जनमाध्यमों में प्रसारित हॉरर-प्रसारणों की सामाजिक-सांस्कृतिक निर्मितियाँ

दीपक शर्मा*

टेलीविजन पर प्रसारित किसी भी विधा पर चर्चा करने से पूर्व यह बताना बहुत जरूरी है कि टेलीविजन पर प्रसारित कोई भी विधा निरर्थक नहीं होती। हर प्रस्तुति और विधा का अपना एक विशिष्ट महत्व होता है जिसमे एक खास विचारधारा का सदैव प्रवाह रहता है। अगर टेलीविजन पर प्रसारित भूत-प्रेतों, जादू-टोनों एवं अतीन्द्रिय कल्पनाओं से सम्बंधित प्रसारणों का यहाँ विश्लेषण किया जाए तो सर्वप्रथम कहना होगा कि भारतीय टेलीविजन में इसकी शुरुआत, टेलीविजन के जन्म के बहुत बाद में हुई। जिन विकसित देशों में पहले-पहल टेलीविजन आया और जो देश बहुत तार्किक एवं ज्ञानी समझे जाते थे, उन देशों में ही इन भूतिया कार्यक्रमों का सबसे पहले प्रारंभ हुआ था। यहाँ तक कि टेलीविजन से पूर्व में जन्मे क्रांतिकारी माध्यम रेडियो पर ही इन देशों में रहस्य एवं खौफ को केन्द्र में रख कर अनेक भूतिया कार्यक्रमों का प्रसारण किया जा रहा था।

बीसवीं सदी के मध्य में रेडियो पर नेशनल ब्रॉडकास्टिंग कंपनी (NBC) द्वारा ‘Lights Out’ हॉरर शो का प्रसारण 1946 से 1952 तक किया गया, जो बहुत ही लोकप्रिय रहा। हालात यह थे कि रेडियो पर इसके प्रसारण के दौरान इसे अकेले नहीं सुना जाता था। लोग समूह में एकत्रित होकर इस कार्यक्रम को सुनते थे। कहना होगा कि लोगों के भीतर डर और खौफ का प्रचार-प्रसार इस रेडियो हॉरर शो ने बहुत पहले ही कर दिया था। इसके बाद तो लगातार अनेक भूतिया कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाने लगा। इसी क्रम में टेलीविजन माध्यम की चर्चा करें तो सबसे पहले 1959 में ‘The Twilight Zone’ नामक कार्यक्रम प्रसारित किया गया जिसमे पहली बार एलियंस, टाइम जोन का बदलना एवं भयानक कल्पनाओं के संसार को अभिव्यक्ति दी गयी। इसी के साथ 1963 में ‘The Outer Limits’ और 1966 में हृक्चष्ट पर प्रसारित अमेरिकन टेलीविजन का सर्वाधिक प्रचलित और असामान्य विशेषताओं से युक्त कार्यक्रम ‘Dark Shadow’ प्रसारित हुआ जिसका प्रसारण 1971 तक हुआ। इस कार्यक्रम में डर, खौफ, भय से भरपूर कथानक को आधार बनाकर दो सौ साल पुरानी बूढ़ी महिला को ‘वेम्पायर’ केन्द्र में रख कर कथा-निर्माण किया गया जिसने अपनी एक विशाल दर्शक संख्या का निर्माण किया। परिणामस्वरूप भविष्य में टेलीविजन के इस भूतिया स्वरुप को एक सुगम मार्ग मिला। इसी क्रम में ‘Night Gallery’ का नाम भी लिया जा सकता है जिसका प्रसारण भी इसी Dark Shadow के समकालीन था।

एक अन्य हॉरर शो – Tales From The Dark side (1983-1988) की यहाँ पर चर्चा करना जरूरी हो जाता है, जिसका प्रसारण HBO पर रात में किया जाता था। इस कार्यक्रम के बारे में बताना होगा कि इसने न केवल भय और खौफ का प्रसारण किया बल्कि नग्नता का भी भौंडा प्रदर्शन इसके द्वारा किया गया। इस कार्यक्रम को देखते हुए यह महसूस होता था कि इसके निर्माणकर्ताओं का उद्देश्य बस किसी न किसी बहाने से भय के साथ, नग्नता को भी अपने दर्शकों के सम्मुख परोसना था जिससे दर्शकों को अधिकाधिक अपनी तरफ खींचा जा सके। जिसमे यह कार्यक्रम काफी हद तक सफल भी रहा।

इसी कड़ी में एक बड़ा नाम ‘Masters Of Horror’ (2005-2007) का भी जुड़ता है जिसने अपने प्रसारण के साथ ही दर्शक-संख्या के पिछले सारे रेकोर्ड तोड़ डाले। जिसका एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण था इसके निर्माताओं में बड़े-बड़े फिल्म निर्माताओं का शामिल होना। इन बड़े नामों में जॉन कारपेंटर, टॉब हूपर, डेरियो अर्जेंतो इत्यादि का नाम शामिल था। साथ ही 2010 में प्रसारित कार्यक्रम ‘The Walking Dead’ का नाम भी यहाँ लेना ज़रूरी हो जाता है जिसने अपने प्रसारण के प्रारंभ में ही लगभग छह मिलियन दर्शकों को बटोरकर एक नया रिकोर्ड बनाया था।

