हिन्दी के ई-पोर्टल पर अश्लीलता का बढ़ता साम्राज्य

प्रकाश चन्द्र शर्मा*
डॉ. मानसिंह परमार**

आजकल ई-पोर्टल और ई-समाचार पत्रों का चलन बढ़ गया है। पाठक कहीं भी अपने कम्प्यूटर, मोबाइल या टेबलेट पर जाकर समाचार व अन्य जानकारियां प्राप्त कर सकता है। इन दिनों जो ई-पोर्टल और ई-समाचार पेपर लोकप्रिय हो रहे हैं, उनमें अश्लीलता का पुट काफी बढ़ गया है। इस अध्ययन में इसी बात को जानने की कोशिश की गई कि आखिर क्यों कोई भी ई-पोर्टल या ई-समाचार पत्र दूसरों के मुकाबले ज्यादा लोकप्रिय होता है। इस अध्ययन के जो निष्कर्ष निकले वे चौंकाने वाले थे। अध्ययन में यह बात सामने आई कि ई-पोर्टल, ई-समाचार पत्रों की तुलना में ज्यादा लोकप्रिय हैं। उनकी लोकप्रियता का कारण उनकी ताजा जानकारी, ई-मेल तथा ई-पत्र जैसी सुविधाएं, खेल और फिल्मों के बारे में दी गई विस्तृत जानकारी तो होती ही है, पाठकों को आकर्षित करने के लिए दी गई ‘हॉट सामग्री भी है।

1969 में जब इंटरनेट की बुनियाद रखी गई थी, तब किसी को भी इस बात का अहसास नहीं था कि इंटरनेट जनजीवन को इतना प्रभावित कर देगा। तीन साल बाद जब 1972 में ई-मेल सेवा शुरू  हुई मानो क्रांति ही आ गई। बीस साल पहले तक यही माना जाता था कि इंटरनेट और कम्प्यूटर केवल धनिक वर्ग के लिए है। यह भी माना जाता था कि यह केवल अंग्रेजी भाषा अथवा रोमन लिपि वालों के लिए ही है, लेकिन 1999 में जब विश्व में हिन्दी का पहला वेब पोर्टल http://www.webdunia.com की स्थापना हुई और मुझे उसका कंटेंट एडिटर बनने का मौका मिला। तब भी मुझे इस बात का अहसास नहीं था कि वेब पोर्टल की दुनिया इतनी बदल जाएगी। जब वेब पोर्टल की शुरूआत हुई, तब वह लोगों के आकर्षण का केन्द्र था और ज्ञान का भण्डार भी। एक तरह से यह क्रांति ही थी। किसने पूरी दुनिया को जनसंचार के क्षेत्र में एक कर दिया। दस साल में हमने पाया कि भारत में उपलब्ध इंटरनेट की सामग्री का एक तिहाई हिन्दी में है। हिन्दी में भी लाखों ब्लॉग्स लिखे जा रहे हैं और वे लोकप्रिय भी हो रहे हैं। जिस तरह हिन्दी में वेबसाइट बढ़ रही हैं, उसी तेजी से पाठकों की संख्या भी बढ़ रही है, लेकिन पाठकों की संख्या को बढ़ाने के लिए ई पोर्टल ऐसे-ऐसे हथकण्डे अपना रहे हैं, जो हमारे समाज के हिसाब से उचित नहीं कहे जा सकते।

