फीचर : टी.आर.पी. : टेलीविजन चैनल्स् की सांप सीढ़ी

लक्ष्मेंद्र चोपड़ा*

”देखिये हमारी शोध के टी.आर.पी. आंकड़े आपके चैनल के पक्ष में नहीं जा रहे हैं, मुंबई मार्केट में आपकी दर्शनीयता 18 प्रतिशत डूब रही है, महाराष्ट्री मार्केट में आपके कार्यक्रमों की रेटिंग 7 प्रतिशत कम हुई है, खासकर दोनों ही बाज़ारों में रात दस बजे के बाद आपके चैनल की दर्शनीयता में भारी गिरावट आयी है…’’

शानदार कोट-पैंट टाई में लैस सज्जन अपना लेपटाप टकटकाते हुए विशुद्ध अंग्रेजी में एक मराठी टेलीविजऩ चैनल के कार्यक्रमों की लोकप्रियता के बारे में उसके कार्यक्रम निर्माताओं का मार्गदर्शन कर रहे थे। कुछ इस अंदाज में – ‘चप्पे-चप्पे पर हमारे आदमी तैनात हैं, देश के हर टेलीविजन पर हमारी नजऱ है… हर इक पल की ख़बर हमें मिल रही है।

कार्यक्रम निर्माताओं की मंडली में से अधिकांश बड़ी गंभीरता से सिर हिलाते हुए टी.आर.पी. आंकड़ों की जानकारी की टीप ले रहे थे, कुछ अजीबो-गरीब भाषा में- ‘आल सी.एस. होम्सन -फोर प्लेस, फिफ्टीन प्लेस फीमेल इत्यादि।

आंकड़ों और अंग्रेजी से बोझिल होती इस बैठक में निर्माता मंडली में बैठे एक बुजुर्ग प्रस्तोता महोदय ने मराठी में पूछा:- ‘परंतु साहेब, आम भता इथे रात्रि नौ बाजता बाजारबंद होतो आनी…।’

उनको आश्चजर्य हो रहा था कि जिन कार्यक्रमों का निर्माण वे घरेलू दर्शकों के लिये कर रहे हैं वे नौ बजे के बाद भी बाज़ार में कैसे देखे जा सकते हैं ? उनकी इस भोली जिज्ञासा पर कार्यक्रम निर्माता मंडली ठहाका लगा कर हंस दी। दरअसल विशुद्ध मराठी लोक संगीत कार्यक्रमों के निर्माता यह समझ ही नहीं पा रहे थे कि आज हमारे देश में लगभग चालीस हजार करोड़ का टेलीविजन उद्योग कार्पोरेट दुनिया की एक बड़ी ताकत में शुमार हो चुका है और उसकी ताकत की सबसे बड़ी गोली टी.आर.पी. अर्थात टेलीविजन रेटिंग पाइंट ही है। यह टी.आर.पी. ही प्रतिवर्ष लगभग बारह हजार करोड़ रूपयों के टेलीविजऩ विज्ञापनों की दशा और दिशा तय करती है।  इस पूरे टी.आर.पी. उद्यम को हमारे देश में निजी कंपनी टैम मीडिया रिसर्च संचालित करती है।

