लोकतंत्र और सोशल मीडिया : वर्तमान परिप्रेक्ष्य में

डॉ. नीरज खत्री*

हमारे लोकतन्त्र को सोशल मीडिया मजबूती प्रदान-प्रदान करता दिखाई पड़ रहा है। लोकतांत्रिक सिद्धांतों के तरफदार लोकतंत्र को अक्षुण रखने के लिये जहां सोशल मीडिया और नेटवर्किंग के पक्षधर हैं, वहीं सत्ता सुख भोग रहे नेताओं को सोशल मीडिया फूटी आंख नहीं सुहा रहा है। वे उस पर नियंत्रण के तरीेके की खोज में हैं। सोशल मीडिया की लोकप्रियता के कारण विश्व के अनेक देश सत्ता संघर्ष में फंसे हुए हैं। भारत, अमेरिका, रूस, चीन आदि देशों की सरकारें भी सोशल साइटों की निगरानी के लिये कडे कानून बनाने की पक्षधर हैं। इस शोध पत्र के माध्यम से शोद्यार्थी का अवलोकन पद्धति से यह जाननें का प्रयास है कि क्या वास्तव में सोशल मीडिया लोकतन्त्र को मजबूती प्रदान कर पा रही है। क्या सोशल मीडिया को यथोचित स्वतन्त्रता सरकार के लोकतान्त्रिक ढांचे से प्राप्त है, यदि है तो किसी रूप में। इसके साथ ही शोद्यार्थी का इस अध्ययन के माध्यम से यह भी जानने का प्रयास है कि सोशल मीडिया विश्व के अन्य लोकतान्त्रिक देश में किस प्रकार सक्रिय है।

भारतीय लोकतंत्र और सोशल मीडिया की बढ़ती लोकप्रियता :

मीडिया के प्रति जनमानस का विश्वास बढ़ता जा रहा है। इडेलमैन ट्रस्ट बैरोमीटर (Edelment Turst Berometer) (E.T.B.) के अनुसार वर्ष 2011 में लोकप्रियता का पैमाना जहां 50 प्रतिशत था, वह वर्ष 2012 में बढक़र 70 प्रतिशत हो गया।

(ट्रस्ट की 12वीं सर्वे रिपोर्ट के अनुसार)

भारत में मीडिया पर विश्वास वृद्धि 20 पाइन्ट हैं जबकि अमेरिका में 19, यू.के. में 15 तथा इटली में 12 पॉइंट है।

सर्वे रिपोर्ट के अनुसार भारत के मीडिया के विभिन्न सोपान में यह वृद्धि 50 प्रतिशत है। विश्व स्तर पर पारम्परिक मीडिया में यह वृद्धि 29 से 32 प्रतिशत है। सोशल मीडिया के क्षेत्र में यह वृद्धि 8 से 15 अर्थात दुगनी है। सोशल मीडिया नेटवर्किंग साइट में ब्लॉग, माइक्रो ब्लॉग के क्षेत्र में सर्वाधिक 75 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया के प्रति विश्वास और लगाव में सर्वाधिक वृद्धि हुई। यह 44 से 53 प्रतिशत तक पहुंच गया। इस कड़ी में चर्चित समाज-सेवक अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन सोशल मीडिया की सकारात्मक ताकत दिखाने के लिए पर्याप्त है। अन्ना के इस आंदोलन की शुरूआत फेसबुक पेज इंडिया अंगेस्ट करप्शन के जरिए हुई और उसे बड़े पैमाने पर लोगों का समर्थन हासिल हुआ। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों के जरिए यह आंदोलन देशव्यापी बनकर घर-घर पहुंच गया और इसने जनांदोलन की सूरत अख्तियार कर ली, जिसकी मांगें सरकार को भी ध्यान से सुननी पड़ीं। निश्चित रूप से देश की सुरक्षा, अखंडता और सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखने के लिए जरूरी मौकों पर सोशल मीडिया पर निगरानी रखी जा सकती है। इसे गलत नहीं माना जा सकता। लेकिन, क्या वास्तव में ऐसा है? दरअसल, सोशल मीडिया पर शिकंजा कसने की आहट काफी दिनों से सुनी जा रही है। सूचना तकनीक (संशोधन) अधिनियम 2009 के मसौदे को कानूनी जामा पहनाए जाने की पूरी प्रक्रिया के परिप्रेक्ष में भी इसे देखा जा रहा है। सभी नये कानून पर संसद में खास चर्चा ही नहीं हुई। इस कानून के लागू होने के बाद ही ब्लॉग लेखक, फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट के उपयोक्ता  इंटरमीडियरी के दायरे में आ गए। अब अपने मंच पर लिखे हर शब्द के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं। चाहें वे टिप्पणियों के रूप में ही क्यों न हों।

