जनमत निर्माण में मीडिया की भूमिका : चुनाव के विशेष संदर्भ में

श्री रामशंकर*

प्रस्तावना

आज के दौर में चुनाव, जनमत निर्माण एवं मीडिया के अंतर्संबंध व्यापक हो गये हैं।  चुनाव लोकतंत्र का महापर्व होता है। जनमत निर्माण में मीडिया की भूमिका अति महत्वपूर्ण होती है। वर्तमान मीडिया काफी शक्तिशाली है। अखबार, रेडियो, टेलीविज़न, इंटरनेट, नव सूचना तकनीक एवं नव संचार तकनीक के इस दौर में जनमत के मिजाज एवं रुझान को सहज ही प्रभावित किया जा सकता है। इसके सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं। आज के समय चुनाव की सबसे बड़ी बिडम्बना यह है कि उसकी कोई सर्वसम्मत आचार संहिता मीडिया के प्रसारण को लेकर अब तक नहीं बन पायी है और यदि बनी भी तो उसका अनुपालन प्रभावी ढंग से नहीं हो पाया। चुनाव पूर्व होने वाले एक्सिट पोल का प्रसारण एवं वह भी कई चरणों में होना एक तरफ जनमत को तो प्रभावित करता ही है, साथ ही चुनाव की प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है जिसका दूरगामी प्रभाव अंततोगत्वा हमारे लोकतंत्र पर पड़ता है। जनमत-संग्रह, (Plebiscite या Referendum) जिसे मत-संग्रह या सिर्फ जनमत भी कहते हैं, एक ऐसा प्रत्यक्ष मतदान है जिसमें किसी क्षेत्र विशेष के सभी मतदाताओं को मतदान के द्वारा किसी एक विशेष प्रस्ताव को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने के लिए कहा जाता है। दूसरे शब्दों में जनमत-संग्रह के माध्यम से सरकार की नीतियों या किसी प्रस्तावित कानून के बारे में जनता की राय मालूम की जाती है। ‘जनमत-संग्रह नये संविधान के निर्माण, वर्तमान संविधान में संशोधन, किसी नये कानून, किसी निर्वाचित सदस्य का निर्वाचन रद्द करने या केवल सरकार की किसी विशिष्ट नीति को स्वीकार या अस्वीकार करने से संबंधित हो सकता है। यह प्रत्यक्ष लोकतंत्र का एक रूप है। इसलिये ऐसे में चुनावों के परिप्रेक्ष्य में जनमत निर्माण की प्रक्रिया में जनमाध्यमों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है।’1

जनमत शोध और मीडिया में अंतर्संबंध

‘जनमत (Public opinion) शब्द सामान्यतया 19 वीं सदी में सामने आया इसका जिक्र 1890 में लिखे गए जॉन लॉक के एक निबंध ‘अंडरस्टैंडिंग द ह्यूमन कम्युनिकेशन’ में किया है इसमें उन्होंने जनमत को एक न्यायिक एवं नैतिक दृष्टि से देखने की कोशिश की है ,हालांकि इसके शताब्दियों पहले ग्रीस तथा रोम में Ossa, Phema, Nomos के रूप में जनमत की अवधारणा सामने आयी बाद में यह Vox-Populi जनता की आवाज के रूप में प्रचलित हुआ।’2  जनमत तथा जनता के बीच प्रचारित मत ये दोनों अलग अलग चीज हैं। किसी भी व्यापक और विविध समाज में जनमत की कोई स्पष्ट अवधारणा निर्धारित करना संभव नहीं है लेकिन मोटे तौर पर यह कह सकते हैं कि किसी भी विषय पर व्यक्तिगत विचारों, दृष्टिकोणों और विश्वासों से समान बिन्दुओं और इनकी सामूहिकता ही जनमत है। जनसंचार माध्यम इस सामूहिकता को अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं और किन विषयों पर और किस तरह वे अभिव्यक्ति करते हैं इससे भी जनमत प्रभावित होता है। जनसंचार माध्यमों द्वारा जनमत की अभिव्यक्ति और इस अभिव्यक्ति से जनमत का निर्माण एक जटिल प्रकिया है और हाल की के वर्षों की जनसंचार क्रांति से ये प्रकिया और भी जटिल हो गयी है। अनेक ऐसे विषय होते हैं जिन पर जनमत विकसित होता है और जनसंचार माध्यमों से इसे अभिव्यक्ति मिलती है।