लेकिन पिछले दिनों हम मीडिया रिसर्च द्वारा साप्ताहिक रूप से जारी किये जाने वाले टी.आर.पी. आंकड़ों की ‘द कम्पीजटीशन कमीशन आफ इंडिया’ ने यह कहते हुए आलोचना की है कि, इस संपूर्ण प्रक्रिया में भारी सुधार की आवश्यतकता है क्योंकि ये आंकड़े समग्र भारत का प्रतिनिधित्व  नहीं करते। कमीशन ने संसद के प्रति उत्तरदायी देश के एक मात्र पब्लिक सर्विस प्रसारक दूरदर्शन की शिकायत को स्वीकार करते हुए यह राय व्यक्त की कि टैम मीडिया रिसर्च को ग्रामीण क्षेत्रों में भी रूचि लेना चाहिए। पिछले वर्ष नवम्बर में दूरदर्शन ने प्राइवेट टेलीविजऩ कंपनी एन.डी.टी.वी. द्वारा उठायी गयी आपत्तियों के बाद शिकायत की थी। टैम रिसर्च द्वारा जारी गलत टी.आर.पी. के कारण उसे राजस्व का भारी नुकसान हो रहा है। इस तरह की शिकायतें निजी टेलीविजन चैनल्स  के संपादक भी करते रहे हैं। मीडिया विशेषज्ञ यह भी आरोप लगाते रहे हैं कि इस भ्रामक टी.आर.पी. का परिणाम यह हुआ है कि हमारे देश में टेलीविजन कार्यक्रमों में सिर्फ क्रिकेट, सिनेमा, क्राइम, कालगल्र्स और सनसनी रह गयी है। उनके मत में टी.आर.पी. इन्हीं कार्यक्रमों से आती है, और विज्ञापन बाज़ार की भारी पसंद है। टैम मीडिया रिसर्च कंपनी भी मानती है कि उनकी शोध भी ब़ाज़ार के लिए ही है। पर वास्ताव में प्रसारण शोध का आरंभ बाज़ार के लिए नहीं बल्कि कार्यक्रमों के प्रति श्रोताओं तथा दर्शकों की रूचि जानकर उन्हें और अधिक उपयोगी बनाने के लिए हुआ था।

प्रसारण शोध का इतिहास

दुनिया के सर्वाधिक प्रतिष्ठित लोकसेवा प्रसारक बी.बी.सी. ने 1931 में अपने रेडियो श्रोताओं की कार्यक्रम आवश्यकताओं को समझने के लिए दैनिक सर्वेक्षण आरंभ किया था। सैम्पल सर्वे तथा प्रश्नावली पर आधारित इस सर्वेक्षण प्रणाली द्वारा विभिन्न आयुवर्ग के श्रोताओं के साक्षात्कार ले कर उनकी प्रतिक्रिया का आकलन किया जाता था। 1952 में बी.बी.सी. के टेलीविजन कार्यक्रम भी इस शोध प्रक्रिया में शामिल कर लिये गये।

वर्ष 1981 में ब्रिटेन में बी.बी.सी. तथा निजी ब्रिटिश टेलीविजऩ कंपनीज ने मिल कर ‘बार्ब’ अर्थात् ‘ब्राडकस्टकर्स आडियंस रिसर्च बोर्ड’ नाम से एक लिमिटेड कंपनी स्थापित की। बार्ब की दो मुख्य  शाखाएं हैं –

‘द आडियंस मैनेजमेंट सर्विस’ तथा ‘द आडियंस रिएक्शन सर्विस’। इनमें से पहली टी.वी. दर्शकों की संख्या  तथा उनकी कार्यक्रम देखने की आदतों के आंकड़ों पर नजर रखती है, जबकि दूसरी शाखा कार्यक्रमों पर उनकी प्रतिक्रिया एकत्र कर उनका विश्लेक्षण प्रस्तुत करती है। इस प्रकार बार्ब लाखों दर्शकों के संपर्क में रहती है। यहॉं यह ध्यान देने की बात है कि इस शोध तथा विश्लेक्षण में आयुवर्ग, लिंग, सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति व व्यवसाय की जानकारी आवश्ययक है। युनेस्को  के जनसंचार विभाग के मत में जनसंचार माध्यमों के विकास के लिए उनके उपभोक्ताओं की सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मनोवैज्ञानिक स्थितियों की जानकारी भी होनी चाहिए।