सोशल मीडिया पर नियंत्रण की सरकार की कोशिशें चिंता पैदा करती हैं। कपिल सिब्बल के हाल के कदम का तो एक नकारात्मक प्रभाव यह भी हो सकता है कि लोग उस कंटेंट के प्रति उत्सुकता दिखाऐं, जिन्हें लेकर आपत्ति दर्ज की गई है। आशंका यह भी है कि सरकार की कोशिशों से निजता के अधिकार में दखल पड़ेगा और कई लोगों को छोटी-छोटी बातों पर बेवजह परेशानी झेलनी पड़ेगी। तकनीकी सवाल अलग हैं। इसके अलावा एक व्यावहारिक सवाल यह भी है कि कहीं सरकार की सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने की कथित कोशिशों से आक्रोशित लोग उसके खिलाफ और उबाल न खा जाएं। अप्रैल, 2011 में आईटी कानूनों को इतना सख्त बना दिया गया है कि आपत्तिजनक तस्वीरें, घृणास्पद बयान आदि फैलाने पर उन्हें अदालत में घसीटा जा सकता है।

सोशल मीडिया की उपयोगिता के कुछ संदर्भ

सोशल मीडिया ट्रायल के कई मामले लगातार दुनिया भर में सामने आ रहे हैं। कनाडा के बैंकुवर में भडक़ी हिंसा के बाद सोशल मीडिया ट्रायल के चलते कई लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। ब्रिटेन में दंगा फैलने के दौरान सोशल मीडिया की भूमिका के चलते ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने यहां तक कह डाला कि वह आपातकाल के दौरान सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने के हिमायती हैं। हालांकि, उनके इस बयान पर काफी हो-हल्ला मचा और उन्हें पीछे हटना पड़ा। लेकिन यह सिर्फ सिक्के का एक पहलू है। सोशल मीडिया की सकारात्मक ताकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। ज्यादातर मामलों में सोशल मीडिया की भूमिका न सिर्फ सकारात्मक नजर आती है, बल्कि उससे काफी फायदा भी होता है। सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों से निकली कई जीवनदायिनी कहानियां हैरान करने वाली हैं। उदाहरण के लिए स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय का छात्र जेकब बोहेम दोस्तों के साथ जापान घूमने गया। बाकी साथी लौट आए, लेकिन वह दक्षिण एशिया के देश घूमने निकल पड़ा। 13 अगस्त को उसने ‘गूगल प्लस’ पर संदेश प्रसारित किया कि वह मलेशिया में है।

फिर हफ्ते भर कोई संदेश नहीं। चिंतित माता-पिता ने उसके 12 दोस्तों को ई-मेल भेजे। दोस्तों की कोशिश से सोशल नेटवर्किंग साइट पर जैकब को खोजने की मुहिम छिड़ गई। खोज को समर्पित एक फेसबुक पेज की 5000 लोगों ने झटके में सदस्यता ली। सेनफ्रांसिसको इलाके में ट्विटर पर जैकब बोहेम ट्रेडिंग टॉपिक बन गया। फेसबुक कंपनी में इंटर्नशिप कर रही एक लडक़ी ने मलेशिया में फेसबुक पर जैकब की खोज के लिए मुफ्त मे विज्ञापन प्रसारित करवाया। लोनली प्लेनेट के लिए मलेशिया पर चर्चित पुस्तक लिख चुके सेलेस्टे ब्रैश ने जेकेब से जुड़ा पेज देखा तो उन्हें मालूम पड़ा कि जैकब की आखिरी सूचना जिस गांव जेरानटट से आयी थी, वह राष्ट्रीय जंगल तमन नेगारा का प्रवेश द्वार है। उन्होंने लिखा- ‘मुमकिन है कि जैकब जंगल में खो गया हो। वहां नेट या फोन नहीं चलता और वहां खोने का डर है।’ इसके बाद कोशिशें तेज हुईं। आखिरकार काफी मशक्कत के बाद जैकब को खोज निकाला गया।