भारतीय टेलीविजन पर इस हॉरर/भूतिया कार्यक्रमों के प्रसारण परिदृश्य का अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होता है कि दो भूतिया कार्यक्रमों का नाम सबसे पहले लिया जाना चाहिए । ‘ज़ी हॉरर शो’ और ‘आहट’। इन दोनों ही धारावाहिकों को अगर भारतीय हॉरर शो के मार्गदर्शक या प्रवर्तक कहा जाए तो कुछ गलत न होगा। ‘ज़ी हॉरर शो’ का प्रसारण 1993 से 1998 ( लगभग पाँच सालों तक ) तक ज़ी टीवी पर होता था। वहीं ‘आहट’ का प्रसारण फायरवर्क्स प्रोडक्शन एवं वी.पी. सिंह द्वारा पाँच अलग-अलग सीजनों में 1996 से लेकर 2010 तक सोनी टेलीविजन पर होता रहा। इस प्रकार हम ‘आहट’ को भारतीय टेलीविजन का सबसे लंबा चलने वाला हॉरर शो कह सकते हैं। अन्य शब्दों में इसे हम भारतीय टेलीविजन पर विभिन्न खण्डों में चलने वाला धारावाहिक भी कह सकते हैं। ‘आहट’ का पहला सीज़न 1996 से 2001 तक चला, तो दूसरा सीज़न 2004 से 2005 तक चला। तीसरा सीज़न 2007 तथा चौथा सीज़न 2009 से 2010 तक चला जबकि इसका अंतिम एवं पांचवा सीज़न जून 2010 से नवम्बर 2010 तक चलकर समाप्त हुआ। बताना होगा कि ‘आहट’ का प्रसारण सर्वप्रथम हर शुक्रवार को रात दस बजे होता था जो बाद में चौथे सीज़न से हर शुक्रवार-शनिवार को रात ग्यारह बजे होने लगा। अपने अंतिम सीज़न में तो ‘आहट’ का प्रसारण सोमवार से बृहस्पतिवार तक होने लगा लेकिन अच्छी टीआरपी न मिलने के कारण इसे जल्दी ही बंद कर दिया गया।

उल्लेखनीय है कि ‘ज़ी हॉरर शो’ एक ऐसा कार्यक्रम था जिसका प्रसारण आधी रात को ग्यारह से बारह बजे के बीच में होता था जिसके निर्माताओं में भारतीय हॉरर फिल्मों के जाने माने निर्माता तुलसी और श्याम रामसे थे। इन्होंने ‘दरवाज़ा’, ‘वीराना’ जैसी सफल हॉरर फिल्मों का निर्माण किया था। इसके पहले एपिसोड ‘दस्तक’ में पंकज धीर और अर्चना पूर्ण सिंह ने बहुत ही अच्छा अभिनय किया था। इस कार्यक्रम ने अपने प्रसारण के साथ ही भारतीय जनता के मन में बैठे भूत नामक डर को और अधिक सुदृढ़ किया। इसके बाद तो अनेक प्रकार के भूतिया कार्यक्रमों की टेलीविजन पर बाढ़ सी आने लगी। ‘ज़ी हॉरर शो’ की बढती लोकप्रियता को देखते हुए तथा इसकी लोकप्रियता को कैश करने के लिए ज़ी टीवी ने एक और हॉरर कार्यक्रम ‘मानो या ना मानो’ का प्रसारण 1995 में बालाजी टेलीफिल्म्स के सहयोग से कर दिया जिसके कुल 68 एपिसोड का प्रसारण हुआ। इसके साथ ही ज़ी टीवी ने प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक आशुतोष गोवारीकर के द्वारा निर्मित हॉरर शो ‘वो’ का प्रसारण ‘ज़ी हॉरर शो’ के अंतिम दिनों के दौरान (1998) ही कर डाला था जिसमें युवाओं को कथा का केन्द्र बनाकर उन्हें ‘वो’ नामक आत्मा से लड़ते हुए दिखाया गया था।

ज़ी टीवी के बाद सोनी टेलीविजन ने भी अनेक हॉरर कार्यक्रमों का प्रसारण कर डाला। 2002 से 2005 तक चलने वाला लोकप्रिय कार्यक्रम ‘अचानक 37 साल बाद’ और बालाजी टेलीफिल्म्स द्वारा निर्मित ‘क्या हादसा क्या हकीकत’ का प्रसारण 2002 से 2004 तक किया गया। इसके बाद तो सभी चैनलों ने मुनाफा कमाने के लिए तरह-तरह के ऊल-जुलूल विषयों को कथानक का मूलाधार बनाकर, उन्हें सत्य घटनाओं पर आधारित कहकर प्रसारित किया। इसमें ‘रात होने को है’ (2004) सहारा मनोरंजन, ‘क्या कहें’ (2004-2005) ज़ूम टेलीविजन, ‘शऽऽऽ..कोई है’ (2001) स्टार प्लस, ‘शऽऽऽ..फिर कोई है’ (2006) स्टार वन, ‘काला साया’ (2011) सहारा वन, ‘अनहोनियों का अँधेरा’ (2011) कलर्स टीवी – इत्यादि भूतिया कार्यक्रमों की बाढ़ टेलीविजन मनोरंजन चैनलों पर आ गयी और हर कोई चौनल स्वयं को सर्वाधिक विश्वसनीय घोषित करने के लिए अनेक वक्तव्यों, व्यक्तियों के अनुभवों का प्रयोग अपने धारावाहिकों में इस प्रकार करते हुए नज़र आते थे मानों वह व्यक्ति-विशेष किसी भगवान का अवतार हो और उसके मुख से निकला हुआ एक एक शब्द वेद-वाक्य के समकक्ष हो। उसके समस्त अनुभव यथार्थ हों।