इस अध्ययन का उद्देश्य यह जानना रहा कि आखिर आए दिन समाज में लैंगिक अपराध बढऩे का क्या कारण है? क्या यह इंटरनेट पोर्टल समाज में अपराध और अश्लीलता फैला रहे हैं। इस गलत परंपरा के लिए कौन ज्यादा दोषी है इंटरनेट पोर्टल या ई-न्यूज पेपर? क्यों इन ई-पोर्टल पर सनी लिओनी और पूनम पांडे जैसों को विशेष दर्जा प्राप्त है। क्यों अपराध की खबरों को नमक मिर्च लगाकर परोसा जाता है। जवाहरलाल नेहरू  विश्वविद्यालय में एक छात्र द्वारा साथी छात्रा पर जानलेवा हमला करने वाले युवक द्वारा जहर खाकर जान देने वाले युवक की मौत के बाद भी इस खबर को एक प्रमुख पोर्टल में नमक-मिर्च लगाकर पेश किया। इस पोर्टल में यहां तक लिख दिया कि उस छात्र और छात्रा के बीच दैहिक संबंध थे। क्या उस खबर को लिखने वाले पत्रकार ने उसकी पुष्टि की थी और क्यों वह समाचार बाद में हटा लिया गया? क्यों इंटरनेट पोर्टल पर ऐसी खबरों को चित्रों सहित बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है, जिनका असर किशोर वय के बच्चों पर बुरा असर पड़ सकता है। बिग बॉस कार्यक्रम की अश्लीलता का मुद्दा हो या कंडोम के अश्लील विज्ञापन, मल्लिका शेरावत का डांस हो या अपनी बीवी ट्विंकल खन्ना कुमार से जिंस की जिप खुलवाने की कोशिश करने वाले अक्षय कुमार पर मुकदमे का मामला हो। पंजाबी और भोजपुरी कार्यक्रमों की अश्लीलता का मामला बार-बार उठता है। दिल्ली की मेट्रों ट्रेन में युवक-युवतियों के आलिंगन के एमएमएस इन पोर्टल पर बार-बार दिखाए जाते हैं। क्यों मॉडलों और अभिनेत्रियों के नाभि दर्शन और बिकनी बेब्स के स्लाइड शो प्रमुखता से प्रदर्शित होते हैं। नए साल के जश्न में लोगों के व और फिल्मी कलाकारों ‘ऊप्पस मोमेंट स्लाइड शो का हिस्सा बनते हैं। कभी यौन शिक्षा के नाम पर, कभी सेहत के नाम पर, कभी खजुराहों के नाम पर और कभी कामसूत्र के नाम पर खबरें बनाई और दिखाई जाती है। पश्चिमी देशों के न्यूड बीच चर्चा में रहते हैं? क्यों फिल्मों के वे ही दृश्य इन पोर्टल्स पर प्रमुखता से रहते हैं, जिनमें अश्लीलता का पुट होता है। आइटम साँग्स को इतनी तवज्जों क्यों दी जाती है? इस सबके पीछे जो चीज समझ में आती है, वह यह कि पाठकों को रिझाने की यह कवायद नैतिकता की सीमा लांघी जाती है। कई बार सेक्स सर्वे को यह पोर्टल बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं।

पोर्टल कई तरह के होते हैं, जिसमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय पोर्टल न्यूज पोर्टल हैं। क्योंकि उनमें सभी जानकारियां होती हैं। न्यूज पोर्टल के अलावा शिक्षा, चिकित्सा, विधि शा, टेक्नोलॉजी, रोजगार, शासकीय पोर्टल, सांस्कृतिक पोर्टल, सर्च पोर्टल, स्टॉक पोर्टल, टेण्डर पोर्टल, खेल पोर्टल, राजनीतिक पोर्टल आदि होते हैं। वेब पोर्टल एक विशेष तौर पर डिजाइन की गई वेब साइट होती है, जिसमें सामग्री को सिलसिलेवार प्रस्तुत किया जाता है। हिन्दी के प्रमुख न्यूज पोर्टल में http://www.indiatimes.com, http://www.webdunia.com, http://www.bhaskar.com, http://www.in.com, http://www.prabhasakshi.com, http://www.yahoohindi.com, http://www.hindisagar.com, http://www.raftar.com, http://www.hinkhoj.com. हिन्दी के प्रमुख ई समाचार पत्र हैं -www.dainikjagran.com, http://www.bhaskar.com, http://www.navbharattimes.com, http://www.amarujala.com, http://www.prabhatkhabar.com, http://www.bbc.hindi.com, http://www.livehindustan.com, http://www.lokmatsamachar.com, http://www.naidunia.com, http://www.aajtak.intoday.com.