बार्ब ने पारंपरिक अनुसंधान प्रणालियों के साथ-साथ दर्शकों की कार्यक्रम पसंद-नापसंद को जानने के लिए मीटर प्रणाली आरंभ की। 30,000 घरों के लगभग 75,000 दर्शकों की रूचि जानने के लिए उनके टेलीविजन सेट्स को मीटर के माध्याम से एक केंद्रीय कम्यूटर से जोड़ दिया गया है। इस प्रकार देखे जाने वाले कार्यक्रमों के आंकड़े कम्यूटर में दर्ज हो जाते हैं। लेकिन एकत्र किये गये ये आंकड़े अंतिम नहीं है। कार्यक्रमों के गुण-दोषों का विवेचन विविध पृष्ठभूमि के लगभग 60,000 दर्शकों से लिए गये साक्षात्कारों के आधार पर किया जाता है। इनमें 12 वर्ष से कम आयु के बाल दर्शकों का पैनल अलग होता है। कुल मिला कर ये आंकड़े मात्र संख्यात्मक नहीं होते बल्कि कार्यक्रमों के गुण-दोषों की विवेचना भी करते हैं। यह प्रणाली दर्शक को यह सोचने का भी अवसर प्रदान करती है कि वह कार्यक्रम क्यों देखता है। इस प्रकार दर्शकों को अपनी कार्यक्रम आवश्यकताओं को समझने तथा उनमें सुधार करने का मौका मिलता है।

बी.बी.सी. ने एक पब्लिक सर्विस ब्राडकास्टर के रूप में टी.आर.पी. जुटाना शुरू किया था। लेकिन अमरीकी बाज़ारवादी सोच ने इसे मीडिया और विज्ञापनों की कमाई के पुल के रूप में स्थापित कर दिया। आज हमारे देश में भी टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट के आंकड़ों की यही दशा है।

अमरीका में 1929 में सांख्यिकीविद् आर्चीबाल्डा क्रोस्लील ने ‘रीकालÓ पद्धति का उपयोग किया, जिसमें श्रोताओं से पिछले दिन सुने गये रेडियो कार्यक्रमों के बारे में पूछा जाता था। 1934 में क्लार्क हूपर की ‘कोइंसीडेंटलÓ प्रणाली अमरीका में बहुत लोकप्रिय हुई। यह प्रणाली आकस्मिक रूप से की जाने वाली टेलीफोन बातचीत पर आधारित थी।

वर्ष 1942 में ए.सी. नील्सून ने एक मशीनी उपकरण “आडीयोमीटर’’ का प्रयोग किया। आडियोमीटर रिसीविंग सेट की समयावधि को एक कागज़ पर दर्ज कर लेता था। वर्तमान में पूरी दुनिया में टी.आर.पी. जानने के लिए इसी प्रणाली के विकसित तकनीकी रूप को अपनाया जा रहा है। हमारे देश में भी टैम अर्थात टेलीविजऩ मीडिया रिसर्च नाम की निजी कंपनी इसी प्रणाली द्वारा प्रति सप्ताह टी.आर.पी. जारी करती रही है।

भारत में टैम की यात्रा

भारत में टैम का सफर टेलीविजऩ कार्यक्रमों की रेटिंग तय करने के लिए हुई थी। इसकी स्थापना के मूल में विज्ञापन उद्योग ही था। देश का कार्पोरेट जगत चाहता था कि अमरीकी बाज़ारों की तरह हमारे देश में भी रेडियो और टेलीविजऩ पर भी उत्पादों के विज्ञापन प्रसारित किये जाएं। फिक्की के माध्यम से इस संबंध में सरकार पर दबाव भी बनने लगा। 1952 में भारत सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री श्री एस.के. पाटिल ने कहा था कि भारत सरकार आल इंडिया रेडियो पर विज्ञापन प्रसारण पर विचार कर रही है। उस समय भी वही तर्क दिया गया था जो आज भी आकाशवाणी तथा दूरदर्शन की व्यावसायिक छवि को चमकाने के लिए दिये जा रहे हैं- प्राप्त राजस्व को इन संस्थाओं के विकास पर खर्च किया जाएगा।