जनमत को प्रभावित करने वाले कारक

जनमत बना बनाया नहीं होता, बल्कि व्यक्ति द्वारा तैयार किया जाता है। किसी विषय या समस्या पर व्यक्तियों द्वरा जनमत का निर्माण किया जाता है। जनमत के निर्माण में चार अवस्थाएँ निहित है। प्रथम, समस्या उत्पन्न होना। द्वितीय समस्या पर विचार विमर्श करना। तृतीय विकल्पी समाधानों का प्रस्तुत करना और अंत में चतुर्थ जनमत का प्रकट होना। ‘जनमत वास्तव में विकासत्मक प्रक्रिया का प्रमाण होता है, सामाजिक मानदंड तथा मूल्य, सामाजिक वर्ग,घटनाएँ तथा उनकी व्याख्या करना।’3

शोध का उद्देश्य

  • जनमत निर्माण में मीडिया की भूमिका का अध्ययन,
  • चुनाव के दौरान जनमत निर्माण की प्रक्रिया का अध्ययन,
  • मीडिया की भूमिका सकारात्मक एवं नकारात्मक जनमत निर्माण के परिपेक्ष्य में

न्यादर्श का चयन

प्रस्तुत शोध कार्य के लिए महाराष्ट्र के वर्धा जिले में स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पीएच.डी., एम.फिल.एवं एम.ए के विद्यार्थियों एवं शोधर्थियों को चयनित किया गया है। शोध में उद्देश्यपरक न्यादर्श  विधि द्वारा क्षेत्र का चयन किया गया।

अध्ययन प्रविधि

प्रस्तुत शोध के लिए सर्वेक्षण व अवलोकन विधि का चयन किया गया है ।

प्राथमिक स्रोत : प्रश्नावली, साक्षात्कार

द्वितीयक स्रोत : संबंधित साहित्य का अध्ययन, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, आलेखों, चर्चित ख्यातिलब्ध विद्वानों एवं साहित्यकारों के द्वारा प्रस्तुत शोधों के आलोक में प्रस्तुत विचार इत्यादि

प्रदत संकलन

शोध के चयनित  समग्र क्षेत्र में 50 प्रश्नावली का वितरण किया गया । प्रश्नवली में शोध से संबंधित विभिन्न प्रकार 10 प्रश्न थे, जो उद्देश्य को ध्यान में रखकर निर्मित किए गए थे । प्रश्नावली में जनमत की विवेचना,वर्तमान में जनमत का स्वरूप,जनमत के सकारात्मक और नकारात्मक पहलू, मीडिया की जनमत में भूमिका से संबंधित प्रश्न सम्मिलित किए गए थे। तथ्य के संकलन के लिए मीडिया से जुड़े लोगों से  साक्षात्कार भी लिया गया ।

प्रदत्त विश्लेषण व विवेचना

प्रश्नावली से प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण से जो महत्वपूर्ण परिणाम उभर कर आए हैं उनका वर्णन निष्कर्ष के रूप में निम्नलिखित है-

अध्ययन में सहभागी उत्तरदाताओं का सामान्य परिचय

  • प्रस्तुत अध्ययन में उत्तरदाता पीएच.डी.,एम.फिल.व स्नातकोत्तर के विद्यार्थी हैं।
  • अध्ययन में सम्मिलित उत्तरदाता 20 वर्ष से 40 वर्ष के मध्य आयु के हैं।
  • अध्ययन में सम्मिलित 40 प्रतिशत उत्तरदाता महिला तथा 60 प्रतिशत पुरुष हैं।

अध्ययन में प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 60 प्रतिशत चुनाव के दौरान मीडिया की भूमिका सकारात्मक से सहमत है, 35 प्रतिशत असहमत तथा 5 प्रतिशत कुछ न कह सकने की स्थित में नजर आए। निष्कर्षत: चुनाव के दौरान मीडिया की भूमिका सकारात्मक है।

अध्ययन में प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार मीडिया द्वारा चुनाव हेतु व्यापक जनचेतना का प्रसार होता है, इस पर 35 प्रतिशत लोगों में हाँ में अभिमत प्रदान किया है, 20 प्रतिशत लोगों ने नहीं तथा 15 प्रतिशत लोगों ने कुछ न कह सकने की स्थिति में नजर आए। निष्कर्षत: मीडिया द्वारा चुनाव के समय मीडिया द्वारा व्यापक जनचेतना का प्रसार किया जाता है।