मीडिया में श्लीलता और अश्लीलता को दिखाने के लिए भारतीय प्रेस परिषद की एक आचार संहिता इसके नीति नियामक सिद्धांतों में पत्रकारिता के स्तर को निर्णय करने वाले प्रावधानों का जिक्र है। अश्लील और कुरूचि के बारे में भारतीय प्रेस परिषद ने स्पष्ट किया है कि रूचि का अर्थ संदर्भ के हिसाब से अलग-अलग होता है। पत्रकार के लिए इसका अर्थ है कि शालीनता और औचित्य के आधार पर किसी सामग्री का प्रकाशन किया जाए या नहीं। भारतीय प्रेस परिषद का मानना है कि जिस सामग्री से यौन संबंधित भावनाओं को भड़काने की प्रवृत्ति हो ऐसी सामग्री का प्रकाशन अवांछनीय होगा। जनता की रूचि को वातावरण, परिस्थिति और समसामिक समाज में विद्यमान रूचि की धारणाओं के साथ पर रखा जाना चाहिए।

कोई भी कहानी अश्लील है अथवा नहीं, यह बात पत्रिका की साहित्यिक और सांस्कृतिक प्रवृत्ति अथवा सामाजिक स्तर के कारकों पर निर्भर करेगी। यह भी देखा जाना चाहिए कि यह सामग्री जनरूचि से कम है या नहीं। क्या यह सामग्री कला, चित्रकला, चिकित्सा विषयक या दवाइयों के शोध से संबंधित है। प्रेस परिषद ने विज्ञापनों के बढ़ते हुए अश्लील उदाहरणों पर चिंता व्यक्त की। प्रेस परिषद सेंसरशिप के विरुद्ध है, लेकिन उसने ऐसी सामग्री के प्रकाशन के पहले जांच करने के उपायों का समर्थन किया, जिसे औसत भारतीय परिवार में आपत्तिजनक माना जाता है। भारतीय प्रेस परिषद ने निर्देशित किया है कि ऐसे विज्ञापन अथवा सामग्री का प्रकाशन न हो, जिसमें महिलाओं को नग्र अवस्था में दिखाते हुए पुरुषों की कामुकता को उत्तेजित किया जा रहा हो अथवा जिसमें किसी महिला को कमोडिटी के रूप में पेश किया जा रहा हो। प्रेस परिषद के अनुसार कोई तस्वीर अश्लील है अथवा नहीं। इसके तीन परिक्षण हैं-

  1. क्या यह अश्लील और अशालीन है?
  2. क्या यह केवल अश्लील लेखन का अंश है?
  3. क्या इस प्रकाशन का उद्देश्य केवल ऐसे लोगों में इसे प्रचारित करने का है, जिससे किशोरों की यौन भावनाओं को बढ़ाकर लाभ कमाया जा सके?

भारतीय प्रेस परिषद ने इस मामले में एक रिपोर्ट तैयार की है और यह दिशानिर्देश तय किया गया है ‘निजता का अधिकार अनुल्लंघनीय मानवाधिकार है। हालांकि निजता का पैमाना स्थिति और व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है। सार्वजनिक व्यक्ति जनता के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं। प्रायवेट व्यक्ति के समान निजता की वही डिग्री पाने की आशा नहीं कर सकते। उनके कार्य और आचरण जनहित में होते हैं। जनहित  जनता की रूचि से अलग रखा जा रहा है। यदि ऐसे जनप्रतिनिधि ऐसे निजी कार्य करें, तब भी प्रेस के माध्यम से लोगों को इसकी जानकारी देना अवांछनीय नहीं है। यह सुनिश्चित करना प्रेस की ड्यूटी है कि वो सार्वजनिक व्यक्ति के सार्वजनिक हित के ऐसे कार्यों और आचरण के बारे में सूचना सही तरीकों से प्राप्त की जा रही है और समूचित रूप से उसे सत्यापित करके लोगों के सामने लाया जा रहा है। प्रेस से यह भी आशा की जाती है कि वह लोकप्रिय व्यक्तियों को तंग न करें। लोकप्रिय सार्वजनिक लोगों से भी यह आशा है कि वे अपनी कार्यप्रणाली में खुलापन लाए और जनता को उनके बारे में सूचित करने की प्रेस की ड्यूटी को निभाने में प्रेस की मदद करें। भारत में वेबसाइट पर बढ़ते अश्लील साहित्य को नियंत्रित करने के लिए कई बार विचार किया गया। यह पाया गया कि इसका लोगों पर खासतौर पर किशोर आयु के बच्चों पर बुरा असर पड़ता है। इस बारे में कम्प्यूटर और मोबाइल फोन पर अश्लील सामग्री देखने को कानूनी अपराध बनाने की बात कही। राज्यसभा की याचिका समिति में यह बात उठी। इस याचिका में सूचना और प्रौद्योगिकी कानून में सुधार करके कम्प्यूटर और मोबाइल पर अश्लील साइट देखने को अपराध बनाने का आग्रह किया गया था। यह भी आग्रह किया गया था कि जो भी व्यक्ति या संस्था ऐसी अश्लील साइट का निर्माण, वितरण या प्रदर्शन करे उसे कड़ी से कड़ी सजा दी जाए। यह याचिका जैनाचार्य विजय रत्न सुन्दर सुरिजी और तीन अन्य लोगों की तरफ से राज्यसभा के सदस्य विजय दर्डा ने याचिका समिति को सौंपी थी।