अगर आज टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले भूतिया कार्यक्रमों की बात हो तो इनमे सर्वप्रमुख ज़ी टीवी पर प्रसारित होने वाले हॉरर शो ‘फीयर फाइल्स’ (Fear Files) का नाम लेना होगा जिसका प्रसारण ज़ी टीवी पर 2012 से हर शनिवार और रविवार देर रात में एक घंटे का हो रहा है। इस कार्यक्रम की एक टैग लाइन है। ‘डर की सच्ची तस्वीरें’। इस टैग लाइन का बार बार इसके प्रोमों में प्रयोग कर इस कार्यक्रम की विश्वसनीयता का प्रचार-प्रसार दर्शकों के मध्य किया जाता है। ध्यान देने की बात है कि इस कार्यक्रम की शरुआत में, हर कहानी के प्रसारण से पूर्व किसी भुक्तभोगी व्यक्ति या परिवार के मुख द्वारा प्रसारित होने वाली कहानी की पृष्ठभूमि की मौखिक अभिव्यक्ति करवायी जाती है जिससे दर्शकों का उस व्यक्तिध्परिवार विशेष के साथ एक भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित हो सके। कार्यक्रम के बीच-बीच में तथाकथित भुक्तभोगियों के अनुभवों को उन्ही की जुबानी दर्शकों तक पहुँचाया जाता है और प्रस्तुतीकरण के अंत में एक पैरानॉमी विशेषज्ञ द्वारा प्रसारित कथा पर प्रामाणिकता का ठप्पा लगाया जाता है। साथ ही बहुत ही अजीबों-गरीब नुस्खों को करने की सलाह दर्शकों को दी जाती है। जिसका लाभ यह होता है कि दर्शक प्रसारित कहानी को सच समझ कर देखते हुए उसे अपनी ही कहानी समझता है। साथ ही इस कार्यक्रम को देखते हुए बचपन की कहानियों के कल्पना लोक में विचरने लगता है। कहानियो के कल्पना लोक को ऐसे कार्यक्रमों में दर्शक साकार होते हुए पाते हैं और तुरंत उस कहानी से जुड़ जाते हैं।

आज विभिन्न जनमाध्यमों पर इन भूतिया प्रसारणों को देखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि इन भूतों का बहुत बड़ा और विशाल बाजार इन जनमाध्यमों की दुनिया में विद्यमान है जिसे इन माध्यमों के नियंताओं ने ही एक निश्चित वर्ग की स्वार्थपूर्ति हेतु खड़ा किया है। एक ऐसी दुनिया के अस्तित्व को इन जनमाध्यमों में बनाये रखा है जिस पर हमेशा से ही संदेह बना रहा है। यह सच है कि टेलीविजन ने इन भूतिया कार्यक्रमों को घर घर तक पहुँचाया है। लोगो के भीतर भूतों के होने की ज़मीन को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यहां यह बताना होगा कि भूतों का इतना विस्तृत बाजार भारत में बहुत पहले ही सिनेमा द्वारा खड़ा किया जा चुका था, टेलीविजन ने तो उसे सहज और सुलभ बनाकर घर घर तक प्रेषित किया है। जिस प्रकार टेलीविजन विभिन्न खण्डों में अनेक भूतिया कहानियों का प्रसारण करता है उसी प्रकार सिनेमा भी अनेक फिल्मों के द्वारा भूतों के संसार के होने का प्रमाण देता हुआ प्रतीत होता है।

भारतीय सिनेमा के हॉरर अध्याय पर जब हम दृष्टिपात करते है तो पता चलता है कि भारत में पहली हॉरर फिल्म कमल अमरोही द्वारा निर्मित ‘महल’ (1949) थी जिसमें अभिनेता अशोक कुमार और अभिनेत्री मधुबाला ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इसके बाद हेमंत कुमार द्वारा निर्देशित फिल्म ‘बीस साल बाद’ (1965) का नाम लिया जाता है जिसने भूतिया फिल्मों की श्रेणी में तहलका मचा दिया। इस फिल्म की अपार सफलता के बाद तो इन भूतिया फिल्मों के निर्माण का एक फार्मूला मिल गया जिसे अपनाकर अनेक फिल्मों का निर्माण किया गया। परिणाम स्वरुप 1965 में दो हॉरर फिल्मों -गुमनाम और भूत बंगला- का प्रसारण हुआ जिसने दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी। इसके बाद भारतीय हॉरर फिल्मों के इतिहास में रामसे-ब्रदर्स के युग का आगमन होता है जिन्होंने 1972 में रिलीज हुई फिल्म ‘दो गज जमीन के नीचे’ से बहुत सफलता और लोकप्रियता हासिल की। इसके बाद ‘दरवाघ’ (1978) ‘पुराना मंदिर’ (1984), ‘सामरी’ (1985), ‘वीराना’ (1985), ‘पुरानी हवेली’ (1989), ‘शैतानी इलाका’ (1990) और ‘बंद दरवाघ’ (1990) को विभिन्न सिनेमा थियेटरों में रिलीज किया गया जिसका लोगों ने खूब स्वागत किया और इन फिल्मों ने रिकोर्ड तोड़ कमाई की।