हमारे देश में नवम्बर 1967 में आकाशवाणी की विविध भारती विज्ञापन सेवा आरंभ हुई। भारत में टेलीविजऩ विज्ञापनों की शुरूआत का श्रेय भी दूरदर्शन को है। 1976 में दूरदर्शन ने पहला विज्ञापन दिखाया। पहले वर्ष में ही दूरदर्शन ने विज्ञापनों द्वारा लगभग 65 लाख रूपये कमाये थे। 1982 के ऐशियाई खेलों में दूरदर्शन रंगीन हुआ। वर्ष 1984 में दूरदर्शन पर पहला धारावाहिक “हम लोग” आया। ‘हम लोग’ कई मामलों में महत्त्वपूर्ण धारावाहिक था। परिवार नियोजन तथा मद्यनिषेध जैसे सामाजिक संदेशों पर केंद्रित इस लोकप्रिय धारावाहिक के लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार तथा वरिष्ठ संपादक श्री मनोहर श्याम जोशी थे। इस सीरियल के निर्माण में विज्ञापन जगत का आर्थिक सहयोग था। ‘हम लोग’ ने न केवल परिवारो में क्रांति की बल्कि भारतीय रसोईघरों में फास्ट फूड मैगी बस दो मिनट नूडल्स का भी प्रचार प्रसार किया था। 1986 में धारावाहिक ‘बुनियाद’ तथा  1987 में ‘रामायण’ ने न केवल दूरदर्शन को भारी लोकप्रियता दी वरन् ढेरों विज्ञापन भी दिये।

वर्ष 1986 में दूरदर्शन पर प्रतिमाह लगभग 3000 विज्ञापन दिखाये जा रहे थे। इनमें से 30′ खाद्य वस्तुओं, 22′ प्रसाधनों, 10′ औषधि, 9′ साबुन तथा 29′ अन्य, उपभोक्ता  वस्तुओं तथा सेवाओ के लिए थे। इनमें हिंदुस्तान लीवर, कोलगेट, ब्रुकबौंड, गोदरेज, पोंड्स,डाबर जैसी बड़ी कंपनियां शामिल थीं।  कुल मिला कर देश में एक मात्र टेलीविज़न चैनल दूरदर्शन होने के बावजूद विज्ञापनों का टेलीविज़न बाज़ार इतना बड़ा हो चुका था कि इसे एक ऐसी निजी ऐजेंसी की जरूरत थी जो कि दूरदर्शन के कार्यक्रमों की रेटिंग जॉंचे और बाज़ार को उनकी योजनाएं बनाने के लिए रेटिंग के आंकड़े बताए।

इन्हीं कारणों से 1986 में तीन सर्वेक्षण कंपनियों आई.एम.आर.बी., एम.आर.एस.ब्रुक और समीर ने डायरी प्रणाली से इसकी संयुक्त शुरूआत की थी। 1992-93 में केबल टी.वी., सी.एन.एन., स्टोर तथा एम.टी.वी. जैसे निजी टी.वी. चैनल्स आ गये। विज्ञापन बाज़ार में पैप्सी जैसी कंपनियां भी आ गयीं। इसी दौर में ए.सी. नीलसन तथा आई.एम.आर.बी. ने मिल कर मीटर लगा कर टी.वी. रेटिंग जुटानी शुरू कर दी। इस प्रकार वर्ष 1988 से टैम ने रेटिंग का काम शुरू किया।

इसी बीच यह ख़बर आयी कि इन टेलीविजऩ विज्ञापनों की बदौलत हिंदुस्तान लीवर ने अपनी बिक्री वर्ष 1997 में 894 करोड़ रूपयों से बढ़ाकर 1998 में 1526 करोड़ कर ली। इस ख़बर से विज्ञापन जगत तथा आम उपभोक्ता उद्योगों में टेलीविजऩ कार्यक्रमों की रेटिंग के आंकड़ों का महत्व बढ़ गया।

वर्ष 2002 से यह कंपनी नीलसन के सहयोग से टैम मीडिया रिसर्च के नाम से भारतीय बाज़ारों में टेलीविजऩ रेटिंग के आंकड़े साप्ताहिक रूप से जारी कर रही है।