इस याचिका पर याचिका समिति के अध्यक्ष भगतसिंह कोश्यारी ने इस याचिका पर लोगों और संगठनों से सुझाव मांगे थे। इस याचिका पर अभी विचार चल रहा है। याचिका में कहा गया है कि भारत की आबादी का दो तिहाई हिस्सा 35 साल से कम का है। यह दो तिहाई आबादी साइबर अश्लील साहित्य के माध्यम से मुक्त यौनाचार के बढ़ते चलन के कारण पथभ्रष्ट और भ्रमित हो रही है। इससे कई तरह की समस्याएं यौन रोग और लैंगिक विकृतियां पैदा हो रही है, इसलिए इस पर रोक लगाई जाना चाहिए।

चीन में एक सफाई अभियान छेड़ा गया है। इस अभियान के तहत अश्लील सामग्री परोसने वाले एक लाख 80 हजार ऑनलाइन प्रकाशनों पर रोक लगा दी गई है। अश्लील साहित्य और अवैध प्रकाशन विरोधी चीन के राष्ट्रीय कार्यालय में दस हजार वेबसाइटों को नियम और कानूनों के उल्लंघनों के मामले में दंडित भी किया है। इस अभियान में 56 लाख ऐसी सामग्री पाई गई, जो अश्लील थी। चीन के अधिकारियों का कहना है कि यह कदम उठाने का उद्देश्य वेबसाइट के प्रबंधन में सुधार करना है। (संदर्भ इंडो-एशियन न्यूज सर्विस)

हिन्दी में आज हजारों वेब पोर्टल हैं। लगभग सभी प्रमुख समाचार पत्र अपने ई-पेपर प्रकाशित करते हैं। अनेक समाचार-पत्र समूह अपने अखबारों को ऑनलाइन करने के साथ ही साथ मिलते-जुलते नामों वाले न्यूज पोर्टल भी चलाते हैं, जिनकी सामग्री तत्काल अपडेट भी होती है। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह अपना सभी प्रमुख समाचार-पत्रों टाइम्स ऑफ इंडिया, इकॉनॉमिक टाइम्स, नवभारत टाइम्स, महाराष्ट्र टाइम्स, मुंबई मिरर के ई-एडिशन प्रकाशित करता है, लेकिन साथ ही वह http://www.indiatimes.com नाम का बहुभाषी पोर्टल भी संचालित करता है। भास्कर समूह दैनिक भास्कर, दिव्य भास्कर, मी मराठी आदि का ई-पेपर तो संचालित करता ही है। साथ ही बहुभाषी http://www.bhaskar.com भी संचालित करता है। इसी तरह अन्य प्रकाशन समूह के अपने-अपने पोर्टल हैं। इंडिया टुडे और आउट लुक जैसी पत्रिकाएं भी अपने पोर्टल संचालित करती हैं।

नई दुनिया समूह हिन्दी का पहला ई-पेपर और ई-पोर्टल प्रकाशित करने वाला समूह था। नई दुनिया का प्रकाशन जागरण समूह के पास जाने के बाद http://www.webdunia.com अलग से प्रकाशित होता है।

इनके अलावा हिन्दी के प्रमुख न्यूज पोर्टल में अनेक टीवी चौनलों के पोर्टल भी हैं। आजतक, एबीपी न्यूज, एनडीटीवी खबर, आईबीएन खबर, समय लाइव, वन इंडिया जैसे पोर्टल तो हैं ही अखबारों के अपने पोर्टल हैं। जैसे अमर उजाला, प्रभात खबर, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण, बीबीसी हिन्दी, प्रभासाक्षी, रफ्तार आदि अनेक पोर्टल न्यूजीलैंड, इंग्लैंड, फिजी, मॉरिशस आदि देशों से भी चल रहे हैं। इन वेब पोर्टलों पर हिट्स या आईबॉल बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा सी चल पढ़ी है। अपने युवा पाठकों को लुभाने के लिए और ज्यादा हिट्स बटोरने के लिए ये पोर्टल अश्लील और फूहढ़ सामग्री को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। इसमें न तो भारतीय प्रेस परिषद की आचार संहिता का पालन हो रहा है और न ही समाज की मान्यता को ध्यान में रखकर कोई पैमाना तय किया गया।