रामसे-ब्रदर्स की फिल्मों के बारे में यह कहना जरूरी है कि इनकी फिल्मों में स्त्री का कामुक और अश्लील प्रस्तुतीकरण किया जाता था। इनकी फिल्मों के भूत भी आमतौर पर महिलाये ही होती थी। ध्यातव्य रहे कि जो फिल्मी कैमरा अभी तक स्त्री के बेडरूम तक पहुंचा था वह अब उसके बाथरूम तक भी पहुँच चुका था। स्त्रियों का नहाते हुए दिखाना रामसे-ब्रदर्स की फिल्मों की जरूरत थी जिसके द्वारा पुरुष दर्शकों को सिनेमा हॉल तक खींचा जाता था। इनके फिल्मों के भूत इतने समझदार होते थे कि उसी वक्त किसी स्त्री को अपना शिकार बनाते थे जब वो नहाने जाती थी। समय के पाबन्द भूत हमें पहली बार रामसे-ब्रदर्स की फिल्मों में ही देखने को मिले थे। और समय के पाबन्द इन भूतों को हमने बाद की अनेक उन फिल्मों में भी देखा जिनका निर्माण रामसे-ब्रदर्स ने नहीं किया था। दर्शकों को खींचने के लिए इस फार्मूले का प्रयोग लंबे समय तक किया गया जिसके दर्शक इतने आदती हो गए थे कि अगर भूतिया फिल्मों में स्त्री-स्नान का कोई दृश्य न आता तो उसकी कमाई कम हो जाती थी। यहाँ तक कि दर्शकों को भी पता रहता था कि जब भी स्त्री नहाने के लिए जायेगी तो भूत तभी उसके पीछे से आकार स्त्री पर हमला करेगा। लेकिन तब तक स्त्री का वस्तुकरण करके, दर्शकों के सम्मुख उनकी यौन-तुष्टि के लिए नग्न/अर्धनग्न रूप में स्त्री को परोसा जाता रहता था। संभवत: यही कारण है कि टेलीविजन ने भी इसी हॉरर विधा को बहुत जल्दी अपना लिया और दर्शकों को छीनने के खेल में शामिल हो गया।

इसके बाद हॉरर फिल्मों का आना-जाना लगा रहा। लोगो की ज्यादा नोटिस लेने में यह भूतिया फिल्में असफल होती दिखाई दे रहीं थी। इसका एक बहुत बड़ा कारण यह भी था कि अब दर्शक टेलीविजन पर ही अपनी भूतों सम्बंधित जिज्ञासाओं को शांत कर रहे थे। टेलीविजन पर अनेक भूतिया कार्यक्रमों का प्रसारण हो रहा था जिसके कारण लोगों को इन भूतिया फिल्मों के लिए घर से निकलने के लिए कोई रूचि शेष नहीं रही। लेकिन यहाँ कहना होगा कि फिल्म निर्माता विक्रम भट्ट द्वारा निर्मित फिल्म ‘राज़’ ने एक बार फिर से इन भूतों के संसार की तरफ लोगों का ध्यान खींचा और उन्हें सिनेमा हॉल तक जाने के लिए मजबूर कर दिया। इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री बिपासा बासु और अभिनेता डीनो मारियो एवं आशुतोष राणा थे। यह फिल्म बहुत छोटे बजट की थी जिसने अपनी लागत से कई गुणा कमाई की और दर्शकों के साथ साथ, फिल्म निर्माताओं का ध्यान भी इन भूतों के बाजार की तरफ एक बार फिर से आकर्षित किया। परिणामस्वरूप डर, खौफ, काला जादू, वूडू इत्यादि को केन्द्र में रखकर एकबार फिर से भूतिया फिल्मों का निर्माण होने लगा।

गौरतलब है कि हिंदी सिनेमा में हॉरर फिल्मों का विश्लेषण करते हुए दो बड़े नामों और उनकी फिल्मों की चर्चा करना भी जरूरी है जिसने एक बार फिर से इन भूतों के बाजार को खड़ा करने में अपना योगदान दिया था। वह नाम है राम गोपाल वर्मा और विक्रम भट्ट। यह दोनों ही व्यक्तित्व आज फिल्म उद्योग के बहुत जाने-माने नाम हैं। राम गोपाल वर्मा की चर्चा करते हुए कहना होगा कि इनके द्वारा निर्देशित हॉरर फिल्म ‘रात’ (1992) हिंदी सिनेमा की बेस्ट हॉरर फिल्मों में से एक है। खुद राम गोपाल वर्मा दोबारा ऐसी फिल्म का निर्माण नहीं कर सके हैं। आपने इसके अलावा ‘डरना मना है’ (2003), ‘भूत’ (2003), ‘वास्तु शास्त्र’ (2004), ‘डरना जरूरी है’ (2006), ‘फूँक’ (2008), ‘भूत रिटर्न्स’ (2012), ‘आत्मा’ (2013) का निर्माण समय-समय पर किया है। इनके अतिरिक्त निर्देशक विक्रम भट्ट ने भी अनेक भूतिया फिल्मों का निर्माण किया है जिनमे से हम ‘राज़’ की चर्चा ऊपर कर चुके हैं। ‘राज़’ (2002) के अलावा विक्रम भट्ट ने ‘1920’ (2008), ‘शापित’ (2010) , ‘हॉंटेड’ (2011), ‘डेंजरस इश्क’ (2012) और ‘1920 – ‘Evil Returns’ (2012) का निर्माण किया जिसने बहुत लोकप्रियता अर्जित की। लेकिन कहना होगा कि जो नजरिया रामसे-ब्रदर्स का स्त्री के प्रति था उसकी झलक हमें इन निर्देशकों की फिल्मों में भी दिखाई देती रही है। स्त्री का या तो भोग्या रूप दिखाया जाता है या वह विभिन्न अत्याचारों से प्रताडि़त, बलात्कृता और शोषित दिखाई जाती है। जो प्रतिशोध की ज्वाला में जलती हुई इधर-उधर भटकती हुई दिखाई देती है। विक्रम भट्ट की ‘हॉंटेड’ फिल्म में तो कल्पना का सबसे कुरूप रूप हमे देखने को मिला जिसमे पुरुष भूत को एक कामुक बलात्कारी दिखाया गया जो हर रात एक युवती का बलात्कार करता हुआ दिखाया जाता है। मतलब जो बलात्कार जैसा घृणित कुकृत्य अभी तक सभ्य कहलाने वाले मानव समाज में घटित होता था उसे इन भूतों के संसार तक मानव मन ले गया। जहाँ न कोई कानून है ना कोई व्यवस्था, बस है तो बलात्कार। इस फिल्म ने बलात्कार को किसी महोत्सव के रूप में परोस कर स्त्रियों के प्रति किसी सकारात्मक दृष्टिकोण का निर्माण न करके, स्त्री की भोग्या छवि को ही प्रसारित किया। स्त्रियों के साथ होते बलात्कारों का ग्लोरिफिकेशन करना इन हॉरर फिल्मों का प्राथमिक धर्म रहा है।