टैम टी.आर.पी. तय करने के लिए मीटर प्रणाली का इस्तेमाल कर रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार देश के 165 शहरों में 8,150 मीटर प्रति सप्ताह लगभग 36,000 दर्शकों के द्वारा विभिन्न टी.वी. चैनल्स देखने के आंकड़े जुटाते हैं। आंकड़ों के अनुसार इनमें से 5,532 मीटर केबल सज्जित टी.वी. सेट्स में, 1611 डी.टी.एच. तथा बिना केबल वाले घरों में 1007 मीटर्स लगे हैं। टेलीविजऩ सेट्स से जुड़े ये मीटर यह रिकॉर्ड कर लेते हैं कि किस चैनल को कितनी देर तक घर में देखा गया। इसी आधार पर टी.वी. चैनल्स की साप्ताहिक रेटिंग विभिन्न आयु तथा लिंग के अनुसार जारी की जाती है। इसमें भी यह माना जाता है कि 15 वर्ष से अधिक आयु वर्ग की महिलाओं में लोकप्रिय कार्यक्रम विज्ञापनदाताओं में अधिक पसंद किये जाते हैं। हमारे देश में लगभग 833 टी.वी. चैनल्स ने सूचना प्रसारण मंत्रालय से लाइसेंस लिये हैं। प्रतिवर्ष लगभग 12,000 करोड़ रूपये टेलीविजन विज्ञापनों पर खर्च किये जाते हैं। ये रकम ‘टेम’ अर्थात टेलीविजऩ आडिएंस मैजरमेंट मीडिया रिसर्च कंपनी द्वारा जारी किये जाने वाले साप्ताहिक टेलीविजऩ रेटिंग प्वाइंट्स के आधार पर ही खर्च किये जाते हैं। कुल मिलाकर 800 से अधिक टी.वी. देख रहे लगभग 70 करोड़ दर्शकों की पसंद-नापसंद मात्र 8150 मीटर्स तय कर रहे हैं।

टी.आर.पी: कटघरे में

वर्तमान में इस टी.आर.पी. प्रणाली की सबसे अधिक आलोचना टेलीविजऩ चैनल्स से जुड़े लोग ही कर रहे हैं। जबकि टैम यह आंकड़े विज्ञापन कंपनियों तथा टेलीविजऩ कंपनियों को बेचने के लिए ही जुटा रही है।

वैसे मीडिया विशेषज्ञ तथा समाजशास्त्रीज आरंभ से ही इस व्यवस्था की आलोचना कर रहे थे। सामाजिक मीडिया के पक्षधर मानते थे कि टी.आर.पी. की इस सांप-सीढ़ी में चैनल्स तथा टेलीविजऩ कार्यक्रमों के दर्शकों के लिए सीढियां कम हैं, सांप अधिक हैं। इस आधी-अधूरी टी.आर.पी. तथा स्वार्थी व भ्रमित विज्ञापन उद्योग के गठजोड़ ने पूरे देश में प्रसारण की दिशा ही तय करनी शुरू कर दी है। उपयोगी तथा यथार्थपरक कार्यक्रमों का स्थान निरी गपशप, फूहड़ कामेडी व संगीत तथा साफ्ट स्टोरीज़ शोज़ ने ले लिया है। क्रिकेट, क्राइम, सिनेमा, कालगर्ल, कैनाड (अर्थात झूठी अफ़वाह) का चैटरबाक्स बन कर रह गये हमारे टी.वी. चैनल्स। इस टी.आर.पी. प्रणाली के कारण सामाजिक विचारकों के मत में टी.आर.पी. के ये आंकड़े वास्तलविक भारत का प्रतिनिधित्वे नहीं करते हैं।

लेकिन तब कंपनी की ओर से यह कहा गया कि टैम द्वारा जारी टी.आर.पी. मात्र टेलीविजऩ कंपनियों तथा विज्ञापनदाताओं के लिए ही हैं। इनके अलावा अन्य किसी को इन आंकड़ों में दिलचस्पी नहीं लेना चाहिए। दरअसल यही तर्क सबसे बड़ा असामाजिक तर्क था क्योंकि हमारे देश में टी.वी. प्रसारण एक सामाजिक कार्य है। देश की जनता ही टैक्स और वस्तुओं की कीमतों के द्वारा इन विज्ञापनों तथा कार्यक्रमों का मूल्य चुकाती है। बदले में उसे देखने को मिलते हैं भूत-प्रेत, अंध-विश्वातस तथा ऐसे अश्लील कार्यक्रम जो कहीं से भी स्वस्थ मनोरंजन नहीं माने जा सकते।