हिन्दी के पोर्टलों और ई समाचार पत्रों में ऐसी सामग्री परोसी जाती है, जिसके शीर्षक ही अपने आप में पूरी कहानी कह देते हैं। कुछ उदाहरण देखिए – रंगरेलियां मनाते पकढ़ी गई हीरोइन, ताजा माल, फैशन के नाम पर एक्टे्रस कर बैठी भारी भूल, खेल में तो इनका जलवा है ही, खूबसूरती में भी इनका कोई मुकाबल नहीं, ऐसे एंजॉय करें फस्र्ट टाइम सेक्स, बेडरूम में कैसा शर्माना, मर्दों को शिकायत रहती है कि पहली रात को…, ऐसे मजेदार बनाएं फस्र्ट टाइम सेक्स, सपने में सेक्स का मतलब, फिट रखता है सुबह-सुबह का सेक्स, बेडरूम में ऐसा तो नहीं करते आप, क्या आपका मन उसके साथ सेक्स करने का होता है, मूड एंड पोजिशन, सेक्स के दौरान मर्द क्यों रहते हैं नर्वस, पांच हॉट सेक्स गैम, नो सेक्स इन डार्क, रेग्यूलर सेक्स के फायदे, क्या आप करते हैं एक्स से सेक्स… ये वे शीर्षक हैं, जो हिन्दी के कुछ लोकप्रिय ई-पोर्टल से लिए गए हैं। इनके शीर्षक पढ़कर ही आप समझ सकते हैं कि अन्दर क्या सामग्री होगी?

हिन्दी वेब पोर्टल में अश्लील सामग्री कई रूपों में दिखाई जा रही है। वे अश्लील सामग्री को दिखाने के लिए फूहढ़ विज्ञापनों का सहारा लेते हैं। फिल्म और टीवी से जुढ़ी मनगढ़ंत कहानियां प्रकाशित करते हैं। इन पोर्टल्स ने अश्लीलता के अपने आईकॉन बना रखे हैं। सनी लिओनी और पूनम पाण्डे अगर छींक भी दें तो इनके लिए हेडलाइंस की खबर हो जाती है। ये पोर्टल अश्लील फिल्मों के हिस्से, अश्लील विज्ञापनों की क्लिपिंग और फूहढ़ सामग्री बटोरकर जगह-जगह पेश करते हैं। कई बार तो ये अपनी भाषा की मर्यादा भी लांघ जाते हैं। इंडिया टाइम्स के एक अंग नवभारत टाइम्स पोर्टल के कुछ चैनल अपने आप में फूहढ़ता की कहानी बयां करते हैं। कुछ दिनों पहले तक इसमें मॉडल्स की अश्लील तस्वीरें ताजा माल शीर्षक से आती थी। पाठकों के प्रतिरोध के कारण वह चैनल बंद करना पढ़ा। अभी भी इस पोर्टल में पहले कालम में जोश-ए-जवानी शीर्षक से सेक्स से जुढ़ी खबरें बढ़ा-चढ़ाकर प्रकाशित की जाती हैं, जिनके अजीबो-गरीब शीर्षक और अश्लील तस्वीरें पूरी कहानी खुद ही कहते हैं। इस पोर्टल पर दिए जा रहे वीडियो के शीर्षक भी फूहढ़पन से भरे हुए हैं। तस्वीरों के साथ वीडियो के शीर्षक युवा पाठकों को रिझाने के लिए शब्दों की सीमा लांघ जाते हैं। हिन्दी के प्रमुख समाचार पत्र दैनिक भास्कर का पोर्टल http://www.bhaskar.com भी कुछ इसी तरह का है। अखबार की अपनी सीमा है। अखबार में एक सीमा से ज्यादा फूहड़ता पाठक बर्दाश्त नहीं कर सकता, लेकिन इंटरनेट पर ऐसी कोई मजबूरी नहीं है।