‘‘मुंबई के डोंबिवली के एक स्कूल में कई साल चौकीदार रहे माधव करंदीकर ने भी सोशल मीडिया के इस चमत्कार को महसूस किया है। कुछ दिनों पहले माधव करंदीकर सीढिय़ों से फिसल गए। दोनों पैरों में फ्रैक्चर हो गये। डॉक्टरों ने ऑपरेशन में करीब दो लाख रूपये का खर्च बताया। करंदीकर को चार हजार रुपए पेंशन मिलती है। दाल-रोटी की जुगाड़ ठीक से नहीं हो पाती। ऐन इसी मौके पर उनके जीवन में दाखिल हुई सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक। स्कूल के छात्रों ने अपने ‘करंदीकर काका’ के लिए रकम जुटाने की कोशिश फेसबुक पर की और 15 दिनों के भीतर जरूर रकम जुटा भी डाली।’’

“ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड का एक किस्सा तो चमत्कृत करने वाला है। यहां 2009 में एक स्कूली छात्र ने खुदकुशी की कोशिश की। ‘फेसबुक’ पर स्टेटस मैसेज के रूप में उसने लिखा – ‘मैं अब बहुत दूर जा रहा हूं। लोग मुझे खोजेंगे।’ अमेरिका में बैठी छात्र की ऑनलाइन मित्र ने इस संदेश को पढ़ा। उसे नहीं मालूम था कि छात्र ब्रिटेन में कहां रहता है? लडक़ी ने अपनी मां को इस बारे में फौरन बताया। मां ने मैरीलेंड पुलिस को सूचित किया। “

पुलिस ने व्हाइट हाउस के स्पेशल एजेंट से संपर्क साधा और उसने वाशिंगटन में ब्रिटिश दूतावास के अधिकारियों से। उन्होंने ब्रिटेन के मेट्रोपॉलिटन पुलिस से संपर्क किया और इस बीच छात्र के घर का पता लगाकर थेम्स वैली के पुलिस अधिकारी उसके घर जा पहुंचे। छात्र नींद की कई गोलियां निगल चुका था, लेकिन अपराधियों ने आनन-फानन में छात्र को अस्पताल पहुंचाया, जहां आखिरकार उसकी जान बच गई।

उस घटना का जिक्र भी यहां किया जा सकता है, जिसमें फेसबुक पर संदेश पढऩे के बाद एक लडक़ी ने कर्नाटक की राजधानी बेंगलूर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के छात्रावास के अपने कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। पुलिस सूत्रों ने बताया कि आइआइएम के एमबीए पाठयक्रम की प्रथम वर्ष की छात्रा मालिनी मुर्मू (22) का बेंगलूर में ही रहने वाले उसके ब्वॉयफ्रेंड से हाल में कथित तौर पर कुछ मनमुटाव और कहा-सुनी हुई थी। इसके बाद लडक़े ने हाल में फेसबुक में अपने वॉल पर सार्वजनिक तौर पर एक संदेश में लिखा था- ‘मैं आज बहुत आराम महसूस कर रहा हूं। मैंने अपनी गर्लफ्रैंड को छोड़ दिया है। स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं।’

सूत्रों ने बताया कि फेसबुक पर सार्वजनिक तौर पर लिखे इस संदेश को पढऩे के बाद मालिनी इतनी आहत हुई कि उसने छात्रावास के कमरा संख्या 421 में पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली। उसने लैपटॉप पर एक सुसाइड नोट छोड़ा था और अपने कमरे में एक बोर्ड पर लिखा था कि उसके पुरूष मित्र ने फेसबुक पर जो कुछ लिखकर उसे छोड़ दिया है, उस वजह से वह आत्महत्या कर रही है।