अध्ययन में आंकड़ों के विश्लेषण में मीडिया द्वारा चुनाव के समय लोगों के लिए  स्वच्छ परिचर्चा, संवाद, प्रसारण, लेखन पर बल दिया जाता है इस पर 78 प्रतिशत लोगों ने हाँ में अभिमत प्रदान किया है तथा 15 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने नहीं एवं 7 प्रतिशत लोगों ने कुछ न जानकारी होने के पक्ष में अभिमत प्रदान किया है। निष्कर्षत: चुनाव के समय मीडिया जनमानस के लिए स्वच्छ परिचर्चा, संवाद प्रसारण एवं लेखन पर बल देती है।

मीडिया द्वारा चुनाव के समय जनता में चुनाव प्रक्रिया के प्रशिक्षण के लिए परिचर्चाओं का आयोजन करती है के प्रश्न पर 57 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने हाँ में, 36 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने नहीं तथा 6 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कुछ पता नहीं में अभिमत प्रदान किया है। अध्ययन में प्राप्त आकड़ों के विश्लेषण से यह निष्कर्ष स्पष्ट होता है कि मीडिया द्वारा जनता में चुनाव प्रक्रिया की प्रशिक्षण हेतु विशेष प्रसारण एवं परिचर्चाओं का समय समय पर आयोजन करती है ।

अध्ययन में 62 प्रतिशत हाँ में प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि मीडिया प्रसारण में सभी राजनीतिक पार्टियों को बराबर का कवरेज दिया जाता है ।

अध्ययन में प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण में 35 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना है कि पेड न्यूज़ कही ना कही चुनाव के नतीजों को बहुत प्रभावित करती है, ऐसे में मीडिया को तो पैसे मिल जाते है पर देश का भविष्य कही ना कही अंधकार में चला जाता है ।

अध्ययन में प्राप्त आंकड़ों में 67 प्रतिशत ने माना है कि पेड न्यूज, राजनीतिक विज्ञापन और ओपिनियन पोल को अतिरंजित कर के दिखाने की प्रवृत्तियों को जनमत निर्माण में मीडिया की भूमिका का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, तथा 33 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि इससे कोई प्रभाव पड़ता है।

निष्कर्षत: पेड न्यूज, राजनीतिक विज्ञापन और ओपिनियन पोल को अतिरंजित कर के दिखाने की प्रवृत्तियों को जनमत निर्माण में मीडिया की भूमिका का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है ।

अध्ययन में प्राप्त आंकड़ों में 62 प्रतिशत लोगों ने हाँ में सहमति प्रदान की है कि चुनाव के दौरान जनमत निर्माण में मीडिया का ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ का कांसेप्ट्स का काफी नाकारात्मक प्रभाव पड़ता है, 34 प्रतिशत लोगों ने माना कि इससे जनमत पर कोई नहीं पड़ता है, तथा 4 प्रतिशत उत्तरदाता कुछ भी स्पष्ट कहने की स्थिति में नहीं नजर आए। निष्कर्षत: चुनाव के दौरान जनमत निर्माण में मीडिया का ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ के कांसेप्ट्स का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है ।

अध्ययन में प्राप्त आंकड़ों में 72 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना है कि मीडिया द्वारा चुनाव के पूर्व में जनमत सर्वेक्षण करना उचित है, 25 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना है कि पूर्व में सर्वेक्षण करना उचित नहीं है तथा 3 प्रतिशत कुछ न कह सकने की स्थिति में नजर आए। निष्कर्षत: मीडिया द्वारा चुनाव के पूर्व में जनमत सर्वेक्षण करना उचित है ।

सुझाव

  1. जनमत निर्माण में मीडिया का ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ का कांसेप्ट्स खत्म हो,
  2. पेड न्यूज, राजनीतिक विज्ञापन और ओपिनियन पोल पर सख्त अंकुश लगे,
  3. चुनाव के दौरान जनमत निर्माण की प्रक्रिया में न्यूज़ चौनल की टीआरपी का खेल बंद हो।

संदर्भ स्रोत

  1. सिंह,अरुण कुमार, ‘समाज मनोविज्ञान की रूपरेखा’, पृष्ठ संख्या-391
  2. राजगढिय़ा, विष्णु ‘जनसंचार : सिद्धांत और अनुप्रयोग’ राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि., दरियागंज, संस्करण-2008 पृष्ठ संख्या-127
  3. http://subhashdhuliya.blogspot.in/2011/07/blog-post.html

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