भारतीय कानून के मुताबिक यह अश्लीलता है -1. अगर कोई भी कार्य इस तरह किया जाए कि वह प्रमुख रूप से कामुक प्रतीत हो। कोई भी ऐसा कृत्य या हाव-भाव जो आक्रामक रूप से काम क्रिया को इंगित करता हो। कानूनी रूप से अश्लीलता को अभद्र हाव-भाव से जोड़ा गया है। चाहे वह शब्दों में हो, चित्रों में हो या अंग प्रदर्शन के हाव-भाव में हो। इंडियन पैनल कोर्ट की धारा 292 के अनुसार अश्लील हाव-भाव संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति के अधिकार को निरबंधित करते हैं। इस कानून के मुताबिक कोई भी अश्लील किताब, पर्चा, अखबार, लेख, चित्र, रेखा चित्र, प्रस्तुति या कोई भी ऐसी आकृति जो अश्लील हो और जिसे खुलेआम दिखाने से अनैतिकता या भ्रष्ट आचरण को बढ़ावा मिलता हो, वो प्रतिबंधित है। इस कानून के तहत ऐसी अभिव्यक्ति करने वाले को दो वर्ष तक जेल और दो हजार रुपए तक की सजा पहली बार अपराध करने के मामले में और दूसरी बार अपराध करने पर पांच साल की जेल और पांच हजार रुपए तक की सजा का प्रावधान है, लेकिन यही कानून जनहित में किए गए कार्य विज्ञान की खोज, साहित्य अथवा प्राचीन स्थलों को धार्मिक उद्देश्य से दिखाने पर लागू नहीं होता।

इस कानून के संदर्भ में एक बेहद दिलचस्प मामला रणजीत डी उदेसी विरुद्ध भारत सरकार प्रकरण के रुप में सामने आया। रणजीत उदेसी को डीएच लॉरेंस की पुस्तक ‘लेडी चेटर्लीज लवर पुस्तक बेचने के मामले में 1964 में मुंबई में गिरतार कर लिया गया, जिसे पुलिस ने अश्लील साहित्य माना। बाद में यह प्रकरण सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की तीन न्यायमूर्तियों की बैंच में रखा गया, तब चीफ जस्टिस हिदायतुल्लाह ने रणजीत उदेसी को दोषमुक्त करार दिया। इस पुस्तक को सबसे पहले फ्रांस में प्रकाशित किया गया था। बाद में यह पुस्तक संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में व्यापक चर्चा में रही। अमेरिका में इसे ‘लैंगिक क्रांति माना गया।

आखिर हिन्दी के ई पोर्टल पर अश्लीलता का साम्राज्य क्यों बढ़ रहा है, यह जानने के लिए जजमेंटल सेम्पलिंग की गई। इस उद्देश्य से 250 पाठकों पर एक सर्वे किया गया। इन पाठकों को 30 पृष्ठों की एक प्रश्नावली भेजी गई, जिसमें अन्य सवालों के साथ ही ये सवाल भी पूछे गए कि-

  1. क्या पोर्टल की सामग्री ज्यादा बोल्ड होती है?
  2. क्या पोर्टल में हॉट वीडियो और हॉट फोटो गैलरी भी होती है?
  3. क्या इन पोर्टल पर वह सामग्री भी मिल जाती है, जिसे ई-पेपर अश्लील मानते हैं?
  4. पोर्टल पर हॉट तस्वीरों के स्लाइड शो देखने को मिलते हैं आदि