यही कारण है कि आज प्रसार भारती के साथ-साथ निजी टी.वी. चैनल्स के प्रसारक इसके विरूद्ध आवाज़ उठा रहे हैं। जहॉं कुछ चाहते हैं कि इस प्रक्रिया में सुधार किया जाए वहीं कुछ चाहते हैं कि टी.आर.पी. बंद कर दी जाए। इन सबका एक कारण ये भी है कि आज देश में टी.आर.पी. व्यवस्था पर एक निजी कंपनी का एकाधिकार है और निश्चित रूप से यह एकाधिकार किसी भी लोकतांत्रिक देश में प्रसारण और आम दर्शकों के लिए ‘शुभÓ नहीं है और ‘लाभ’ भी चंद लोगों के लिए ही है।

हमारे देश में प्रसारण नीतियों की निगरानी का कार्य केंद्र सरकार का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय करता है। प्रसार भारती द्वारा संचालित दूरदर्शन के साथ-साथ मंत्रालय निजी रेडियो और टेलीविजऩ चैनल्स को लायसेंस भी जारी करता है। इस संबंध में उठने वाले सवालों के जवाब देने का काम भी इसी मंत्रालय के मंत्री संसद के सामने करते हैं। वर्ष 2008 में एक स्थायी संसदीय समिति की रिपोर्ट में टैम द्वारा जारी आंकड़ों में कई खामियॉं गिनाई गयी थी। इनमें से कुछ इस प्रकार है:-

  1. संपूर्ण प्रणाली में पारदर्शिता नहीं है।
  2. सैम्पल बहुत छोटा है।
  3. जारी टी.आर.पी. आंकड़ों के ऑडिट की कोई व्यवस्था नहीं है।
  4. मात्र महानगरों के दर्शकों के हितों पर केंद्रित।
  5. नार्थ-स्टेट तथा जम्मू-कश्मीरी तथा पिछड़े राज्यों में तथा ग्रामीण क्षेत्रों में मीटर्स की संख्या- बहुत कम है। कहा तो ये भी जाता है कि जम्मू-कश्मीर तथा नॉर्थ-ईस्ट राज्यों में मीटर्स लगाये ही नहीं गये।

दरअसल टैम ने मीटर्स मात्र विज्ञापन बाज़ार के हितों में देखते हुए लगाये हैं। जिन इलाकों में उपभोक्ताओं की क्रय क्षमता अधिक है वहीं की टी.आर.पी. को पूरे देश के कार्यक्रमों की टी.आर.पी. कह कर प्रचारित किया गया है। इसी कारण आज निजी क्षेत्र की टी.वी. कंपनीज के निर्माता तथा संपादक भी इसी व्यवस्था की कड़ी आलोचना कर रहे हैं। एक अच्छी बात ये भी हुई कि टी.वी. चैनल्स ने तय किया कि वह टी.आर.पी. से प्रभावित हुए बिना आपसी संवाद के द्वारा अपने कार्यक्रमों में सुधार करेंगे। ब्राडकास्टन एडीटर्स एसोसिएशन के प्रयासों से कार्यक्रमों का स्तर भी सुधरा तथा स्वनियंत्रण की भावना का भी विकास हुआ। जो निश्चित ही दर्शकों तथा भारतीय समाज के हित में है साथ ही टी.वी. चैनल्स की भी साख बढ़ी। निश्चित रूप से इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।

अमित मित्रा टी.आर.पी. कमेटी की रिपोर्ट

वर्ष 2008 में भारतीय संसद में एक स्थायी संसदीय समिति ने एक रपट रखते हुए इस टी.आर.पी. व्यवस्था में कई खामियॉं गिनायी थीं। भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण अर्थात ट्राई के साथ-साथ प्रसार भारती तथा निजी टेलीविजऩ चैनल्स भी इस व्यवस्था में सुधार चाहती थीं। सामाजिक मीडिया विशेषज्ञ तो आरंभ से ही इस तरह की मांग कर रहे थे।