भारत सरकार और सोशल मीडिया : इंटरनेट पर नियंत्रण की है आशंका

सरकार का कहना है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लोगों की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ हो रहा है। सरकार ने गूगल, याहू, माइक्रोसॉफ्ट और फेसबुक के प्रतिनिधियों से इस समस्या के हल के लिए रास्ता निकालने को कहा। लेकिन कंपनियों की तरफ से उत्साहजनक उत्तर नहीं मिला है, लिहाजा सरकार सोशल मीडिया पर पोस्ट किए जाने वाले कंटेंट पर निगरानी रखने के लिए ‘गाइडलाइन’ पर काम कर रही है। ये दिशा निर्देश या नियम क्या होंगे, इस बारे में सिब्बल ने साफ-साफ कुछ नहीं कहा। साथ ही सरकार ने सोशल मीडिया साइटों पर दबाव बढ़ा दिया है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक कंटेंट की भरमार है। ‘आपत्तिजनक’ सामग्री के मायने भी सापेक्षिक हैं, यानी कोई सामग्री अगर भारत में आपत्तिजनक कंटेंट की श्रेणी में है तो आवश्यक नहीं कि वह अमेरिका में आपत्तिजनक कंटेंट कहलाए। सोशल नेटवर्किंग साइट्स का भी तर्क है कि वे अमेरिकी कानूनों का पालन करने के लिए बाध्य हैं, न कि भारतीय कानूनों का। लेकिन बात इतनी सीधी नहीं है। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक कपिल सिब्बल सोशल नेटवर्किंग साइट्स से चाहते है कि वह भारतीय उपभोक्ताओं के कंटेंट को सार्वजनिक करने से पहले पूर्वपरीक्षण की कोई प्रणाली विकसित करें। तकनीकी रूप से यह आसान नहीं है। भारत में अभी फेसबुक के साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा उपभोक्ता हैं तो उनके कंटेंट को मॉडरेट करना लगभग नामुमकिन है। फिर, भारत के संदर्भ में यह मांग मानी जाती तो जल्द अन्य देशों की सरकारों की तरफ से भी इस तरह की मांग उठती। फिलहाल, फेसबुक व गूगल ने अदालत के आदेश के बाद आपत्तिजनक सामग्री हटाने का आश्वासन भी दिया है।

सरकार की शंकाओं को जल्दबाजी में सिरे से खारिज करना भी सही नहीं है और उसमें कुछ तथ्य है। सोशल नेटवर्किंग के कई नकारात्मक पहलू भी हैं, जिन्हें नियंत्रित करने के लिए कदम उठाने की सख्त जरूरत है। फेसबुक पर कई ऐसे पेज हैं, जिनसे राजनीतिक नेताओं पर हमला किया जाता है। फेसबुक पर ‘आइ हेट राहुल गांधी’ को 6700 से ज्यादा लोगों ने लाइक किया है। वहीं ‘आइ हेट नरेंद्र मोदी’ को 254 लोगों ने लाइक किया है। फेसबुक पर ‘आइ हेट इंडिया’ नाम का भी एक पेज था, जिसे अब हटा लिया गया है। ‘रियलटी ऑफ इंडिया’ नाम के एक पेज पर भारत विरोधी बातें और वीडियो दिखाये गये हैं। इस पेज को 51 हजार से ज्यादा लोगों ने लाइक किया है। खालिस्तान जैसा पेज भी इसके जरिए लिंक हैं, जिसके बारे में सुरक्षा एजेंसियां पहले ही खतरा जता चुकी हैं।