इस प्रश्नावली में पाठकों के प्रिय पोर्टलों के नाम भी जानने की कोशिश की गई और उनकी उम्र, लिंग, शैक्षणिक योग्यता आदि भी पूछी गई। पाठकों ने जो जानकारियां दी, उन्हें एसपीएसएस (स्टेटस्टीकल पैकेज फॉर सोशल साइंसेस) पद्धति से जांचा गया। पाठकों से पूछा गया कि क्या वे बोल्ड लेख और विचारों के लिए उल्लेखित वेबपोर्टल अथवा वेब समाचार पत्र विजिट करते हैं। हॉट वीडियो, हॉट फोटो गैलरी और हॉट स्लाइड शो उनकी पसंद को कितना प्रभावित करते हैं। यह भी सवाल पूछा गया कि क्या उन्हें अपने प्रिय पोर्टल या ई-समाचार पत्रों पर ऐसी सामग्री भी देखने को मिल जाती है, जिसे अन्य संचार माध्यम अश्लील मानते हैं। फिर जो निष्कर्ष आए, उसके माध्यम से यह अध्ययन सम्पन्न किया गया। यह प्रश्नावली उन पाठकों के द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित है, जो नियमित रूप से इंटरनेट पोर्टल और ई-न्यूज पेपर को विजिट करते हैं। इन वेबसाइट के विजिटर्स द्वारा दी जानकारी के मुताबिक 26 से 40 वर्ष की आयु के सबसे ज्यादा पाठक थे। यह संख्या कुल पाठकों का 58 प्रतिशत है, उसके बाद 41 से 55 वर्ष की आयु के पाठक थे, जिनका प्रतिशत 19 रहा। हिन्दी इंटरनेट पर 18 से 25 वर्ष की आयु के पाठकों की संख्या 11 प्रतिशत रही और 12 प्रतिशत पाठक ऐसे थे, जो 55 वर्ष से अधिक की आयु के थे। सर्वे में इन पाठकों की शैक्षणिक योग्यता को भी चार खण्डों में बांटा गया। पहला अंडर ग्रेजुएट, दूसरा ग्रेजुएट, तीसरा पोस्ट ग्रेजुएट एवं चौथा इससे अधिक। सर्वाधिक 49 प्रतिशत पाठक पोस्ट ग्रेजुएट, उसके बाद 28 प्रतिशत तक ग्रेजुएट और 23 प्रतिशत पाठक पोस्ट ग्रेजुएट या उससे अधिक की शिक्षा वाले पाए गए। लिंग के आधार पर वर्गीकरण में 89 प्रतिशत पुरुष और 11 प्रतिशत महिलाएं इस सर्वे में शामिल रहीं। सर्वे में पाया गया कि ई-समाचार पत्र की तुलना में न्यूज पोर्टल को ज्यादा पसंद किया जा रहा है। हिन्दी न्यूज पोर्टल को पसंद करने वाले 63 प्रतिशत रहे, जबकि हिन्दी ई-न्यूज पेपर को पसंद करने वाले 37 प्रतिशत ही रहे। पाठकों ने http://www.webdunia.com, http://www.bbc.hindi.com, http://www.khabar.ndtv.com, http://www.aajtak.intoday.com, http://www.bhaskar.com, http://www.bhadas4mediya.com को पसंद किया, जबकि ई-समाचार पत्रों में ई-पेपर. http://www.bhaskar.com, http://www.jagran.com, http://www.patrika.com, http://www.navbharattimes.indiatimes.com, http://www.livehindustan.com, http://www.inextlive.com, और http://www.jansatta.com को पसंद किया।

‘बोल्ड के नाम पर – इस सर्वे मेंं पाठकों से पूछा गया कि क्या आपके सबसे प्रिय वेब पोर्टल या ई-समाचार पत्र में बोल्ड लेख और बोल्ड विचार शामिल हैं। 60 प्रतिशत उसमें सहमत थे, जिनमें से 35 प्रतिशत ने पूर्ण सहमति जताई। केवल 14 प्रतिशत पाठकों का मत था कि वे इस बात से पूरी तरह असहमत हैं और 9 प्रतिशत इस बारे में कुछ बताना नहीं चाहते।

क्या आपकी प्रिय वेबसाइट में हॉट वीडियो, हॉट फोटो गैलरी और हॉट स्लाइड शो होते हैं? यह पूछे जाने पर 36 प्रतिशत ने सहमति जताई है, जिसमें से 25 प्रतिशत पूरी तरह इस बात पर सहमत थे कि वे ऐसी सामग्री वाले पोर्टल को पसंद करते हैं। एकदम असहमत रहने वाले पाठकों की संख्या 33 और असहमत रहने वाले पाठकों की संख्या 16 प्रतिशत रही। 16 प्रतिशत पाठकों ने इस बारे में कोई भी टिप्पणी करने से इनकार किया।

इस सर्वे में शामिल पाठकों में से 26 प्रतिशत ने माना कि उनके प्रिय ई-पोर्टल या ई-समाचार पत्र में उन्हें वह सामग्री भी मिल जाती है, जिसे अन्य संचार माध्यम अश्लील मानते हैं। इन 26 प्रतिशत में से एक बढ़े भाग ने यानी कुल 26 में से 21 प्रतिशत ने यह माना है कि वे इससे पूरी तरह सहमत हैं। 12 प्रतिशत पाठकों ने कहा कि वे बारे में कुछ नहीं कह सकते।