सूचना तथा प्रसारण मंत्रालय ने फिक्की के पूर्व महासचिव तथा वित्तीय विशेषज्ञ व वरिष्ठ राजनीतिज्ञ श्री अमित मिश्रा की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन कर हमारे देश में टेलीविजऩ रेटिंग प्रणाली पर रिपोर्ट देने का अनुरोध किया। इस कमेटी ने वर्ष 2011 के आरंभ में अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को सौंपी है। इस रिपोर्ट में वर्तमान में जारी टी.आर.पी. व्यवस्था में कई खामियॉं बताते हुए उनमें सुधार हेतु कई सुझाव दिये गये हैं:-

  1. मीटरों की संख्या बढ़ाकर 30,000 की जाए इनमें से आधे अर्थात 15,000 मीटर गांवों में लगाये जाएं ताकि संपूर्ण देश से सही आंकड़े प्राप्त हो सके।
  2. टी.आर.पी. के आंकड़े एकत्र करने की व्यवस्था में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ाई जाए।
  3. ऐसे उपाय किये जाएं कि टी.आर.पी. आंकड़ों में कोई गड़बड़ न कर सके, इसके लिए इसकी किसी योग्य, निरपेक्ष तथा दक्ष ऑडिट फर्म द्वारा ऑडिट करवाने की व्यवस्था की जाए।
  4. टी.आर.पी. रेटिंग ऐजेंसियों में टी.वी. कंपनीज, विज्ञापन देने वाले उद्योगों तथा विज्ञापन ऐजेंसियों की वित्तीय तथा प्रबंधन भागीदारी नहीं होना चाहिये ताकि वे स्वहित में आंकड़ों को प्रभावित न कर सकें।

दरअसल वर्तमान टी.आर.पी. प्रणाली में समाज के सभी वर्गों के समग्र प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है। ये वर्ग मात्र शहरी तथा संपन्न  तबके के दर्शकों के ही घर नहीं होने चाहिये। यह नहीं भूलना चाहिये कि आज की तारीख में टेलीविजऩ शहर की गऱीब, पिछड़ी बस्तियों तथा सड़क से दूरदराज छोटे-छोटे गांवों तक पहुंच चुका है और विज्ञापनों के उपभोक्ताओं की एक बड़ी आबादी इन चैनल्स  को देख रही हैं। इन दर्शकों की उपेक्षा मात्र टेलीविजऩ चैनल्स के लिए ही नहीं बाज़ार के लिए भी नुकसानदायक होगी। क्योंकि अब भारतीय अर्थव्यवस्थ उत्कर्ष की अवस्था में है। यह विकास की ऐसी सामान्य व्यवस्था है जहॉं उद्योंगों तथा कृषि में तकनीकी विकास के कारण लाभ का विस्तार होने से उपभोक्तावाद में भारी वृद्धि  हुई है। इन कारणों से विज्ञापन भी सही दर्शकों तक पहुंचना चाहिये और हॉं अच्छे टेलीविजऩ कार्यक्रम भी।

अद्भुत आख्यान:- बहरहाल इसी बीच एक विज्ञापन के द्वारा दूरदर्शन ने बताया है कि टैम द्वारा जारी टी.आर.पी. के आंकड़ों में दूरदर्शन को भारी लाभ हुआ है। यहॉं भारी लाभ से मतलब है कि, टैम की टी.आर.पी. के आंकड़े स्वीकार करते हैं कि दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल के कार्यक्रमों में दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ी है।

उम्मीद है भविष्य में हमें जल्दी ही हमारे देश में एक संपूर्ण टेलीविजऩ रेटिंग प्रणाली मिलेगी जिसमें आम दर्शकों के साथ-साथ देश के सामाजिक-आर्थिक-व्यापारिक तथा सांस्कृतिक हितों का भी ध्यांन रखा जाएगा।

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