuracy), वस्तुपरकता (Objectivity), निष्पक्षता (Impartiality), संतुलन (Balance), स्रोत (Attribution-Sourcing) होना चाहिये उसी तरह कार्टून मे भी होनी चाहिये तभी कार्टून मन को भा जाते हैं! कार्टून समाज के व्यंग्य को प्रदर्शित करता है, सामाजिक परिस्थिति के कार्टून्स समाज को रास्ता दिखाने का काम कर सकते है ! राजनीतिक कार्टूनिंग ,आसपास की स्थितियों से प्रेरित होती है! किसी भी कार्टून को बनाने के पहले कार्टूनिस्ट को परिदृश्य को समझने की जरूरत है! किसी भी स्थिति पर टिप्पणी करणे से पहले उसे समझ लेना जरूरी है, और कार्टूनिस्ट यह करता है! कार्टून स्केच करते समय यह सोचा नहीं जाता कि जिस व्यक्ति के बारे में कार्टून बनाया जा रहा है उस व्यक्ति को उसके बारे मे क्या लगता होगा! पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का कार्टून निकालते समय उनका नाक दिखाई दिया जाता था। यह व्यंग्य दिखाने की कोशिश थी? इसी प्रकार 2005 में ओसामा बिन लादेन का कार्टून विश्वभर सामने आया! कार्टून एक जबरदस्त संचार माध्यम है तभी कार्टून बनने पर रुचि बिगड़ जाने पर हमले भी होते है!

निष्कर्ष :

संचार माध्यम मे कभी प्रमुख जगह लेने वाला या, पहले पेज पर एक कोने मे रहने वाला यह लोकप्रिय कार्टून आज हजारों लोगोंकी आदत बन गया है। अनुसंधान के बाद यह सामने आया कि, कार्टून बनाते समय किसी भी व्यक्ति के भावनाओं के साथ नही खेलना चाहिये, उसके कारण तनाव या अशांतता निर्माण होणे का खतरा है! सामाजिक विषय लेकर अगर कार्टून है तो समाज के किसी भी व्यक्ति की भावना के आदर के साथ खिलवाड नाही होना चाहिये! अनुसंधान के गृहीतक्रत्य सही निकल आये है! जिसमें – भावनाओं को ठेस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं हो सकती है! अभिव्यक्ति स्वतंत्रता पर चर्चा होने की जरूरत है अभिव्यक्ति का समाज या व्यक्ति की व्यक्तिगत जीवन मे हस्तक्षेप नही हो इसका ध्यान कार्टूनिस्ट को रखना चाहीये! यह सही है की, संचार और सूचना के क्षेत्र में कार्टून एक क्रांति है , एक कार्टून एक हजार से ज्यादा शब्द कह जाता है ! इसी लिए उसका इस्तेमाल सांभालकर करना चाहिये! सकारात्मक सोच रखकर कार्टून का स्केच आणे की जरूरत है! कार्टून एक कला है उसे लोकप्रिय बनाने का काम कलाकार का है जैसे आर के लक्ष्मण ने कॉमन मैन बनाया जो हर घर का चहेता था!

सन्दर्भ :

  1. The Cartoon Controversy and the Possibility of Cosmopolitanism, Thomas Hylland Eriksen University of Oslo
  2. OUT OF LINE: CARTOONS, CARICATURE AND CONTEMPORARY INDIA HARDCOVER – JUL 2014 BY CHRISTEL R. DEVADAWSON
  3. Brushing Up the Years: A Cartoonist’s History of India, 1947 to the Present – 16 Jan 2008 by R K Laxman , Amazon & Penguin India
  4. Cartoon television series “Courage the Cowardly Dog”
  5. The Very Best of the Common Man Paperback – Illustrated, 24 May 2012 Amazon & Penguin India by R.K. Laxman
  6. http://www.filmykeeday.com/classic-cartoon-network-shows-of-90s/
  7. AMUL’S INDIA: 50 YEARS OF AMUL ADVERTISING PAPERBACK – 26 APR 2015 BY DA CUNHA COMMUNICATIONS
  8. THE ART OF CREATIVE THINKING HARDCOVER – 21 APR 2015 BY ROD JUDKINS
  9. DOSE OF LAUGHTER PAPERBACK – 11 SEP 2002 BY R. K. LAXMAN

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