निष्कर्ष  :

  1. कंटेंट – वेब पोर्टल्स का कंटेंट ताजा तरीन होता है। इनमें कोई भी घटना हो उसका अपडेट तत्काल कर दिया जाता है, लेकिन यहां फूहढ़ सामग्री को ज्यादा महत्व दिया जाता है। जिन समाचार पत्रों के ई-पोर्टल हैं वो अपने ई-समाचार पत्र में वैसे कंटेंट नहीं देते, जैसे कि पोर्टल में देते हैं। इसके पीछे उनकी धारणा अपने पाठकों को लुभाने की होती है, जबकि ई-समाचार पत्र में मुद्रित समाचार पत्र की ही छवि होती है। मुद्रित समाचार पत्र सभी आयु और आय वर्ग के लोगों द्वारा पसंद किए जाते हैं और मुद्रित समाचार पत्रों में फूहड़ता और अश्लीलता की उतनी गुंजाइश नहीं होती।
  2. डिजाइन – ई पोर्टल अपने पाठकों को आकर्षित करने के लिए केवल अश्लील समाचार व लेख ही नहीं देते। वे अश्लील वीडियो और अश्लील फोटो गैलरी भी भरपूर देते हैं, जो खबर ई अखबारों में 50 शब्दों में लिखी गई हो वैसी खबरें यह पोर्टल लीड स्टोरी के रूप में पेश करते हैं।
  3. रिलेडेट लिंक – ई पोर्टल न केवल अश्लील सामग्री देते हैं, बल्कि अश्लील सामग्री से जुड़े लिंक को भी प्रमुखता देते हैं।
  4. इंटरेक्शन – वेब पोर्टल अपनी सामग्री पर पाठकों की प्रतिक्रिया लिखने की जगह छोड़ते है। वहां जाकर कोई भी पाठक अपना संदेश लिख सकता है और वह तत्काल ऑन लाइन भी हो जाता है। उस संदेश पर भी संदेश देने के लिए पाठक स्वतंत्र होते हैं।
  5. प्रभाव – पाठकों पर इन वेब पोर्टल की सामग्री का चौतरफा प्रभाव पड़ता है। जैसा कि हमारे इस सर्वे में पता चला कि पाठक सामग्री से प्रभावित होते हैं और कई बार ऐसी हरकतें करने को प्रेरित हो जाते हैं, जो समाज पर अच्छा असर नहीं छोढ़ती। इससे यौन अपराधों को बढ़ावा मिलता है और व्यभिचार के मामले भी बढ़ते हैं।

सुझाव : आमतौर पर ये धारणा है कि इंटरनेट का उपयोग 55 या उससे अधिक की आयु के लोग नहीं करते। यह धारणा इस अध्ययन में सही नहीं पाई गई। कम से कम हिन्दी ई-पोर्टल और ई-समाचार पत्रों के पाठकों के बारे में यह बात तो कही ही जा सकती है कि वहां ज्यादा उम्र के लोग भी इनके पाठक हैं। ये पाठक परिपक्व हो चुके हैं और दुनिया को देखने का उनका अपना तर्जुबा है। ये परिपक्व पाठक वे हैं जिनकी पसंद और चाहत पहले से निर्धारित हो चुकी है। ये पाठक आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता पसंद नहीं करते।

हिन्दी के पाठक आमतौर पर शालीन हैं और सभ्यता के उनके पैमाने पश्चिम से अलग हैं। इन पाठकों की आय काफी ज्यादा है और अपनी आमदनी के लिए ये आत्मनिर्भर हैं। अगर ई-पोर्टल और ई-समाचार पत्र अपनी सामग्री में शालीनता का पुट बढ़ाएंगे तो इससे उनके परिपक्व पाठकों की संख्या में और भी वृद्धि होगी, जो उनके प्रचार प्रसार में मददगार ही होगी।

संदर्भ :

  1. constitution of india
  2. rajyasabha.nic.in
  3. presscouncil.nic.in/
  4. indiacourts.in/RANJIT-D.-UDESHI-Vs.-STATE-OFMAHARASHTRA_4dff0468-9159-452c-a410-2354aa07c201
  5. Major Hindi portal’s
  6. Major hindi epaper

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