इसी प्रकार से बालाजी टेलीफिल्म्स द्वारा प्रदर्शित फिल्म ‘एक थी डायन’ की चर्चा करना भी जरुरी है जिसका प्रसारण साल 2013 में सिनेमाघरों में किया गया। बताना होगा कि यह फिल्म बालाजी टेलीफिल्म्स के टेलीविजन पर प्रसारित भूतिया धारावाहिक ‘एक थी नायिका’ का ही पुनर्निर्मिति थी जिसमे अनेक स्त्री सम्बंधित अंधविश्वासों पर आधारित प्रसारण किए गए। ‘एक थी डायन’ फिल्म भी इन्ही अंधविश्वासों का अतिशयोक्तिपूर्ण शैली में प्रसारण करती हुई, इनका पुनर्स्थापन करते हुए स्त्री का नकारात्मक शैली में एक ‘डायन’ के रूप में अपने दर्शकों के सम्मुख परोसती है। यहाँ यह भी कहना होगा कि पुरुषों की शक्ति, उनकी माचोमैन वाली छवि का प्रसारण करने वाली अनेक फिल्मों का प्रसारण होता रहता है। यहाँ तक कि इन हॉरर फिल्मों में भी पुरुषों की यही छवि बलवती रहती है मगर स्त्री की सशक्त छवि को प्रस्तुत करने वाली इक्का-दुक्का फिल्मे हमारे हिंदी सिनेमा में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा पाती हैं। इसमें भी इन फिल्मों को अपने प्रदर्शन से पहले ही अनेक सामाजिक-धार्मिक कट्टरवादियों एवं स्त्री को अपनी निजी संपत्ति समझने वाले तथाकथित ठेकेदारों के विभिन्न विरोधों को झेलना पड़ता है। उनके सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक लगा दी जाती है। लेकिन स्त्री की रूडि़वादी, नकारात्मक और विभिन्न अंधविश्वासों से घिरी हुई स्त्री के प्रति कोई विरोध नहीं होता। उसकी देह का नग्न प्रदर्शन सबको लुभाता है। यही कारण है कि पुरुष की सर्वशक्तिमान होने वाली छवि को प्रसारित करने के लिए जहाँ ‘एक था टाइगर’ फिल्म आती है तो वहीं स्त्री की नकारात्मक और दब्बू छवि को प्रसारित करने के लिए ‘एक थी डायन’ फिल्म का निर्माण किया जाता है। यह फिल्मे समाज के जरूरतमंद वर्ग को क्या लाभ पहुंचाएंगी समझना बहुत मुश्किल है।

ऐसा नहीं है कि यह नजरिया केवल फिल्मों का ही रहता है। टेलीविजन कार्यक्रम में भी इससे इतर कोई विशेष सकारात्मक नजरिया हमें दिखाई नहीं देता। जिस प्रकार सिनेमा का स्त्रियों के प्रति एक पूर्वग्रह सदा बना रहता है उसी प्रकार टेलीविजन के भूतिया कार्यक्रमों में स्त्री की पारंपरिक छवि ही देखी जाती है। टेलीविजन के अधिकतर हॉरर शो में स्त्रियों को ही चुड़ैल और वैम्प के रूप में दिखाया जाता है जिसका मुख्य उद्देश्य अपनी या अपने परिवार की हत्या का बदला लेना होता है। मतलब जो स्त्री जीते जी पुरुषों का कुछ नहीं बिगाड़ सकती, वह मरने के बाद अपना प्रतिशोध लेती है। मरने के उपरान्त ही स्त्रियाँ पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती दे सकती हैं। यद्यपि यहाँ भी कोई तथाकथित पुरुष तांत्रिक/बाबा उसे फिर से अपने अधीन कर लेता है और उससे मनचाहा कार्य करवाता है अर्थात् जीते जी और मरने के बाद स्त्री की नियति पुरुष के इशारों पर नाचने की होती है। ध्यान देने की बात तो यह है कि महिला भूतों का लक्ष्य जहाँ अपने पति, बेटे और परिवार का बदला लेना होता है वहीं पुरुष भूतों का उद्देश्य नयी नवेली दुल्हनों को उठा लेना, स्त्रियों के साथ बलात्कार करना, उन्हें नहाते हुए परेशान करना, उन्हें घर के बाहर और भीतर डराते रहना होता है। मतलब स्त्री भूत बनकर भी एक आदर्श भारतीय स्त्री बनी रहती है जिसका लक्ष्य केवल उसका पति और परिवार रहता है जबकि पुरुष काम भावना के चलते भूत बनता है। एक स्त्री भूत बनकर भी आदर्श बनी रहती है और एक पुरुष भूत बनकर भी कामुक तथा स्त्री-शरीर का भूखा बना रहता है।