सोशल मीडिया और सत्ता संघर्ष

सही मायने में मसला सिर्फ सोशल मीडिया पर पाबंदी का भी नहीं है। सवाल है इंटरनेट पर नियंत्रण का। इंटरनेट की दुनिया में मुखर होते लोगों व संस्थाओं को सरकारों के लिए बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा है। चीन में तो फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस और यूट्यूब पर पाबंदी है ही, कई दूसरे देशों में अलग-अलग तरीके से ‘तानाशाही’ चल रही है। गैर सरकारी अंतर्राष्ट्रीय संस्था रिपोर्ट्र्स विदाउट बोर्डर्स ने 2006 में इंटरनेट के दुश्मनों की एक सूची जारी की थी। इसमें बर्मा, चीन, क्यूबा, इरान, उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया, सीरिया, सऊदी अरब, तुर्कमेनिस्तान, वियतनाम समेत 13 देश शामिल थे। आज की तारीख का सच यह है कि इंटरनेट को सेंसर करने का ट्रेंड उफान पर है। दुनिया के करीब 40 देश इंटरनेट पर पसरी सूचनाओं को किसी न किसी हद तक ‘फिल्टर’ कर रहे हैं। इन देशों में अमेरिका जैसा देश भी शामिल है, जो इंटरनेट पर सूचनाओं के निर्बाध प्रवाह का सबसे बड़ा हिमायती रहा है। सनसनीखेज खुलासों से दुनिया भर की सरकारों की नींद उड़ा देने वाली विकीलीक्स को अमेरिकी सरकार ने कई हथकंडों के सहारे लगभग बंद करा दिया है। दुनिया भर की सरकारों को स्वतंत्र इंटरनेट आंखों में खटकने लगा है और इस बात को फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने समूह आठ की मुख्य बैठक से पहले आयोजित अंतर्राष्ट्रीय वेब सम्मेलन में साफ कर दिया था। उन्होंने वहां इंटरनेट पर सरकारी नियंत्रण का मुद्दा छेड़ दिया था। सरकोजी ने इंटरनेट को ‘तीसरी क्रांति’ की संज्ञा दी थी, लेकिन कहा था कि इंटरनेट को निरंकुश नहीं छोड़ा जा सकता। सरकोजी ने विश्व के कई प्रमुख नेताओं और तकनीकी दुनिया के महारथियों के सामने कहा कि सरकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे इंटरनेट के दुरूपयोग को रोकने के लिए कुछ कानून बनाएं। कॉपीराइट का उल्लंघन, निजी जानकारियों की चोरी और बगो को साइबर अपराधियों के चंगुल में फंसने से बचाने के लिए इन कानूनों की जरूरत का हवाला देते हुए सरकोजी ने ‘शिष्य इंटरनेट’ की अपनी परिकल्पना को सामने रख दिया।

निष्कर्ष

इंटरनेट पर अलग-अलग तरह की सेंसरशिप चिंता का सबब तो हैं ही। इंटरनेट पर सरकारी अंकुश का कोई भी फैसला न केवल इसके विस्तार को बाधित करेगा, बल्कि लोगों की रचनात्मकता, प्रयोगधर्मिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करेगा। इतना ही नहीं, आर्थिक विकास की प्रक्रिया भी हतोत्साहित होगी। गौरतलब है कि मैकिंसे के नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि इंटरनेट ने आर्थिक ग्रोथ में महत्वपूर्ण किरदार अदा किया है, हजारों नौकरियों का सृजन किया है और संपदा बनाने का बेहतरीन जरिया मुहैया कराया है। आम लोगों, कंपनियों और सरकारों के इंटरनेट आधारित उपभोग के रूझान का इस्तेमाल करते हुए अध्ययन में पाया गया कि कई मुल्कों में कृषि, ऊर्जा और कई अन्य पारंपरिक क्षेत्रों की तुलना में इंटरनेट का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान अधिक है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में इंटरनेट ने बीते पांच साल में जीडीपी ग्रोथ में 5 फीसदी योगदान किया है, जबकि ब्रिक (ब्राजील, रूस, भारत और चीन) अर्थ व्यवस्थाओं के लिए वह औसतन 3 फीसदी है। अभिव्यक्ति का बेहतरीन जरिया है सोशल नेटवर्किंग साइट्स। कारोबार में बढ़ोतरी का मंच है सोशल मीडिया। हुनर के प्रदर्शन के मंच एवम् नागरिक पत्रकारिता को पंख देते हुए लोकतंत्र को मजबूत करने में ये साइट्स अहम भूमिका निभा रही हैं। हां, कुछ कमियां या आपत्तिजनक कंटेंट का मामला है, लेकिन इसका हल नियंत्रण-पाबंदी या निगेहबानी में नहीं हैं। सरकार मनमर्जी के बजाय सोशल मीडिया के मंचों को आम लोगों से संवाद का जरिया बनाए तो बेहतर होगा, क्योंकि तकनीक के आसरे इस समस्या का हल खोजना बहुत मुश्किल है।

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