इस संदर्भ में यहाँ यह भी कहना होगा कि इन भूतिया प्रसारणों में पुरुषों को स्त्रियों की तुलना में अधिक समझदार और तार्किक दिखाया जाता है जो भूत-प्रेतों, जादू-टोनो एवं अन्य अन्धविश्वासों पर विश्वास नहीं करते है। जबकि स्त्रियों को शुरू से ही सभी ऊल-जुलूल मान्यताओं पर गहरा विश्वास करते हुए दिखाया जाता है। अगर कोई पुरुष इन भूत-प्रेतों पर विश्वास करता हुआ इन कार्यक्रमों में दिखाया भी जाता है तो वह या तो घर का नौकर, ग्रामीण, गरीब और पिछड़ा हुआ होता है या घर-परिवार का कोई बुजुर्ग सदस्य। स्त्रियों को तो आरम्भ से ही दिन रात पूजा-पाठ करते, तांत्रिकों के पास अपने घर परिवार की सुख शांति के लिए चक्कर लगाते, पति से बिना पूछे यज्ञ करवाते और ताबीज इत्यादि को घर में लाते हुए दिखाया जाता है। इन स्त्रियों को जरा सी आहट भी बेचौन कर देती है, उनमे भय और खौफ का संचार करती है जिससे छुटकारा पाने के लिए यह स्त्रियाँ आमतौर पर देवता समान पुरुषों के पास भागती हुई दिखाई जाती हैं। मजेदार बात तो यह है कि पुरुषों को स्त्रियों के साथ में देख कर भूत भी भाग जाते हैं और बाद में पुरुषों के जाने के बाद हमला करते हैं। पुरुष रूपी संबल के रहते हुए इन भूतों की हिम्मत नहीं होती कि वह सामने आ जाएँ। मतलब पुरुष सर्वशक्तिमान हैं जिससे भूत नामक प्रजाति भी डरती है और जो इस शक्ति पर निर्भर रहता है वह स्त्री होती है। स्त्री को अपना हर कार्य पुरुषों पर निर्भर होकर ही करना होता है। ध्यातव्य रहे कि इसी क्रम में यह कार्यक्रम किसी धर्म विशेष की मान्यताओं और विश्वासों की सशक्त अभिव्यक्ति करते हुए आगे बढते है। दर्शकों के बीच पसरे अन्धविश्वासो को एक विशाल और गहरी जमीन प्रदान करते हैं। साथ ही लोगों को धर्म के नाम पर भ्रमित करते हुए उन्हें मूर्ख बनाए रखने का कार्य करते हैं।

दरअसल यह सब पुरुषों के वर्चस्व और अधिकार को बनाये रखने के लिए एक सोची समझी साजिश होती है। ध्यान रहे कि पुरुषों को कोई भूत तभी दिखाई देता है जब वहाँ महिला की उपस्थिति हो। जब कोई रोती बिलखती स्त्री किसी रहस्यमयी शक्ति से बचाने के लिए उसके पास आकर सहायता मांगती है जिस पर प्राय: पुरुषों द्वारा विश्वास न करते हुए दिखाया जाता है। समाज में फैले हुए विभिन्न अंधविश्वासो और रूढिय़ों की चपेट में इन स्त्रियों को ही दिखाया जाता है, पुरुषों को नहीं। क्या यह स्त्रियों के प्रति इस विधा का पूर्वग्रह नहीं माना जाएगा ? इस प्रकार के प्रसारण का ही असर है कि हमारे गाँव-देहातों में ‘डायन’ तो मिल जाती है जिसे लोगों द्वारा सरे-बाजार नंगा घुमाया जाता है या उसकी पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती है मगर एक भी ‘पुरुष-भूत’ हमे नहीं मिलता जिसे उसके अपराध के लिए नंगा दौड़ाया गया हो।

उल्लेखनीय है कि इन भूतिया फिल्मों और टेलीविजन हॉरर शो के द्वारा किसी प्रकार की तार्किकता एवं सामाजिक चेतना का प्रसार न करके, पारंपरिक रूडिय़ों, अंधविश्वासों और जर्जर होती हुई मान्यताओं को पुन: एक ठोस जमीन प्रदान की जाती है। आज इक्कीसवीं सदी में जब देश-दुनिया चाँद और मंगल ग्रह पर जीवन की तलाश करने का प्रयास कर रही हैं, वहीं इन जनमाध्यम गैर-तार्किक काल्पनिक भूतिया संसार को सर्वाधिक अनिवार्य मानते हुए दिन-रात उनका निर्माण और प्रसारण करने में लिप्त हैं। चुड़ैलों के पैर उलटे होते हैं, भूत शीशे में नहीं दिखाई देते, भूतों के चेहरे बहुत भयानक होते हैं, भूतों का ठिकाना श्मशान घाट न होकर कब्रिस्तान होते हैं, भूत क्रिश्चयन धर्म के प्रतीक ‘क्रोस’ और गंगाजल से डरते हैं – और न जाने कैसे कैसे भ्रमों का प्रचार-प्रसार इन भूतिया फिल्मों और कार्यक्रमों द्वारा किया जाता है। वस्तुत: यह सभी मान्यताएँ विभिन्न धर्मों में सदियों से चली आ रहीं है जिन्हें इन भूतिया प्रस्तुतियों से समाज में पुर्नस्थापित किया जाता है। समाज में इनकी व्यापक स्वीकृति दिलाई जाती है।

विदित है कि किसी भी प्रकार की चेतना का प्रसार करना इन भूतिया प्रसारणों का लक्ष्य नहीं होता। इनका मूल उद्देश्य तो अधिकाधिक मुनाफा अर्जित करना होता है फिर भले ही इसके लिए समाज अँधेरी गर्तों में समाता चला जाए। तार्किकता और विवेक को कुए में धकेल दिया जाता है। बस ऐसा मनोरंजक मसाला तैयार किया जाता है कि दर्शक उस कहानी से चिपक जाए। दरअसल यह प्रसारण ऐसे वातावरण का निर्माण करते हैं जिसमें तेज संगीत, डरावनी आवाजें और चीख-पुकार, डरावने चेहरे, मन्त्रों का भय उत्पन्न करने वाली शैली में लगातार उगाारण, हिंसा, बदले की भावना को बार-बार दिखाया जाता है। हर कहानी में एक बदले की भावना निहित रहती है जिसका लगातार प्रसारण करना हिंसा की सामाजिक स्वीकृति के पक्ष में ही वातावरण को निर्मित करना होता है। परिणामस्वरूप हिंसा एक सामाजिक मूल्य बनकर सबके लिए अनिवार्य हो जाता है। समाज द्वारा हिंसा को सभी समस्याओं का समाधान के रूप में देखा जाने लगता है। युवाओं में तो यह भावना सर्वाधिक बलवती होती चलती है।

यह काफी हद तक वैसा ही होता है जैसा कि टेलीविजन पर प्रसारित पारिवारिक धारावाहिकों से दर्शकों का तादात्म्य स्थापित करने की प्रक्रिया में किया जाता है। इन धारावाहिकों में जिस प्रकार एक पारिवारिक कथानक केन्द्र में रहता है उसी प्रकार इन भूतिया कार्यक्रमों में भी एक डरावनी कथा को आधार बनाया जाता है। जैसे भावनात्मक संगीत, फिल्मी गानों एवं ध्वनियों के द्वारा दर्शकों को भावनात्मक स्तर पर जोड़ा जाता है वैसे ही इन भूतिया धारावाहिकों में डरावने संगीत, खौफनाक आवाजों के द्वारा एक जिज्ञासात्मक भय को दर्शकों के भीतर पैदा किया जाता है। इनमें अंतर सिर्फ इतना होता है कि पारिवारिक धारावाहिकों में जहाँ पात्र-चरित्रों की संख्या अधिक होती है वहीं इन हॉरर शो में इनकी संख्या निश्चित और सीमित रहती है। साथ ही हिंसा के क्रूरतम रूप अर्थात ‘हत्या’ का इन हॉरर शो में अपने चरम पर प्रसारण होता है जबकि इन पारिवारिक प्रसारणों में शारीरिक हिंसा ही बहुत कम देखने को मिलती है। इन कार्यक्रमों में तो हिंसा का केवल मानसिक स्वरुप ही प्रबल रहता है। हर पात्र मन में अनेक प्रकार की कुचालों द्वारा मानसिक हिंसा में ही जीता-मरता रहता है।

गौरतलब है कि जब सभी जगह इन भूतिया प्रसारणों को अपार सफलता मिलने लगी और ये अपने निर्माणकर्ताओं की झोलियों को पैसों से भरने लगे तो सूचना एवं शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने वाले समाचार चौनल भी इस भूतिया-सागर में गोते खाने लगे। जिन समाचार चौनलों का प्रारंभ देश और दुनिया में चेतना, तार्किकता और शिक्षा का प्रसार करते हुए समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और रूडिय़ों का खात्मा करने के उद्देश्य से हुआ था, वे सभी टीआरपी नामक भूत के चक्कर में पड़कर इन भूतिया प्रसारणों को दिखाने में व्यस्त हो गए जो इनके चरित्र के बिलकुल विपरीत था। कहना होगा कि भूतों और उनसे सम्बंधित मुद्दों की तुलना में अभूतों (मनुष्यों) के सारवान मुद्दों को हाशिए पर रखा जाता है। ‘काल कपाल महाकाल’, ‘भूतों के गढ़ में एक रात’, ‘भूत बंगला’ जैसे अनेक विशेष प्रस्तुतियों का प्रसारण नियमित रूप से होने लगा जिससे इनकी आमदनी में तो बहुत इजाफा हुआ लेकिन इनकी चौतरफा आलोचना होने लगी। मगर इन आलोचनाओं की परवाह किए बिना इन भूतिया प्रसारणों का ग्राफ इन समाचार चौनलों में लगातार बढ़ता गया जो आज थोडा नीचे आ गया है। मतलब जिस मनोरंजन के लिए हमारे यहाँ सैंकड़ो चैनल मौजूद हैं, उसी मनोरंजन का प्रसारण इन समाचार चौनलों द्वारा होने लगा। जिससे समाज को कोई लाभ मिला हो या नहीं लेकिन सामाजिक रूडि़वादिता को और अधिक मजबूती मिली है।

ऐसा नहीं है कि समाचार पत्र (प्रिंट मीडिया) इनसे दूरी बनाये हुए हैं। अखबारों में भी इस प्रकार की खबरों को जगह दी जाती है। यद्यपि उसका तरीका थोड़ा अलग होता है। हम देखते हैं कि कई तरह के बाबाओं और तांत्रिकों के विज्ञापनों को अखबारों में जगह दी जाती है जो अप्रत्यक्ष रूप से इन भूतिया कार्यक्रमों के पक्ष में किया गया प्रचार होता है। उन अंधविश्वासों की पक्षधरता होती है जो समाज को पीछे धकेलने में सबसे आगे रहते हैं। अखबारों में स्थान मिलने के बाद तो इन बाबाओं की पहुँच पढ़े-लिखे, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले लोगों तक भी जा पहुंची जिनको इन ढोंगी बाबाओं ने खूब नोंच-नोंच कर खाया और इस मूर्ख बनती जनता ने अपने दोनों हाथों से अपनी दौलत को इनके लिय न्योछावर कर दिया। यही कारण है कि चाट-पकौड़ी की दुकानों की तरह आज इन कृपा-कारोबारियों की दुकानें हर गली और मोह्ल्ले में खुली हुई है जिनका खुला प्रचार आज समाचार पत्र करते हुए दिखाई देते हैं। इस प्रक्रिया में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों ही मीडिया शामिल हैं।

आज हमें अखबारों में ऑल इंडिया खुला चौलेंज करने वाले अनेक बंगाली और नूरानी बाबाओं के सांत्वना भरे शब्द देखने को मिल जाते हैं तथा गारंटी-कार्ड से सौ प्रतिशत समाधान करने वाले सगो पीर-बादशाह कहलाने वाले इल्हामी बाबाओं की भरमार दिखाई देती है। अब तो यह बाबा लोग डॉक्टरों की तरह ‘गोल्ड मेडलिस्ट’ भी होने लगे हैं। जो सौतन से छुटकारा दिलाने, विदेश यात्रा करवाने, अ’छी नौकरी और मनचाहा प्यार दिलाने का दावा करते हुए अनेक मासूम लोगों को मूर्ख बनाते हैं। मजेदार बात तो यह है कि ऐसे लोगों का कोई स्थाई पता भी इनके नाम के साथ प्रिंट मीडिया में प्रकाशित नहीं होता। केवल इनके फोन नंबरों को ही इनके बड़े-बड़े दावों के साथ छापा जाता है। क्या ऐसे प्रकाशन के लिए प्रिंट-मीडिया की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती ? लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने का दावा करने वाले मीडिया का अपने लोगों के प्रति यही कर्तव्य रह गया है ?

अंत में तनिक इन हॉरर शो के प्रसारण समय का भी विश्लेषण कर लेना चाहिए। अभी चर्चा की है कि इन भूतिया कार्यक्रमों का प्रसारण दोनों प्रकार के चौनलों (मनोरंजन और समाचार चौनल) में देर रात को दस से बारह बजे के बीच में ही होता है जो हमारी इस मान्यता को भी पुष्ट करते हुए चलते है कि भूतों का संसार रात में ही सक्रिय होता है। दिन के उजाले में भूतों को डर लगता है। देर रात में इनका प्रसारण होने का एक बहुत बड़ा कारण यह भी है कि देर रात में घर के अधिकतर सदस्य अपने दैनिक कार्यों को निपटा कर आराम से बैठकर टेलीविजन देखना चाहते हैं। रात में टीवी देखने के दौरान उनके डिस्टर्ब होने की संभावना भी कम रहती है। हमने पीछे बताया था कि यह भूतिया कार्यक्रम एक डरावने वातावरण का निर्माण करते है जिसके लिए दर्शकों की एकाग्रता और एकांत को होना आवश्यक है। और यह एकाग्रता एवं एकांत रात को ही मिल सकता है जिसमे इन भूतिया प्रसारणों का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। दिन में यह कार्यक्रम अपना वह प्रभाव दर्शकों पर नहीं छोड़ सकते जो रात में छोड़ते हैं।

भारतीय टेलीविजन प्रसारण के इतिहास इस तथ्य को सिद्ध करने के लिए काफी है जिसमे आज तक कोई भी हॉरर प्रसारण दिन में प्रसारित नहीं हुआ है। अगर ऐसा हुआ भी है तो वह उस कार्यक्रम की पुनरावृति ही होती है जिसका पुन: प्रसारण टेलीविजन या समाचार चैनल अपने खाली समय को भरने के लिए करते हैं। अभिप्रेत है कि यह प्रसारण इन भूतों के द्वारा एक ऐसा विशाल बाजार निर्मित करते हैं जिसमे आकार जीवित लोग स्वयं को भूतों की तुलना में बहुत हीन और कमतर समझते हुए इस बाजार के अभिन्न हिस्से बने रहते हैं। जिनके पास कोई और विकल्प ही नहीं बचता है।

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